दयानिधि

जोधपुर के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और अमेरिका के ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि भारत में मानसिक बीमारी के बारे में खुद से बताना या स्व-रिपोर्टिंग की दर एक प्रतिशत से भी कम है। निजी अस्पताल देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर प्रमुखता से काम कर रहे हैं।

अध्ययन के निष्कर्षों से पता चला कि  मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए स्व-रिपोर्टिंग दर काफी कम देखी गई। अध्ययन से पता चला कि 75वें दौर के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 2017 से 18 के आधार पर मानसिक बीमारी की स्व-रिपोर्टिंग एक प्रतिशत से भी कम थी। अध्ययन में कहा गया है कि सर्वेक्षण पूरी तरह से लोगों की स्वयं-रिपोर्टिंग पर आधारित है।

अध्ययन के अनुसार, 8077 गांवों और 6181 शहरी क्षेत्रों के 555,115 लोगों के आंकड़े एकत्र किए गए थे जिन्हें रैंडम या यादृच्छिक तरीके से चुना गया था। इनमें से 283 बाह्य रोगी थे और 374 भारत में मानसिक विकारों के कारण अस्पताल में भर्ती थे।

अध्ययन में बताया गया है कि यह अध्ययन लॉजिस्टिक रिग्रेशन मॉडल के अनुसार आयोजित किया गया था, जिससे पता चला कि उच्च आय वाले व्यक्तियों में कम आय वाले लोगों की तुलना में स्वास्थ्य समस्याओं की रिपोर्ट करने की प्रवृत्ति 1.73 गुना अधिक थी।

क्या कहते हैं अध्ययन के निष्कर्ष?

मानसिक विकारों की कम स्व-रिपोर्टिंग: भारत में मानसिक विकारों की स्व-रिपोर्टिंग बीमारी के वास्तविक बोझ से काफी कम है, जो मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों की पहचान करने और उनसे निपटने में एक बहुत भारी अंतर को दर्शाता है।

सामाजिक-आर्थिक असमानताएं: अध्ययन में एक सामाजिक-आर्थिक विभाजन का पता चला, जिसमें भारत में सबसे गरीब लोगों की तुलना में सबसे अमीर आय वर्ग की आबादी में मानसिक विकारों की स्वयं-रिपोर्टिंग 1.73 गुना अधिक पाई गई। निजी क्षेत्र का प्रभुत्व: 66.1 फीसदी बाह्य रोगियों की देखभाल और 59.2 फीसदी आंतरिक रोगियों की देखभाल के साथ, निजी क्षेत्र मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के एक प्रमुख प्रदाता के रूप में सामने आया है।

सीमित स्वास्थ्य बीमा कवरेज: मानसिक विकारों के लिए अस्पताल में भर्ती लगभग 23 फीसदी लोगों के पास ही राष्ट्रीय स्तर पर  स्वास्थ्य बीमा कवरेज था।जेब पर भारी खर्चे का दबाव: अस्पताल में भर्ती और बाह्य रोगियों की देखभाल दोनों के लिए औसत आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र में काफी अधिक देखा गया।

आईआईटी जोधपुर में स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स (एसओएलए) के सहायक प्रोफेसर डॉ. आलोक रंजन और अमेरिका के कोलंबस में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ हेल्थ एंड रिहैबिलिटेशन साइंसेज के डॉ. ज्वेल क्रैस्टा द्वारा इस अध्ययन की अगुवाई की गई है। यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ सिस्टम्स में प्रकाशित किया गया है।

अध्ययन के हवाले से डॉ. आलोक रंजन ने भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकारों पर कम स्व-रिपोर्टिंग के बारे में बोलते हुए बताया कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों की रिपोर्ट करने में एक बड़ी बाधा समाज में बुरी नजर से देखा जाना है। उन्होंने कहा, मौजूदा समस्या के कारण मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की रिपोर्ट करने में अनिच्छा बनी रहती है और लोग अक्सर सामाजिक फैसले के डर से मदद मांगने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं। डॉ. रंजन ने सुझाव देते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को बदनाम करना ऐसे माहौल को बढ़ावा देने में एक बड़ी भूमिका निभाता है जहां सहायता मांगने का स्वागत किया जाता है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज द्वारा 2017 के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत में लगभग 19.73 करोड़ लोग मानसिक विकार से पीड़ित थे।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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