ललित मौर्या
दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो दुनिया की आधी आबादी यानी 410 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहां कुछ हजार सबसे अमीर लोगों के पास इतनी छिपी हुई दौलत है, जो दुनिया की आधी आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह सिर्फ असमानता की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की कहानी है, जहां अमीरों के लिए नियम अलग और आम लोगों के लिए अलग हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने टैक्स से बचने के लिए विदेशों में इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो दुनिया की आधी गरीब आबादी (करीब 410 करोड़ लोगों) की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह खुलासा ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट में हुआ है, जो पनामा पेपर्स की 10वीं वर्षगांठ से पहले जारी की गई है।

दुनिया में गरीबी की बड़ी वजह ‘छिपा हुआ पैसा’
इसका मतलब कहीं न कहीं दुनिया में गरीबी की सबसे बड़ी वजह पैसे की कमी नहीं, बल्कि छिपा पैसा है। जब करोड़ों लोग बेहतर अस्पताल, स्कूल और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसी समय दुनिया के सबसे अमीर लोग अपनी खरबों डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन में छिपा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में करीब 3.55 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन देशों और गुप्त खातों में छिपाई गई। यह रकम फ्रांस की पूरी अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है और दुनिया के 44 सबसे कमजोर देशों की कुल जीडीपी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है।

ऑक्सफैम के मुताबिक, टैक्स से छिपाई गई इस कुल संपत्ति का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों के पास है, यानी करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर की रकम इन लोगों ने दबा रखी है। वहीं, इस समूह के अंदर भी सबसे अमीर सुपर रिच 0.01 फीसदी लोगों के पास ही करीब 1.77 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति छिपी हुई है। ऑक्सफैम इंटरनेशनल के टैक्स विशेषज्ञ क्रिश्चियन हॉलम का कहना है, “पनामा पेपर्स ने एक ऐसी छिपी दुनिया का पर्दाफाश किया था, जहां सबसे अमीर लोग अपनी संपत्ति टैक्स और जांच से बचाने के लिए विदेशों में छिपा देते हैं। दस साल बाद भी यह सिलसिला जारी है और सुपर-रिच लोग अब भी भारी मात्रा में संपत्ति टैक्स हेवन यानी विदेशों के गुप्त खातों में छिपा रहे हैं।“

अमीरों की टैक्स चोरी से आम लोगों पर पड़ रहा बोझ
उनके मुताबिक यह सिर्फ टैक्स बचाने का मामला नहीं, बल्कि ताकत और असमानता का मुद्दा है। जब अरबपति और करोड़पति टैक्स से बचते हैं, तो उसका असर आम लोगों पर पड़ता है, सरकारी अस्पतालों और स्कूलों के लिए पैसे कम पड़ जाते हैं, असमानता बढ़ती है और एक ऐसी व्यवस्था का बोझ आम लोगों पर आ जाता है, जो कुछ अमीर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनी है।“ उनके मुताबिक यह सिर्फ टैक्स बचाने का मामला नहीं, बल्कि ताकत और असमानता का मुद्दा है। जब अरबपति और करोड़पति टैक्स से बचते हैं, तो उसका असर आम लोगों पर पड़ता है, सरकारी अस्पतालों और स्कूलों के लिए पैसे कम पड़ जाते हैं, असमानता बढ़ती है और पूरे सिस्टम का बोझ आम जनता पर आ जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में छिपी बिना टैक्स वाली संपत्ति अब भी दुनिया के कुल जीडीपी का करीब 3.2 फीसदी है। यानी समस्या अभी भी बड़ी है। हालांकि कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन समस्या अभी भी बड़ी है। कई कमजोर और विकासशील देश टैक्स जानकारी साझा करने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से बाहर हैं, जबकि उन्हें टैक्स से होने वाले राजस्व की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी व्यवस्था की वजह से पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में छिपी संपत्ति थोड़ी कम हुई है।

सुपर-रिच पर ज्यादा टैक्स की मांग
ऐसे में ऑक्सफैम ने सरकारों से मांग की है कि सुपर-रिच लोगों पर टैक्स लगाने के लिए वैश्विक स्तर पर सख्त नियम बनाए जाएं। टैक्स हेवन पर रोक लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाया जाए और सबसे अमीर एक फीसदी लोगों पर ज्यादा प्रभावी टैक्स लगाया जाए, ताकि बढ़ती असमानता को कम हो सके। रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है, दुनिया में पैसा है, लेकिन वह छिपा हुआ है। अगर सबसे अमीर लोग ईमानदारी से टैक्स दें, तो सरकारों के पास अस्पताल, स्कूल और सामाजिक योजनाओं के लिए पैसों की कमी नहीं होगी।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
