प्रदीप कुमार

पिछले दिनों जन्मदिन के अवसर पर पूरी दुनिया ने महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन को याद किया। इसको लेकर देश भर में विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस बार डार्विन को इतनी शिद्दत से याद करने की वजह भी थी। वैसे परम्परावादी, रूढ़िवादी शक्तियां विज्ञान की नई खोज, नई समझ, नई स्थापनाओं का सदैव विरोध करती रही हैं। दुनिया के कई वैज्ञानिकों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। खुद चार्ल्स डार्विन को अपने समय में भी प्रतिगामी ताकतों की कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारत की आजादी का यह 75 वां वर्ष है। संविधान सम्मत, अंधविश्वास मुक्त, समतामूलक, तर्कशील, विज्ञानपरक, आधुनिक, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का लक्ष्य हमारे सामने है। संविधान ने भी वैज्ञानिक मानसिकता के विकास को देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया है। अतः जरूरी है कि हम रूढ़िवादी परम्पराओं मूढ़ मान्यताओं एवं पाखंड के दायरे से बाहर निकल कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, समाज में वैज्ञानिक चेतना फैलाएं एवं बेहतर समाज, देश-दुनिया के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है युवा विज्ञान लेखक, विज्ञान संचारक प्रदीप कुमार का यह महत्वपूर्ण आलेख –

डार्विन ने कुछ मूलभूत प्रश्नों, मसलन- हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, किसलिए जीते हैं, और हमारा अस्तित्व क्यों है – को लेकर हमारी सोच में वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद बड़ा बदलाव लाया। डार्विन के जैव-विकास सिद्धांत की बदौलत विज्ञान ने एक बहुत बड़ी छलांग लगाई। डार्विन के सिद्धांत ने यह स्थापित किया कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति में किसी बाहरी या अंदरूनी दिव्य शक्ति या सृजनहार का कोई भी हाथ नहीं है बल्कि जीवन की उत्पत्ति रासायनिक अभिक्रियाओं और भौतिक प्रक्रियाओं के चलते हुई, और वह भी निर्जीव पदार्थों से!

डार्विन की किताब ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ के छपने के बाद वैज्ञानिक जगत में तहलका मच गया और इसका जमकर विरोध हुआ। डार्विन की इस नई समझ, नए ज्ञान और नए बोध ने धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दे डाली। चर्च और उसके अनुयायियों को डार्विन के जैव-विकास का सिद्धान्त बिल्कुल भी मान्य नहीं था। उन्हें लगता था कि डार्विन का सिद्धान्त इंसानों और जानवरों के बीच के अंतर को ही खत्म कर देगा। लेकिन इससे कहीं ज्यादा बड़ा आरोप जो डार्विन पर लगा, वह यह था कि उनके सिद्धान्त ने ईश्वर, उनके पुत्र यीशू और ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबिल के ही वजूद पर सवाल खड़े कर दिए थे। ईसाइयत की मान्यताओं के मुताबिक ईश्वर ने सृष्टि की रचना एक बार में और एक बार के लिए की है। उनके मुताबिक इंसान की रचना ज्यादा पुरानी नहीं है। लगभग छह हजार साल पहले इंसान की रचना उसी रूप में हुई है जिस रूप में इंसान आज है। इसी तरह सृष्टि के अन्य चर-अचर प्राणी भी इसी रूप में रचे गए और वे पूर्ण हैं। और चार्ल्स डार्विन ने यही तो बदला। अपने जीवन भर के श्रमसाध्य, सुविचारित और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर उन्होंने जीवन के विकास का विवरण तैयार किया। जैसा कि सन् 1859 में वे लिखते भी हैं, ‘हर नई प्रजाति, अपने साथ कुछ परिवर्तन लिए, अपनी किसी पूर्वज प्रजाति से उभरती है।’

डार्विन के सिद्धान्त की बदौलत जीव विज्ञान में क्रांति आई और इसकी खूब आलोचना भी हुई। लेकिन पिछले करीब 200 सालों में जैव-विकास के बारे में नए-नए प्रमाण सामने आते गए और आज वह विज्ञान जगत में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सिद्धान्त बन गया है। डार्विन के सिद्धान्त की बदौलत हम हैं कौन?, कहाँ से आए हैं?, कहाँ जा रहे हैं? जैसे बुनियादी सवालों के अब तक जो जवाब मिले हैं वे काफी समृद्ध और ठोस हैं। डार्विन का जैव-विकास का सिद्धान्त आधुनिक जीव विज्ञान का मूल आधार बना, जैसाकि प्रख्यात जीव विज्ञानी थियोडोसियस डोबझान्सकी ने कहा है कि, ‘जैव विकास के सिद्धान्त का प्रकाश न हो तो जीव-विज्ञान में कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं लगता।’ हालांकि डार्विन के इतने सालों के बाद आज जीव-विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि आज हमें ऐसी-ऐसी बारीकियां पता हैं, जिन्हें अगर डार्विन को हम बताते, तो जरूर उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती !

प्रदीप कुमार

( यह आलेख लेखक की हाल में प्रकाशित किताब ‘ विज्ञान: अतीत से आज तक ’ के चार्ल्स डार्विन और जैव – विकास पर आधारित पाठ का अंश है )

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