ब्रह्माण्ड में जितने भी ग्रह अवलोकित किए गए हैं उनका एक ही तरह का आकार पाया गया है. वे पूरी तरह तो गोलाकार तो नहीं होते हैं. गोल होते हुए भी ऊपर नीचे से दबे हुए से और बीच में से थोड़े फूले से होते हैं. ग्रहों की इस व्यापक समानता की वजह एक ही है कि ग्रहों पर गुरुत्व और घूर्णन का प्रभाव पड़ता है.

 

प्रकृति को लेकर समान्य तौर पर हम सवाल कम ही उठाते हैं. जैसे पेड़ हरे क्यों होते हैं. पानी का रंग क्यों नहीं होता. हम मान कर चलते हैं कि चीजें ऊपर से नीचे ही गिरेंगी, गुलाब लाल ही होगा, और ग्रहों का आकार गोल ही होगा. हालाकि हमारे वैज्ञानिकों को इन सब बातों की वजह पता है, लेकिन आम लोग इन सवालों को जवाब नहीं जानते हैं. इसलिए आज यह जानने की कोशिश करते हैं कि ग्रह गोलाकार जैसे ही क्यों होते हैं और जब वे पूरी तरह से गोलाकार नहीं होते हैं तो उनका एक सा ही आकार क्यों होता है और इस पर क्या कहता है विज्ञान?

 

एक बड़ा सवाल
सवाल यही पैदा होता है की आखिर सभी ग्रह का आकार एक ही सा क्यों होता है और हमेशा गोलाकार सा ही क्यों होता बेलनाकार या आयताकार क्यों नहीं होता है. मजेदार बात यह है कि हमारे सूर्य का आकार भी कुछ ऐसा ही है. इन पिंडों के आकार को चपटा गोलाकार कहते हैं. जहां ये बीच में से ज्यादा फूले हुए होते हैं और ऊपर और नीचे थोड़े से दबे हुए से दिखाई देते हैं.

 

पूरे नहीं होते गोलाकार
ग्रहों के ध्रुव से होते हुई नापी गई परिधि भूमध्य रेखा की परिधि से छोटी होती है. जैसे पृथ्वी पर ही उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव जाकर फिर आगे जाकर वापस उत्तरी ध्रुव पर आने में कुल 39931 किलोमीटर का सफर करना होगा जबकि भूमध्य रेखा का एक चक्कर लगाने में 40070 किमोमीटर का सफर करना होगा.

 

असमान फुलाव
लेकिन भूमध्य रेखा पर इस तरह का फुलाव कई ग्रहों में ज्यादा होता है गुरु ग्रह की भूमध्य रेखा, ध्रवों की परिधि की तुलना में 0.3 प्रतिशत ज्यादा चौड़ी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने आकार के कई ग्रहों में तो यह अंततर सात प्रतिशत तक का भी हो जाता है. कुल मिलाकर थोड़े बहुत अंतर से सभी ग्रह, चाहे गैसीय हों या फिर पथरीले, एक ही आकार के होते हैं.

 

गुरुत्व का प्रभाव
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रहों के आकार के पीछे दो ही कारक काम करते हैं. धूर्णन और गुरुव ब्रह्माण्ड में जिस भी वस्तु में भार होगा उसे गुरुत्व का अनुभव जरूर होगा और इसकी वजह से इस गुरुत्व का प्रयास यही होता है कि पूरा का पूरा पदार्थ हर तरफ से अंदर की ही तरफ आ जाए और यह अंदर की ओर खिंचाव परमाणु के स्तर तक होता है.

 

केंद्र की ओर खिंचाव
सभी पिंड स्व गुरुत्व का अनुभव करते हैं. इस बल में सभी परमाणु एक केंद्र की ओर खिंचाव महसूस करत हैं. जैसे जैसे पिंड का द्रव्यमान बढ़ता जाता है,उसी के साथ उसका स्व गरुत्व का खिंचाव भी बढ़ता जाता है. भार और गुरुत्व बढ़ने के बाद एक स्थिति ऐसी हो जाती है कि पिंड का भार पास पास आ जाता है और गोलाकार ले लेता है. हलके पिंडों में कम स्व गुरुत्व की वजह से ऐसा नहीं हो पाता है.

 

और फिर घूर्णन भी
लेकिन जब स्व गुरुत्व का बल काम कर रहा होता है. उसी के साथ ही एक और प्रक्रिया काम कर रही होती है पिंड खुद का ही चक्कर लगाना शुरू कर देता है जिससे पिंड के अणु और अन्य भार का प्रभाव देने वाले पदार्थ एक दूसरे की तुलना में अपनी जगह ऐसी बना लेते हैं की धीरे धीरे घूमता हुआ पिंड ही गोलाकार होने लगता है. जैसे जैसे पिंड बड़ा और भारी होता जाता है धूर्णन तेज होने लगता है. इसी दौरान वह भूमध्य क्षेत्र से फूलने भी लगता है और आकार में विसंगति भी आने लगती है.

जहां ज्यादा तेजी से घूमने वाले ग्रह बीच में से फूले होते हैं, उनका आकार अलग होता है और वे ओब्लेट स्फियरॉयड होते हैं यानी गोलाकार लेकिन बीच में से फूले और ऊपर नीचे से कुछ दबे हुए होते हैं. वहीं सूर्य का भार यानि गुरुत्व तो बहुत ही ज्यादा है पर उसका घूर्णन की गति धीमी है वह 25 दिन में अपना एक चक्कर लगा पाता है इसलिए वह ज्यादा गोलाकार है. इसके अलावा आसपास के तारे और ग्रहों का गुरुत्व भी पिंड के आकार को प्रभावित करता है.

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