वेदप्रिय

एक फ़्रेंच लड़की की कहानी है। इनका नाम सोफी जर्मेन था। यह पेरिस के पास एक गांव में रहती थी। इनका जन्म 1 अप्रैल, 1776 को हुआ था। बचपन में जब उनकी आयु 13 वर्ष की हुई तो इन्होंने एक यूनानी गणितज्ञ के बारे में पढ़ा । यह उनसे इतनी प्रभावित हुई कि इनकी रुचि गणित पढ़ने में हो गई। उन दिनों फ्रांस में लड़कियों की शिक्षा आम बात नहीं थी ।

गणित की शिक्षा तो और भी कठिन थी। इन्होंने गणित पढ़ने की ठानी। इनके माता-पिता को इनके बारे में पता चला। उन्होंने इनके पढ़ने के सभी साधन प्रतिबंधित कर दिए। लेकिन इनका इरादा मजबूत था। इन्होंने चोरी छिपे गणित की पढ़ाई करनी चाही।ये देर रात तक समय निकालकर चोरी छिपे अपनी पढ़ाई करती ।इनकी जिद के आगे इनके माता-पिता को घुटने टेकने पड़े। उन्होंने इनकी पढ़ाई में सहयोग किया। ऊंची पढ़ाई करने के लिए इन्हें पेरिस जाना था। वहां महिलाओं की पहुंच अत्याधिक कठिन थी। वहां जिस संस्था में यह पढ़ना चाहती थी वहां केवल लड़कों को ही दाखिला मिलता था। वहां गणित की यह एक नई संस्था ही खुली थी। इनके पास के एक व्यक्ति एम ब्लांक को वहां दाखिला मिल गया था ।लेकिन किसी कारणवश वह जाने कोई इच्छुक नहीं था। सोफी ने अपना नाम बदलकर एम बलांक के नाम पर वहां दाखिला ले लिया।

वहां पत्राचार से पढ़ाई हो रही थी। इनके सुपरवाइजर लैंग्रेंज एक प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। समय-समय पर एम ब्लांक विद्यार्थी के नाम से असाइनमेंट इन के पास आने लगे ।वे यह देखकर हैरान रह गए कि इतना धुरंधर विद्यार्थी गणित में कौन हो सकता है। उन्होंने एक बार एम ब्लांक को अपने यहां मिलने के लिए बुलाया ।सोफी वहां पहुंच गई ।लैंग्रेंज यह देखकर हैरान रह गए कि एम ब्लांक के नाम से तो एक लड़की है। खैर बाद में यह लड़की एक प्रसिद्ध गणितज्ञ बनी। इन्होंने C F Gauss के साथ भी काम किया जो उस समय के प्रसिद्ध गणितज्ञ थे । बात यहां सोफी की नहीं है। सवाल यह है कि वह कौन यूनानी गणितज्ञ था जिनकी जीवनी पढ़कर इन्होंने इस प्रकार का साहसिक फैसला किया। इन यूनानी गणितज्ञ का नाम था आर्किमिडीज ।आर्किमिडीज की कहानी का वह कौन सा दृश्य था जिससे सोफी सबसे ज्यादा प्रभावित थी? वह दृश्य था आर्किमिडीज के अंतिम समय का।

आर्किमिडीज सायराक्यूज का रहने वाला था ।सायराक्यूज उस समय सिसली का एक भाग था। इस समय यह इटली में है। इनका रोमन के साथ युद्ध हुआ था। लंबी लड़ाई के बाद ये हार गए थे। लेकिन इस युद्ध में आर्किमिडीज ने सायराक्यूज को बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रोम के शासक मर्सिलेस को यह पता चल गया था कि यहां सायराक्यूज में एक बुद्धिमान गणितज्ञ रहता है, जो बहुत बड़ा इंजीनियर है और जिन्होंने सायराक्यूज को बचाने के लिए अद्भुत युक्तियों का प्रयोग किया है। विजयी रोमन शासक   ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे आर्किमिडीज को जीवित पकड़कर उनके पास लाएं ।

