डी एन एस आनंद

आज 12 जनवरी है। स्वामी विवेकानंद की जयंती। 12 जनवरी 1863 को उनका जन्म कोलकाता में हुआ था। 4 जुलाई 1902 को महज 39 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हो गया। एक वेदांती संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने इतने कम समय में भी देश दुनिया के बारे में जो कुछ देखा, कहा, लिखा वह अतुलनीय है। भारत को आजाद हुए करीब 75 वर्ष हो गए। भारत ने हाल ही में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया। ऐसे में भारत के विभिन्न सामाजिक विसंगतियों पर उनका याद आना स्वाभाविक है। सामाजिक, आर्थिक विषमता एवं समाज में मौजूद विभिन्न प्रकार की गैर बराबरी, भेदभाव, शोषण उत्पीड़न पर उन्होंने करारा प्रहार किया था। नया भारत गढ़ने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘ हमारा राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है।’


स्वामी विवेकानंद ने भी आजाद भारत का सपना देखा था। देश की सामाजिक आर्थिक विषमता से वे दुखी थे। देश की गुलामी, तत्कालीन समाज में मौजूद गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, बदहाली एवं भेदभाव उन्हें व्यथित करती थी। फलस्वरूप

उन्होंने दो टूक कहा –

‘ मैं समझता हूं हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जन समुदाय की उपेक्षा है और वह भी हमारे पतन का एक कारण है।’ उनकी नजर में ‘भारत में दो बड़ी बुरी बातें हैं – स्त्रियों का तिरस्कार और गरीबों को जाति भेद द्वारा पीसना।’ मेहनत मजदूरी करने वाले कमजोर श्रमिक वर्ग को लक्षित करते हुए खुद को श्रेष्ठ बताने वाले लोगों से उन्होंने कहा ‘ ये जो किसान, मजदूर, मोची, मेहतर आदि हैं, इनकी कर्मशीलता और आत्मनिष्ठा तुममें से कइयों से कहीं अधिक है। ये लोग चिरकाल से चुपचाप काम करते जा रहे हैं, देश के लिए धन धान्य उत्पन्न कर रहे हैं। वास्तव में वे ही देश के रीढ़ हैं।’
स्वामी विवेकानंद मानते थे कि ‘भारत वर्ष के सभी अनर्थों की जड़ जन साधारण की गरीबी है।’ उन्होंने कहा ‘पुरोहित शक्ति और विदेशी विजेता गण सदियों से उन्हें कुचलते रहे, जिसके फलस्वरूप भारत के गरीब बेचारे यह तक भूल गए हैं कि वे भी मनुष्य हैं।’

वे यहीं नहीं रुकते तथा कहते हैं –
‘जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वास घातक समझूंगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचल कर धन पैदा किया है और अब ठाठ बाट से अकड़ कर चलते हैं। यदि उन करोड़ों देशवासियों के लिए,जो इस समय भूखे और अशिक्षित बने हुए हैं, कुछ नहीं करते तो वे घृणा के पात्र हैं।’
अब भी प्रासंगिक हैं विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद कहते थे कि ‘ हमारे कार्यों पर ही भारत का भविष्य निर्भर है। यदि भारत का भविष्य उज्जवल करना है तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन की, शक्ति संग्रह की, और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उनमें समन्वय लाने की।

धर्म की बात पर उन्होंने कहा –
‘ देखते नहीं, भारत पेट की चिंता से बेचैन है। धर्म की बात सुनाना हो तो पहले इस देश के लोगों के पेट की चिंता को दूर करना होगा। नहीं तो केवल व्याख्यान देने से विशेष लाभ नहीं होगा। पहले रोटी और तब धर्म चाहिए। गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं और हम आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं। मत मतांतरों से पेट नहीं भरता।’


उन्होंने संदेश देते हुए कहा –
‘हे भाइयों,हम सभी लोगों को इस समय कठिन परिश्रम करना होगा। अब सोने का समय नहीं है। पहले से बड़ी बड़ी योजनाएं न बनाओ, धीरे धीरे कार्य प्रारंभ करो। जिस जमीन पर खड़े हो, उसे अच्छी तरह से पकड़ कर क्रमशः ऊंचे चढ़ने की चेष्टा करो।’
उस वक्त भी भावी भारत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘मैं अपने मानस चक्षु से भावी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूं जिसका इस विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप में वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ उत्थान होगा। …. हमारी मातृभूमि के लिए इन दोनों विशाल मतों का सामंजस्य – हिंदुत्व और इस्लाम – वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर – यही एक आशा है’।


उनका यह आह्वान अहम है। –
‘एक नवीन भारत निकल पड़े। वह निकले हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुआ, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दूकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से। कारखाने से, हाट से, बाजार से। निकले झाड़ियों जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से ..
स्वामी विवेकानंद आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं पर उनके सपने उसके विचार हमारे बीच अब भी मौजूद हैं। आज स्वामी विवेकानंद की जयंती पर आइए, हम संकल्प दोहराएं तथा उनके सपनों का संविधान सम्मत, समतामूलक, अंधविश्वास मुक्त बेहतर समाज, देश, दुनिया बनाएं।

  डी एन एस आनंद
  महासचिव, साइंस फार सोसायटी, झारखंड
  संपादक, वैज्ञानिक चेतना, साइंस वेब पोर्टल, जमशेदपुर, झारखंड

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