नागालैंड की कोन्याक जनजाति के पांच-पौधों वाले हर्बल नुस्खे में मिले ऐसे प्राकृतिक यौगिक, जो ट्यूमर की नई रक्त वाहिकाएं बनाने की प्रक्रिया रोककर कैंसर की बढ़त थामने की क्षमता दिखाते हैं। नागालैंड विश्वविद्यालय, बेरहामपुर विश्वविद्यालय और सविता मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक शोध में नागालैंड की कोन्याक जनजाति के पारंपरिक हर्बल नुस्खे में कैंसर-रोधी गुणों की पहचान की है। दावा किया गया है कि यह अध्ययन न केवल आदिवासी ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक आधार देने का प्रयास है, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भी नई संभावनाओं के द्वार खोलता है।

विश्वविद्यायालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि देश और दुनिया के कई आदिवासी समुदायों में सदियों से जड़ी-बूटियों के माध्यम से विभिन्न बीमारियों का उपचार किया जाता रहा है। हालांकि, इन पारंपरिक उपचार पद्धतियों के प्रभाव और उनके कार्य करने के तरीके (मेकैनिज्म) को समझने के लिए अब तक बहुत कम वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से इस शोध में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़ा गया। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पांच अलग-अलग औषधीय पौधों से बने एक विशेष हर्बल मिश्रण (पॉलीहर्बल फॉर्मुलेशन) का गहन विश्लेषण किया। आधुनिक तकनीकों, जैसे जीसी-एमएस (गैस क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री) और कंप्यूटर आधारित मॉलिक्यूलर सिमुलेशन की मदद से यह पता लगाया गया कि इस मिश्रण में मौजूद सक्रिय जैव-रासायनिक तत्व वीईजीएफआर2 नामक एक महत्वपूर्ण प्रोटीन को प्रभावी ढंग से निशाना बनाते हैं। यह प्रोटीन ट्यूमर में नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण (एंजियोजेनेसिस) के लिए जिम्मेदार होता है, जो कैंसर के फैलने और बढ़ने में अहम भूमिका निभाता है।

शोध में यह पाया गया कि इन प्राकृतिक यौगिकों में कैंसर की वृद्धि को रोकने की क्षमता है और इनका प्रदर्शन कई मौजूदा दवाओं के समान प्रभावी हो सकता है। विशेष रूप से, इन यौगिकों ने वीईजीएफआर2 के साथ स्थिर और मजबूत जुड़ाव (इंटरैक्शन) दिखाया, जो यह संकेत देता है कि ये भविष्य में कैंसर-रोधी दवाओं के रूप में विकसित किए जा सकते हैं। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया कि ये प्राकृतिक तत्व समान प्रकार के अन्य प्रोटीनों की तुलना में वीईजीएफआर2 को अधिक सटीकता से लक्षित करते हैं। इससे संभावित रूप से दवाओं के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं, जो आधुनिक कैंसर उपचार में एक बड़ी चुनौती है। शोध के अनुसार, इन यौगिकों की विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) भी कम पाई गई और इनके शरीर में अवशोषण, वितरण और प्रभाव (फार्माकोकाइनेटिक गुण) संतोषजनक रहे। इसका मतलब है कि ये यौगिक आगे चलकर सुरक्षित और प्रभावी दवाओं के विकास के लिए उपयुक्त उम्मीदवार हो सकते हैं।

यह शोध “माइक्रोकेमिकल जर्नल” नामक अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहकर्मी-समीक्षित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जो सूक्ष्म स्तर पर रासायनिक पदार्थों के विश्लेषण और मापन से संबंधित शोध प्रकाशित करती है। नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक ने इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि यह शोध पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का उत्कृष्ट संगम है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अध्ययन न केवल स्थानीय ज्ञान परंपराओं को सम्मान देते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर कम लागत और कम दुष्प्रभाव वाली चिकित्सा पद्धतियों के विकास में भी योगदान दे सकते हैं।

शोध का नेतृत्व कर रहे डॉ. जी. बुपेश ने बताया कि यह पहली बार है जब कोन्याक जनजाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले इस विशिष्ट पांच-पौधों वाले हर्बल नुस्खे का आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से विस्तृत विश्लेषण किया गया है। उन्होंने कहा कि उन्नत तकनीकों की मदद से ऐसे कई जैव सक्रिय तत्वों की पहचान की गई है, जिनमें मजबूत कैंसर-रोधी क्षमता है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन अभी प्रारंभिक और कंप्यूटेशनल स्तर पर आधारित है। इन निष्कर्षों को पूरी तरह प्रमाणित करने के लिए प्रयोगशाला में परीक्षण (इन-विट्रो) और मानव पर क्लिनिकल परीक्षण (इन-विवो) आवश्यक होंगे, विशेष रूप से कोलन कैंसर के उपचार के संदर्भ में।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि पारंपरिक ज्ञान केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं है, बल्कि उसमें आधुनिक चिकित्सा के लिए उपयोगी वैज्ञानिक संभावनाएं भी छिपी हैं। यदि ऐसे ज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से समझा और विकसित किया जाए, तो यह सस्ती, प्रभावी और प्रकृति-आधारित दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार, यह शोध न केवल चिकित्सा विज्ञान में नवाचार की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह आदिवासी समुदायों के ज्ञान और परंपराओं को संरक्षित और सम्मानित करने का भी एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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