सायराक्यूज   पर रोमनों का कब्जा होने के बाद आर्किमिडीज अपने घर में गणित की कोई गुत्थी सुलझाने में व्यस्त था। वह अपने आंगन में बैठा जमीन पर कुछ ज्यामिति की आकृतियां बनाये चिंता मुद्रा में था ।अचानक एक रोमन सैनिक ने प्रवेश किया। आर्किमिडीज को नहीं पता था कि यह किसलिए आए हैं ।इस सैनिक ने आर्किमिडीज  पर अपनी तलवार उठाई और अपने साथ चलने को कहा। आर्किमिडीज हड़बड़ाया नहीं।आर्किमिडीज ने बस केवल इतना ही कहा–Noliturbarecirculosmeos .अर्थात ‘देखिए, मेरी इन वृत कीआकृतियों को न बिगाड़िए’। आर्किमिडीज के ये अंतिम शब्द थे। और उस सैनिक ने एकदम से अपनी तलवार से  इनका काम तमाम कर दिया। आर्किमिडीज की मृत्यु का समाचार रोम के शासक  के पास पहुंचा। वह बहुत मायूस हुआ। उसने आर्किमिडीज के संबंधियों से माफी मांगी और बहुत सम्मान के साथ आर्किमिडीज को दफनाया। उसकी कब्र पर गोलाकार व बेलनाकार आकृतियां रखी।इनकी मृत्यु 212 ईसा पूर्व में हुई। प्रसिद्ध इतिहासकार सिसरो ने इनकी मृत्यु के 137 वर्ष बाद इनकी कब्र को पहचाना। क्योंकि रोमनों की गणित में कोई खास रुचि नहीं थी ।कुछ इतिहासकारों का मत यह भी है की सैनिक ने आर्किमिडीज  को पकड़ लिया था। और वह आर्किमिडीज को पकड़कर शासक के पास ले जा रहा था ।उस समय आर्किमिडीज के पास कुछ सामान था ,उसके यंत्र आदि। सैनिक ने समझा कि इसके पास कुछ सोना भी है।इस सोने के लालच में सैनिक ने आर्किमिडीज की रास्ते में हत्या कर दी ।

आइये,आर्किमिडीज के बारे में कुछ और जानें। आर्किमिडीज के जीवन के बारे में हमें कोई ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके समकालीन मित्र Heraclidasने उनकी जीवनी लिखी थी ।लेकिन दुर्भाग्य से यह आज हमारे पास नहीं है। कुछ अन्य स्रोतों से कुछ जानकारियां जुटाकर आज हम उनके बारे में कुछ जान पाए हैं। केवल इतना ही पता है कि उनके पिताजी का नाम फिडियास था।ये एक खगोलविद थे ।इससे ज्यादा इनके परिवार के बारे में हमारे पास कोई जानकारी नहीं है। इस बात का उल्लेख भी स्वयं आर्किमिडीज ने अपनी पुस्तक The Sandrechonerमें किया है। यह ग्रंथ भी आज हमारे पास मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। कुछ सूत्रों से पता चला है कि इस ग्रंथ में वे पृथ्वी और ब्रह्मांड के बारे में रेत के कणों के माध्यम से बहुत सी गणनाओं का जिक्र करते हैं। आर्कमिडीज का जन्म 287 ईसा पूर्व सायराक्यूज में हुआ था, जो उन दिनों सिसली का एक भाग था ।इन्होंने अलेक्जेंड्रिया में प्रसिद्ध गणितज्ञ यूक्लिड के उत्तराधिकारियों के साथ पढ़ाई की थी ।यहां इनका आना-जाना था ।उन दिनों अलेक्जेंड्रिया ज्ञान का बड़ा केंद्र माना जाता था।  अलेक्जेंड्रिया में उन दिनों कैनन ऑफ समोस गणित एवं खगोल के एक महान व्यक्ति रहते थे।

