प्रोफसर सतीश धवन ने अपने जीवन में बहुत सारे विषयों में अध्ययन और शोधकार्य किया. पहले भारतीय विज्ञान केंद्र से जुड़ने के बाद वे कुछ ही सालों में उसके निदेशक बने गए और फिर 1971 में उन्होंने इसरो की कमान संभाली और अपने नेतृत्व, कार्यनिष्पादन, संवदेनशील प्रबंधक, लोकप्रिय शिक्षक रहे.

भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान में कई वैज्ञानिक हीरे और नगीने की तरह से ही देश के अंतरिक्ष विकास में योगदान दिया है. इन्हीं में एक प्रमुख नाम प्रोफेसर सतीश धवन का है. सतीश धवन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में उनका योगदान अद्वीतीय माना जाता है. उन्होंने इसरो के तीसरे चेयरमैन के रूप में कार्य कार्य किया था. 3 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर इसरो सहित पूरा देश उन्हें याद कर रहा है. श्रीहरिकोटा में स्थिति इसरो के स्पेस सेंटर को उन्हें समर्पित किया गया है, जो आज सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के नाम से जाना जाता है.

एक बड़े शोधकर्ता-धवन
सतीश धवन भारत के गणितज्ञ और एरोस्पेस इंजीनियर थे. उन्हें भारत मे प्रोयगात्मक फ्ल्यूड डायनामिक्स या द्रव्य गतिकी के पिता भी माना जाता है. 25 सितंबर 1920 को श्रीनगर में पैदा हुए धवन ने पहले भारत और फिर अमेरिका में शिक्षा ग्रहण की, जिसके बाद वे प्रवाह की विक्षुब्धता और परिसीमा स्तरों के शोध में बहुत बड़े शोधकर्ता बने.

 

इसरो को दी नई ऊंचाइयां
आज भारत के सबसे गर्वीले अंतरिक्ष संगठन इसरो के विकास में जिन वैज्ञानिकों ने योगदान दिया है उनमें इसरो के संस्थापक विक्रम साराभाई का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है. लेकिन ये प्रोफसर सतीश धवन ही थी जन्हें इसरो को एक नया विजन दिया और इसका को विश्वस्तरीय उन ऊंचाइयों पर पहुंचाया जहां वह आज है.

शिक्षा में अनोखा संयोजन
पंजाब यूनिवर्सिटी से गणित में बीए, अंग्रेजी साहित्य में एमए और फिर मेकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई की डिग्री हासिल कर धवन उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका चले गए  जहां मिनेसोटा यूनिवर्सिटी से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में एमएस की डिग्री हासिल की और फिर कैल्टैक में उसी विषय पर डीग्री हासिल की. कैल्टैक में ही उन्होंने एरोनॉटिक्स और गणीत में पीएचडी करने के दौरान उन्होंने द्रव गतिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए जिससे उन्हें प्रसिद्धि भी मिली.

वैज्ञानिक अफसर से इसरो तक
भारत लौटने के बाद वे भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरू के पहले सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर और कुछ सालों के बाद 1962 आईआईएससी के चेयरमैन के बन गए. वे इस पर पहुंचने वाले  सबसे युवा वैज्ञानिक थे और साथ ही सबसे लंबे समय तक भी इस पद पर रहे. 1971 में, जब वे कुछ समय अमेरिका में थे, उन्होंने विक्रम साराभाई की असमय मृत्यु के बाद उन्हें इसरो के अध्यक्षपद का प्रस्ताव दिया गया.

दो शर्तों और इसरो की अध्यक्षता
प्रोफेसर धवन ने इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने दो शर्तें रख दीं. पहली कि इसरो का मुख्यालय बेंगलुरू शिफ्ट किया जाए और वे आईआईएससी के निदेशक का पद इसरो से जुड़ने के बाद भी नहीं छोड़ेंगे. उनकी दोनों शर्तों को मान लिया गया. भारत लौटने के बाद उन्होंने इसरो की जिम्मेदारी सम्भाल ली.

इसरो में तरक्की का दौर
इसके बाद इसरो ने आमूलचूल बदलाव और तरक्की का दौर देखा. धवन ने प्रोजेक्ट डायरेक्टर को सभी शक्तियां देकर संस्थान को लाल फीताशाही से मुक्त कराया और बहुत ही अच्छे तरीके से कई परियोजनाओं को समय से पूरा किया कर मिसाल पेश की. उन्हीं के प्रयास से इसरो में आज निजी क्षेत्र की इतनी ज्यादा भागीदारी देखने को मिलती है. जिससे इसरो को निजी क्षेत्र विविध प्रकार के उच्च गुणवत्ता के हार्डवेयर उपलब्ध हो सके.

नेतृत्व की मिसाल
इसके अलावा उन्होंने युवा वैज्ञानिकों को भी बहुत प्रोत्साहित किया. इसमें भारत के मिसाइल मैन के नाम से मशहूर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सबसे उल्लेखनीय नाम है. जब भारत के सैटेलाइट लॉन्ट व्हीकल-3 का पहला प्रक्षेपण नाकाम हुआ तो नेतृत्व की मिसाल देते हुए धवन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब दिए और वादा किया कि अगला प्रपेक्षण सफल होगा, लेकिन उसके सफल होने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस का सामना डॉ कलाम ने किया.

प्रोफेसर धवन के कार्यकाल में इसरो सबसे ज्यादा और उल्लेखनीय तरक्की की. रिटायर होने के बाद भी धवन ने विज्ञान और प्रोद्योगिकी की मामलों में अपने ध्यान केंद्रित रहा. 3 जनवरी 2002 को उनकी मौत के होने पर देश ने केवल भारत का एक बड़ा वैज्ञानिक गंवा दिया बल्कि एक ऐसे नेतृत्व को खो दिया जो एक शोधवैज्ञानिक, तकनीकीविद, मैनेजर, लीडर, सलाहकार, के साथ एक बहुत ही अच्छे इंसान के रूप में भी जाने जाते रहे.

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