ललित मौर्या

वैज्ञानिकों के अनुसार, किचन स्पंज से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक और बर्तन धोते समय पानी की ज्यादा खपत मिलकर पर्यावरण पर बड़ा दबाव बना रहे हैं। कभी आपने सोचा है कि बर्तन धोते समय बहता पानी और हाथ में पकड़ा स्पंज सिर्फ गंदगी ही नहीं हटा रहे, बल्कि चुपचाप एक नया खतरा भी हमारे घर और पर्यावरण में घोल रहे हैं?

भले ही रसोई के सिंक के पास रखा यह छोटा-सा स्पंज एक मामूली सी चीज लगता है, लेकिन एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने इस स्पंज से जुड़ा ऐसा सच उजागर किया है, जो न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर भी करता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब हम रोजाना बर्तन धोते हैं, तो स्पंज धीरे-धीरे घिसता है और उससे प्लास्टिक के बेहद महीन कण निकलते हैं। इन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये कण आकार में इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई भी नहीं देते, लेकिन पानी के साथ बहकर नदियों, नालों, मिट्टी और आखिरकार हमारे खाने-पीने की चीजों तक पहुंच जाते हैं। चिंता की बात यह है कि वैज्ञानिकों को इंसानी शरीर में रक्त से लेकर कई अंगों तक में भी माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी के सबूत मिले हैं।

प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल एडवांसेज में प्रकाशित इस अध्ययन का मकसद यह समझना था कि रोजमर्रा में बर्तन धोते समय स्पंज से माइक्रोप्लास्टिक के कितने कण निकलते हैं और उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन की खास बात यह थी कि यह सिर्फ लैब में नहीं हुआ, बल्कि आम लोगों के घरों में भी इसकी जांच की गई। जर्मनी और उत्तरी अमेरिका के कई घरों में लोगों ने अपने रोजमर्रा के काम के दौरान अलग-अलग तरह के स्पंज इस्तेमाल किए और उनके इस्तेमाल का पूरा रिकॉर्ड रखा। स्पंज को इस्तेमाल से पहले और बाद में तौला गया, ताकि यह पता चल सके कि उससे कितना प्लास्टिक घिसकर निकल रहा है। इसके अलावा लैब में “स्पंजबॉट” नाम की एक मशीन से भी बर्तन धोने जैसी स्थिति पैदा कर परीक्षण किए गए।

कैसे स्पंज से निकलता है माइक्रोप्लास्टिक

निष्कर्ष दर्शाते हैं स्पंज इस्तेमाल के दौरान थोड़ा-थोड़ा घिसते हैं और इसी के साथ माइक्रोप्लास्टिक के कण भी निकलते हैं। वैज्ञानिकों ने गणना की है कि एक व्यक्ति के स्पंज से हर साल करीब 0.68 ग्राम से 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक के कण पैदा हो सकते हैं। यह मात्रा स्पंज के प्रकार पर निर्भर करती है। जिन स्पंज में प्लास्टिक कम होता है, उनसे माइक्रोप्लास्टिक भी कम निकलता है। भले ही यह मात्रा सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसे पूरे देश या दुनिया के स्तर पर जोड़कर देखा जाता है, तो यह हर साल कई टन माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है, जो नदियों, झीलों, मिट्टी और पर्यावरण में फैल रहा है। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि असल जिंदगी में हम स्पंज का कैसे इस्तेमाल करते हैं, उस पर पैदा होने वाले माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा भी निर्भर करती है। जितना ज्यादा जोर से स्पंज को रगड़ेंगे, उतने ज्यादा कण निकलेंगे। चिंता की बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक आज समुद्र, पीने के पानी, हवा और यहां तक कि मानव शरीर में भी पैठ बना चुके हैं। शुरुआती शोध बताते हैं कि ये कण सांस और स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं, हालांकि इस पर अभी और रिसर्च चल रही है।

स्पंज ही नहीं, पानी भी बड़ा कारण

अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, बर्तन धोने से पर्यावरण को होने वाले कुल नुकसान में सबसे बड़ा कारण माइक्रोप्लास्टिक नहीं, बल्कि पानी की खपत है। विश्लेषण में पाया गया कि बर्तन धोने से होने वाले कुल पर्यावरणीय प्रभाव का करीब 85 से 97 फीसदी हिस्सा सिर्फ पानी के इस्तेमाल से जुड़ा है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक का हिस्सा इससे काफी कम है। यानी हम किस तरह बर्तन धोते हैं, नल कितनी देर खुला रखते हैं, यह स्पंज के प्रकार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। देखा जाए तो यह अध्ययन हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सावधान करने के लिए है।

हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें भी पर्यावरण पर बड़ा असर डालती हैं। अगर हम बर्तन धोते समय कम पानी इस्तेमाल करें, कम प्लास्टिक वाले स्पंज चुनें और स्पंज को थोड़ा ज्यादा समय तक इस्तेमाल करें, तो हम इस प्रदूषण के अदृश्य खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। शायद अब समय आ गया है कि हम साफ-सफाई के तरीके के साथ-साथ उसके पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में भी सोचना शुरू करें, क्योंकि रसोई की सिंक से निकलने वाला पानी आखिरकार किसी नदी, किसी खेत और समुद्र तक जरूर पहुंचता है। हमे समझना होगा कि एक छोटा-सा स्पंज, एक खुला नल, और हमारी रोजमर्रा की आदतें, पर्यावरण की बड़ी कहानी यहीं से शुरू होती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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