ये टॉलेमी तृतीय के शाही दरबार में खगोलविद थे। इन्होंने एक तारामंडल की खोज की थी। इसका नाम इन्होंने टॉलेमी तृतीय एयरगेट्स की पत्नी Berenice के नाम पर रखा था। यह तारामंडल जैमिनी के पास मिला था। Canon of Samos आर्किमिडीज के गहरे दोस्त थे। आर्किमिडीज गणित व खगोल के अपने प्रश्नों को उनके साथ सांझा करते रहते थे। आर्किमिडीज अपनी पुस्तक ‘ऑन स्पाइरल्स’ के आमुख में एक रोचक घटना का उल्लेख करते हैं। वे अपने अलेक्जेंड्रिया के गणितज्ञ मित्रों के पास ज्यामितीय प्रमेयों के कथन भेजते रहते थे। एक बार इन्होंने कुछ प्रमेय अलेक्जेंड्रिया भेजी। लेकिन उनके प्रमाण नहीं दिए। उन गणितज्ञों के लिए ये प्रमेय नई थी। उन्होंने अपने स्तर पर इनके प्रमाण दे दिए और इन प्रमेयों को अपनी प्रमेय बता दिया। जब इनके प्रमाण आर्किमिडीज के पास पहुंचे तो इन्होंने उत्तर में पत्र लिखकर कहा कि इनमें से दो प्रमेयों के कथन तो है ही गलत। आर्किमिडीज ने आगे कहा कि उन्होंने जानबूझकर के दो गलत कथन भेजे थे। मैं हैरान हूं कि उन्होंने उनके प्रमाण कैसे दे दिए।आर्किमिडीज के बारे में सर्वाधिक जानकारी हमें प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार प्लुटार्क के माध्यम से मिलती है ।ये लिखते हैं कि आर्किमिडीज के संबंध शाही दरबार तक थे ।आर्किमिडीज सायराक्यूज के राजा हीरोन के बहुत चहेते थे ।आर्किमिडीज ने बहुत सी यांत्रिक युक्तियां ऐसी बनाई थी जो रोम के साथ लड़ाई में काफी सहायक सिद्ध हुई थी। आर्किमिडीज ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The Sandrechoner’ राजा हीरोन के बेटे गैलन को ही समर्पित की थी ।आर्किमिडीज ने ऐसे इंजन बनाए थे जिनसे गुलेल की तरह तेज गति से भारी पत्थर के गोले निकलते थे जो दुश्मन की फौज को तीतर बीतर करने में सक्षम थे। उस दौर में उनके यंत्रों की बहुत ज्यादा प्रशंसा हुई थी, जबकि इनके पीछे काम कर रहे गणित के सिद्धांत व विज्ञान की ओर लोगों का ध्यान नहीं था। आज भी यही हाल है ।लोगों की गणित के सिद्धांतों में रुचि नहीं है जबकि मशीनों के बारे में वे बहुत कुछ जानना चाहते हैं।

आर्किमिडीज ने घिरनी के सिद्धांतों पर भी बहुत अध्ययन किया था। इन्होंने उत्तोलक के सिद्धांतों पर भी काफी काम किया था। इन्होंने राजा हीरोन के पास एक पत्र लिखा था ।इसमें कहा गया था– “यदि मुझे एक बहुत बड़ा उत्तोलक दे दिया जाए और इसे टिकाने के लिए स्थान दे दिया जाए तो मैं अकेला पूरी पृथ्वी को ऊपर उठा सकता हूं।” राजा हीरोन ने इसकी पड़ताल करनी चाही। पृथ्वी को ऊपर उठाने की बात तो नहीं हो सकती थी। राजा हीरोन ने अपने समुद्री बेड़े के एक बहुत बड़े जलयान  (जो बहुत अधिक भारी था) को पानी में उतार दिया। इस पर अतिरिक्त भार लाद दिया गया। इसमें बहुत से लोग सवार कर दिए गए। इसे इतना भारी कर दिया गया कि यह सामान्य स्थिति में हिलना  कठिन  था।

