ललित मौर्या
स्टडी से पता चला है कि कोविड के दौरान अस्पताल में भर्ती न होने वाले मरीजों की रिकवरी भी संक्रमण के वर्षों बाद तक धीमी और अधूरी रह सकती है। भले ही लोगों को लगता है कि कोविड-19 का प्रकोप अब खत्म हो चुका है, लेकिन सच यह है कि इसके बाद होने वाली परेशानियां अब भी बहुतों का पीछा नहीं छोड़ रही।

स्वीडन के स्टॉकहोम में किए एक नए शोध से पता चला है कि कोविड का हल्का संक्रमण झेलने वाले मरीजों में भी ढाई साल बाद तक शारीरिक थकान, सांस फूलना और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि कोविड संक्रमण के बाद शरीर के ठीक होने की प्रक्रिया कई बार उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबी हो सकती है। अध्ययन से पता चला है कि जिन वयस्कों को कोविड के दौरान अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ी, उनमें भी लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक समस्याएं आम रहीं। इस शोध के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल बीएमसी पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं।

ढाई साल बाद भी खत्म नहीं हुई परेशानी
अपने इस स्टडी में स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने लॉन्ग कोविड (पोस्ट-कोविड स्थिति) से जूझ रहे 130 वयस्कों पर अध्ययन किया है। ये सभी लोग ऐसे थे जिन्हें कोविड के दौरान गंभीर बीमारी नहीं हुई थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं करना पड़ा था। इन सभी मरीजों की जांच स्टॉकहोम स्थित एक विशेष पोस्ट-कोविड क्लिनिक में की गई। शोधकर्ताओं ने संक्रमण के करीब 12 महीने बाद और फिर करीब 30 महीने बाद दोबारा उनकी जांच की। इस दौरान उनकी शारीरिक क्षमता, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य और खुद के स्वास्थ्य को लेकर उनकी राय का मूल्यांकन किया गया। इस अध्ययन के लिए आंकड़े अगस्त 2020 से दिसंबर 2024 के बीच जुटाए गए थे।

आधे लोगों में सांस फूलने की गंभीर समस्या
स्टडी से पता चला है कि समय के साथ मरीजों में कुछ सुधार तो जरूर दिखा, लेकिन कई समस्याएं लंबे समय तक बनी रहीं। ढाई साल बाद भी करीब 50 फीसदी मरीजों में सांस फूलने (डिस्प्निया) की गंभीर समस्या थी। वहीं करीब आधे लोगों में अवसाद के मध्यम से गंभीर लक्षण पाए गए और 42 फीसदी लोगों में शरीर के निचले हिस्सों में कमजोरी देखी गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि संक्रमण के एक साल बाद जिन मरीजों में कुछ समस्याएं दिखीं, उनमें ढाई साल बाद भी स्वास्थ्य के खराब रहने की संभावना ज्यादा थी। इनमें बैठने-उठने की क्षमता में कमी, शारीरिक गतिविधियों का कम होना और अवसाद के लक्षण शामिल थे। इसके अलावा, अधिक उम्र भी खराब स्वास्थ्य से जुड़ी पाई गई।

किन वजहों से ज्यादा खराब रही हालत?
अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जिन लोगों को कोविड के दौरान अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ा, उनकी रिकवरी भी संक्रमण के कई साल बाद तक धीरे-धीरे हो सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भले ही आंकड़ों में कुछ सुधार दिखा हो, लेकिन यह जरूरी नहीं कि मरीजों की हालत में कोई बड़ा और वास्तविक फर्क पड़ा हो। यह अध्ययन लॉन्ग कोविड की स्थिति को समझने में मदद करता है और यह भी बताता है कि मरीजों के ठीक होने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि लॉन्ग कोविड की स्थिति को बेहतर समझने और मरीजों के ठीक होने की प्रक्रिया पर और गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है। इस अध्ययन के नतीजे स्पष्ट हैं कोविड संक्रमण हल्का होने के बावजूद इसके असर वर्षों तक बने रह सकते हैं। इसलिए लॉन्ग कोविड को गंभीर स्वास्थ्य चुनौती मानते हुए समय पर पहचान, उपचार और मानसिक स्वास्थ्य सहायता बेहद जरूरी है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
