दयानिधि

नैनोफाइबर तकनीक से दवाएं सीधे ट्यूमर तक पहुंचकर ग्लियोब्लास्टोमा के इलाज में बेहतर असर दिखा रही हैं और जीवनकाल बढ़ा सकती हैं। ग्लियोब्लास्टोमा क्या है? ग्लियोब्लास्टोमा मस्तिष्क का एक अत्यंत आक्रामक और तेजी से बढ़ने वाला कैंसर है। यह वयस्कों में पाया जाने वाला सबसे आम ब्रेन कैंसर माना जाता है। यह रोग मस्तिष्क की सहायक कोशिकाओं से शुरू होता है, जिन्हें ग्लियल सेल्स कहा जाता है। ये कोशिकाएं सामान्य रूप से मस्तिष्क को सहारा देने का काम करती हैं, लेकिन जब इनमें असामान्य बदलाव होता है तो ये कैंसर का रूप ले लेती हैं। इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह एक जगह सीमित नहीं रहता, बल्कि मस्तिष्क के आसपास के ऊतकों में फैल जाता है, जिससे इसे पूरी तरह निकालना मुश्किल हो जाता है।

इलाज में आने वाली चुनौतियां

ग्लियोब्लास्टोमा का इलाज करना बहुत कठिन माना जाता है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इसके भीतर अलग-अलग प्रकार की कैंसर कोशिकाएं होती हैं, जो समय के साथ बदलती रहती हैं और इलाज के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेती हैं। इसके अलावा, मस्तिष्क में मौजूद “ब्लड-ब्रेन बैरियर” नामक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली कई दवाओं को मस्तिष्क तक पहुंचने से रोक देती है। यह प्रणाली शरीर को जहरीले पदार्थों से बचाती है, लेकिन इसी कारण कई दवाएं कैंसर कोशिकाओं तक ठीक से नहीं पहुंच पातीं। यही वजह है कि इस बीमारी में दोबारा कैंसर होने की आशंका भी बहुत अधिक रहती है।

नई तकनीक पर शोध

अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी और जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने इस चुनौतीपूर्ण बीमारी के इलाज के लिए एक नई तकनीक विकसित की है। इस शोध में नैनोफाइबर आधारित एक विशेष दवा-डिलीवरी सिस्टम तैयार किया गया है, जिसे इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीक की मदद से बनाया गया है। इस तकनीक में एक विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके बहुत पतले रेशों की जाली बनाई जाती है, जिसमें दवाओं को समाहित किया जाता है। इस प्रणाली का उद्देश्य यह है कि दवाएं सीधे ट्यूमर के स्थान पर धीरे-धीरे और लंबे समय तक रिलीज होती रहें। इससे दवा का असर लगातार बना रहता है और कैंसर कोशिकाओं को बेहतर तरीके से खत्म किया जा सकता है। यह शोध एसीएस बायोमटीरियल्स साइंस एंड इंजीनियरिंग नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

तीन दवाओं का मिला-जुला प्रभाव

इस शोध में तीन पहले से स्वीकृत दवाओं का उपयोग किया गया है -टेमोजोलोमाइड, एक्रिफ्लाविन और पीटी2385। इन दवाओं को अलग-अलग देने पर जितना असर होता है, उससे कहीं अधिक प्रभाव तब देखा गया जब इन्हें एक साथ नैनोफाइबर में मिलाकर दिया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस संयोजन ने “सिनर्जिज्म” दिखाया, यानी दवाएं मिलकर अकेले से ज्यादा प्रभावी साबित हुईं। शोध में पाया गया कि इस तीन-दवा संयोजन ने कई प्रयोगात्मक मॉडल में बेहतर परिणाम दिए और चूहों पर किए गए परीक्षणों में उनकी जीवन अवधि भी बढ़ गई।

पशु परीक्षण के नतीजे

प्रयोगों में देखा गया कि जिन चूहों को कोई इलाज नहीं दिया गया, उनकी मृत्यु लगभग 19 दिनों के भीतर हो गई। वहीं, जिन चूहों को नैनोफाइबर आधारित तीन-दवा उपचार दिया गया, वे इससे लगभग दोगुना समय तक जीवित रहे। कुछ मामलों में लगभग 40 प्रतिशत चूहे 120 दिनों तक जीवित रहे, जो इस बीमारी के सामान्य परिणामों की तुलना में काफी बेहतर माना गया।

तकनीक की खासियत

इस नई प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दवाओं को सीधे ट्यूमर वाले स्थान पर नियंत्रित तरीके से पहुंचाती है। इससे पूरे शरीर पर दवाओं के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं। इसके अलावा, यह तकनीक लंबे समय तक दवा छोड़ने की क्षमता रखती है, जिससे बार-बार दवा देने की आवश्यकता कम हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तरीका भविष्य में सर्जरी के बाद मरीजों के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है।

भविष्य की संभावनाएं

शोधकर्ता अब इस तकनीक को और बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं ताकि दवाओं का असर अधिक समय तक और अधिक प्रभावी तरीके से बना रहे। उनका मानना है कि यह प्रणाली केवल ब्रेन कैंसर ही नहीं, बल्कि अन्य कठिन बीमारियों के इलाज में भी उपयोगी हो सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी के वैज्ञानिकों के अनुसार, उनका अंतिम लक्ष्य एक ऐसा इलाज विकसित करना है जिसे आसानी से क्लिनिकल स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके और जिससे मरीजों की जीवन गुणवत्ता और जीवित रहने की संभावना दोनों में सुधार हो। ग्लियोब्लास्टोमा जैसी खतरनाक बीमारी के इलाज में अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन नैनोफाइबर आधारित यह नई तकनीक एक महत्वपूर्ण उम्मीद के रूप में सामने आई है। यह शोध बताता है कि आधुनिक विज्ञान और नई दवा-डिलीवरी तकनीकों की मदद से भविष्य में इस गंभीर बीमारी के इलाज में बड़ा बदलाव संभव हो सकता है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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