सुसान चाको, ललित मौर्या
एनजीटी की सुनवाई ने प्लास्टिक ढक्कनों के प्रबंधन में बड़ी चूक को उजागर किया है। प्लास्टिक कचरे की समस्या का एक अनदेखा पहलू अब अदालत की दहलीज तक पहुंच गया है। पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर, कोल्ड ड्रिंक और अन्य पेय पदार्थों की बोतलों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के ढक्कन भी पर्यावरण के लिए संकट बन रहे हैं।

इस गंभीर मुद्दे पर 20 फरवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता के वकील ने ट्रिब्यूनल को बताया कि प्लास्टिक की बोतलें तो किसी हद तक इकट्ठा कर ली जाती हैं, लेकिन उनके अलग हो जाने वाले ढक्कन अक्सर कचरे में बिखर जाते हैं।

ये छोटे प्लास्टिक कैप न तो ठीक से एकत्र होते हैं और न ही रिसाइकिल, जिससे वे मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कई देशों में अब “टेदर्ड कैप” यानी बोतल से जुड़े रहने वाले ढक्कन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इन ढक्कनों को बोतल से अलग नहीं किया जा सकता, जिससे वे बोतल के साथ ही वापस एकत्र हो जाते हैं और पर्यावरण में नहीं बिखरते।

सवालों के घेरे में ईपीआर व्यवस्था
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) समेत कई बड़ी कंपनियों को नोटिस जारी किया है। इनमें कोका-कोला इंडिया, बिसलेरी इंटरनेशनल, हिंदुस्तान यूनिलीवर और पेप्सिको इंडिया होल्डिंग जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इन सभी पक्षों को अगली सुनवाई से कम-से-कम एक सप्ताह पहले अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

गौरतलब है कि प्लास्टिक कचरे को एकत्र करने और एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) सिस्टम के रेगुलेशन से जुड़ा एक मामला पहले ही ट्रिब्यूनल के सामने लंबित है। इन दोनों मामलों को एक साथ सुनने का फैसला करते हुए अगली तारीख 26 फरवरी 2026 तय की है।

यह सुनवाई साफ संकेत देती है कि अब प्लास्टिक प्रदूषण के छोटे-छोटे स्रोतों पर भी सख्ती बढ़ेगी, क्योंकि प्लास्टिक का एक छोटा ढक्कन भी बड़े पर्यावरणीय संकट की वजह बन सकता है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
