पर्यावरण का प्रदूषण प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जीवन को प्रभावित करता है। हमें पता नहीं चलता कि हमारे सेहत के साथ क्या हो रहा है। इसके मुख्य कारण हैं मानवीय गतिविधियां हैं जो एक से अधिक तरीकों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। प्रदूषण को रोकने के लिए वैश्विक चिंता है क्योंकि पृथ्वी पर हर कोई सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा, पीने के लिए पानी और हरियाली का आनंद लेने का हकदार है। खासकर इस साल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों और शहरों में पटाखों पर प्रतिबंध के बाद भी दिवाली के दौरान और बाद में प्रदूषण के स्तर में तेज वृद्धि देखी गई है।

National Pollution Control Day क्यों मनाते हैं

1984 में भोपाल गैस त्रासदी में अपनी जान गंवाने वाले हजारों लोगों और बढ़ते प्रदूषण की समस्याओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 2 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाया जाता है.  भोपाल गैस त्रासदी के वक्त पूरा शहर एक गैस चैंबर बन गया था जिसमें 3788 लोगों ने जान गंवा दी थी. लेकिन देश का एक और शहर है जो पिछले पचास साल में रह-रहकर गैच चैंबर बन जाता है. वह शहर है देश की राजधानी दिल्ली.

National Pollution Control Day का उद्देश्य क्या है

इस दिवस का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक आपदाओं के प्रबंधन और नियंत्रण के बारे में जागरूकता फैलाना, औद्योगिक प्रक्रियाओं या मानवीय लापरवाही से उत्पन्न प्रदूषण को रोकना, लोगों और उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण अधिनियमों के महत्व के बारे में जागरूक करना है। इस दिवस का उद्देश्य एयर, मिट्टी, साउंड और जल प्रदूषण की रोकने के बारे में लोगों को जागरुक करना भी है। अनेक उपायों के बावजूद, भारत में हर साल वायु गुणवत्ता लेवल गिरता जा रहा है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के निवासियों को सर्दियों की शुरुआत में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर का अनुभव होता है। हरियाणा और पंजाब राज्यों के आस-पास के कृषि क्षेत्रों में जलने वाले पराली के धुएं के साथ-साथ वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले धुएं ने प्रदूषण का स्तर बड़ा दिया। 

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार :

वायु प्रदूषण : 

जनसंख्या वृद्धि में बढ़ती प्रवृत्ति और वायु गुणवत्ता पर परिणामी प्रभाव भारतीय परिदृश्य में स्पष्ट हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के महानगरों में संयुक्त रूप से बड़ी संख्या में जनसंख्या रहती है। निरंतर जनसंख्या वृद्धि ने ऊर्जा खपत पर अत्यधिक दबाव डाला है, जिससे पर्यावरण और महानगरों की वायु गुणवत्ता प्रभावित हुई है।

  • परिवहन/वाहन उत्सर्जन: परिवहन सेक्टर करीब हर शहर में वायु प्रदूषकों का मुख्य योगदानकर्ता है, लेकिन शहरों में यह बहुत अधिक है। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहरों से आता है। कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), NOX, और NMVOCs वाहनों से होने वाले उत्सर्जन से प्रमुख प्रदूषक हैं।

  • कंस्ट्रक्शन और तोड़फोड़ : भारत में वायु प्रदूषण का एक अन्य प्रमुख स्रोत है कंस्ट्रक्शन वर्क और पुराने मकानों और निर्माण को तोड़ना। निर्माण चरण के बाद भी, इन इमारतों में जीएचजी उत्सर्जन के प्रमुख योगदान है। आजकल, हरित भवन टैक्नोलॉजी में बढ़ती रुचि और निर्माण के दौरान हरित बुनियादी ढांचे और सामग्रियों के उपयोग से इस मुद्दे से काफी हद तक निपटा जा सकता है, जिससे हमारी जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकता है और स्वच्छ वायु गुणवत्ता को बनाए रखा जा सकता है।
  • बायोमास, पराली जलाना: भारत में करीब 80% नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW) अभी भी खुले डंपिंग यार्ड और लैंडफिल में फेंक दिया जाता है, जिससे आसपास के इलाकों में दुर्गंध और खराब पानी के अलावा विभिन्न GHG उत्सर्जन होता है। MSW के उचित उपचार की कमी और बायोमास जलने से शहरों में वायु प्रदूषण हो रहा है।