अब आर्किमिडीज से कहा गया कि वह इस जलयान को हिला कर या उठाकर दिखाएं। आर्किमिडीज ने घिरनी और उत्तोलकों की मदद से इस जलयान को समुद्र में चला दिया। यह सब आर्किमिडीज के गणित( ज्यामिति ) व यांत्रिकी की करामात थी।इन्होंने गोलीय दर्पणों के गुणों का भी अध्ययन किया था।आर्कमिडीज का गणित का अध्ययन बहुत आगे बढ़ा हुआ था। मध्य युग के गणितज्ञों केप्लर, न्यूटन ,लेबनीज फरमैट, डेकार्ट आदि पर इनका गहरा प्रभाव था। गणित पर सर्वाधिक प्रसिद्ध आर्किमिडीज की पुस्तक ‘द मेथड’ है ।यह तर्क की एक प्रसिद्ध कृति समझी जाती है। त्रिआयामी ज्यामितीय वस्तुओं के पृष्ठीय क्षेत्रफल व  आयतन आदि पर इनका अध्ययन लाजवाब था। इनकी एक और प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘ऑन फ्लोटिंग बॉडीज’ है। इसमें वे हाइड्रोस्टेटिक्स के सिद्धांतों का वर्णन करते हैं। वस्तुओं के तैरने के नियम (जिन्हें हम आज आर्कमिडीज का सिद्धांत कहते हैं) इसी में दर्ज हैं। इन्होंने खगोल के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण गणनाएं की थी।

 इनके साथ सबसे दिलचस्प कहानी सोने के मुकुट की है। वह इस प्रकार है। राजा हीरोन ने सोने का एक मुकुट बनवाया था। उन्हें शक हुआ कि कहीं इसमें कोई अशुद्धि (सोने के इलावा किसी और धातु की मिलावट) तो नहीं। राजा ने इसे जांचने का काम आर्किमिडीज को सौंपा। साथ में यह शर्त भी रखी कि इसके आकार में कोई तब्दीली न आने पाए। क्योंकि बनावट में यह बहुत सुंदर था ।आर्किमिडीज इसके हल के बारे में सोचने लगे। एक बार वे अपने नहाने के टब में( ज्यादा भरे हुए) नहा रहे थे। अचानक उन्हें महसूस होने लगा कि जब वे पानी में नीचे जा रहे होते हैं तो कुछ पानी टब से बाहर निकल जाता है।साथ में उन्हें अपना भार भी कम महसूस हो रहा था ।इन्होंने नहाते -नहाते दिमाग लगाया कि बाहर निकले पानी का आयतन और पानी में डूबने वाली वस्तु के आयतन का क्या हिसाब है। वे इससे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस गणना से वस्तु का घनत्व (भार व आयतन का अनुपात )निकाला जा सकता है। इस युक्ति से वह सोने के मुकुट को पानी में डुबोकर बाहर निकले पानी का आयतन माप कर इस सोने से बने मुकुट के घनत्व को माप सकता है।

दूसरी ओर इसी भार के शुद्ध सोने के टुकड़े के घनत्व का तो पता लगाया ही जा सकता है। यदि इनके घनत्व में कोई अंतर आता है तो यह मुकुट शुद्ध सोने का नहीं हो सकता ।ऐसा सोचकर वे एकदम उछल पड़े और चिल्लाए  – Eureka अर्थात पता चल गया( यूनानी भाषा में)। कहते हैं कि वे खुशी से इतना पागल हो उठे कि वे इसी हालत में(नहाते हुए ) चिल्लाते हुए यूरेका -यूरेका कहते हुए गली में निकल पड़े। यूरेका शब्द वैज्ञानिक शब्दावली में आज एक महत्वपूर्ण शब्द माना जाता है।

          (लेखक हरियाणा के वरिष्ठ विज्ञान लेखक एवं विज्ञान संचारक हैं तथा हरियाणा विज्ञान मंच से जुड़े हैं )

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