जल प्रदूषण : शुद्ध जल में प्रदूषकों की उपस्थिति के कारण जल प्रदूषित हो जाता है। जल पीने और नहाने योग्य नही रहता है। प्रदूषित जल से कई बीमारियां होने की संभावना होती है। फैक्टरियों से निकला प्रदूषित रसायन और कचरा जल प्रदूषण करता है। घरेलू कचरा गंदगी को नदियों और तालाबों में फेंक दिया जाता है। इससे भी प्रदूषण होता है। मल मूत्र, शरीर की गंदगी को तालाबों में बहा दिया जाता है जिससे भी जल प्रदूषण होता है। पानी के जहाजों से रिसने वाले ऑयल से भी जल प्रदूषण होता है। 

भूमि प्रदूषण  : कृषि योग्य उपजाऊ मिट्टी में प्रदूषक बढ़ने से मृदा प्रदूषित हो जाती है। इससे भूमि कृषि योग्य नही रहती और फसलों को नुकसान होता है। मृदा के रासायनिक संगठनों में परिवर्तन हो जाता है। मृदा का प्रदूषित होना ही मृदा प्रदूषण कहलाता है। प्लास्टिक बैग का उचित निस्तारण नही होने से वो भूमि में दब जाते है। प्लास्टिक के कारण भी भूमि प्रदूषण होता है। 


ध्वनि प्रदूषण : जब आवाज शोर में बदल जाती है तब ध्वनि प्रदूषण होता है। ध्वनि की एक निश्चित तीव्रता होती है जिस पर कानों से आसानी से सुना जा सकता है। इससे तीव्रता से अधिक ध्वनि सुनने योग्य नही रहती है। वाहन जनित ध्वनि प्रदूषण, औधोगिक ध्वनि प्रदूषण, मनुष्य जनित ध्वनि प्रदूषण, प्राकृतिक ध्वनि प्रदूषण (भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट) 

1990 से शुरू हुआ याचिकाओं का दौर

सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण रोकने के लिए लगाई जा रही याचिकाओं का दौर नया नहीं है. 1990 में पर्यावरणविद और वकील एम सी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली प्रदूषण से जुड़ी याचिका लगाई थीं. इन पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट पिछले 25 सालों के दौरान अलग-अलग आदेश देता रहा है.  1985 में पहली बार एम सी मेहता ने दिल्ली के प्रदूषण को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी. इससे आप समझ सकते हैं कि दिल्ली 50 साल से गैस चेंबर बनती रही है. 

कोर्ट के आदेश पर उठाए गए कदम
-1996 में दिल्ली के ईंट भट्टों को बंद करने का आदेश दिया गया
-1998 में एनवायरमेंट प्रदूषण अथारिटी का गठन
-2004 में सैकड़ों उद्योगों के राजधानी से बाहर किया
-2000 में पेट्रोल डीजल बसों को सीएनजी में बदलने की सीमा तक की गई
-2001 में दिल्ली में पेरिफेरल रोड बनाने का सुझाव, 15 साल लगे बनने में
-2004 में अरावली में खनन पर नियंत्रण के आदेश
-2014 में 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों पर रोक
-2016 में पटाखों की बिक्री पर रोक
-2017 में पराली पर किसानों को जागरूक करने का आदेश

हर साल 15 लाख लोगों की मौत
वहीं  प्रदूषण से होने वाली मौतों पर नजर डालें तो हाल में पर्यावरणविद विमलेंद्रू झा ने बताया है कि देश में साल में 15 साल लोग प्रदूषण से जान गंवा देते हैं. वहीं अत्याधिक जहरीली गैसों के चलते दिल्ली के लोगों की औसत उम्र 9.5 साल तक कम हो जाती है. 

 

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