दयानिधि
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और डिमेंशिया का संबंध उजागर, आईसीएमआर-एनआईएन अध्ययन में विटामिन डी, बी2, बी6 और बी12 की कमी को बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा गया। भारत में लोगों की औसत आयु बढ़ रही है। इसके साथ ही बुजुर्ग आबादी की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। उम्र बढ़ने के साथ कई गैर-संचारी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इनमें डिमेंशिया एक गंभीर समस्या बनकर उभर रही है। डिमेंशिया ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में डिमेंशिया के मामलों में काफी वृद्धि हो सकती है। इसी बीच भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान (आईसीएमआर-एनआईएन) द्वारा किए गए एक अध्ययन ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। अध्ययन में पाया गया है कि कुछ जरूरी विटामिनों की कमी और डिमेंशिया के बढ़े हुए खतरे के बीच गहरा संबंध हो सकता है। यह अध्ययन द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथ-ईस्ट एशिया में प्रकाशित किया गया है।

556 लोगों पर किया गया अध्ययन
यह अध्ययन तेलंगाना के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 40 से 80 वर्ष आयु वर्ग के 556 लोगों पर किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के स्वास्थ्य, खानपान और पोषण स्तर का विस्तृत मूल्यांकन किया। साथ ही उनकी मानसिक क्षमता और डिमेंशिया के जोखिम का भी आकलन किया गया। अध्ययन में प्रतिभागियों के रक्त में विभिन्न विटामिनों की मात्रा की जांच की गई। इसके अलावा उनके भोजन की विविधता और रोजमर्रा के आहार संबंधी आदतों का भी अध्ययन किया गया।

40 प्रतिशत लोग अधिक खतरे में
अध्ययन के परिणामों से पता चला कि लगभग 40 प्रतिशत प्रतिभागियों में डिमेंशिया का अनुमानित जोखिम अधिक था। इन लोगों में पोषण संबंधी कमियां भी ज्यादा देखने को मिलीं। विशेष रूप से विटामिन डी, विटामिन बी2, विटामिन बी6 और विटामिन बी12 की कमी उच्च जोखिम वाले लोगों में अधिक पाई गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये सभी विटामिन मस्तिष्क के सामान्य कार्यों और तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भोजन की गुणवत्ता भी अहम
अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन लोगों में डिमेंशिया का खतरा अधिक था, उनका भोजन अपेक्षाकृत कम विविधता वाला था। वे फल, सब्जियां और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ कम मात्रा में लेते थे। इसके विपरीत, ऐसे लोगों के आहार में संतृप्त वसा यानी सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक और असंतृप्त वसा की मात्रा कम पाई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित और विविध आहार शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक कमी
शोध में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में विटामिन की कमी शहरी लोगों की तुलना में अधिक पाई गई। इससे संकेत मिलता है कि ग्रामीण आबादी विशेष रूप से पोषण संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और जागरूकता की कमी जैसी समस्याएं ग्रामीण क्षेत्रों में डिमेंशिया के खतरे को बढ़ा सकती हैं।

रोकथाम पर देना होगा जोर
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि भारत में बढ़ती बुजुर्ग आबादी के कारण साल 2050 तक डिमेंशिया के मामलों में बड़ी वृद्धि हो सकती है। उन्होंने कहा कि अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पोषण और डिमेंशिया का खतरे के बीच अहम संबंध है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन है, इसलिए इससे सीधे यह साबित नहीं किया जा सकता कि विटामिन की कमी ही डिमेंशिया का कारण बनती है। फिर भी यह अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है कि बेहतर पोषण से जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

स्वस्थ जीवनशैली है जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार डिमेंशिया के कई जोखिम कारकों को नियंत्रित किया जा सकता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता, अवसाद और सामाजिक अलगाव जैसे कारकों पर नियंत्रण रखने से डिमेंशिया का खतरा कम किया जा सकता है। इसके साथ ही संतुलित आहार, पर्याप्त मात्रा में फल और सब्जियों का सेवन, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी जरूरी है। विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर भोजन मस्तिष्क को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भविष्य की रणनीति में पोषण को मिले स्थान
आईसीएमआर-एनआईएन के अध्ययन में कहा गया है कि वर्तमान में डिमेंशिया को पूरी तरह ठीक करने वाली प्रभावी दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए खतरों के कारणों की समय रहते पहचान और उनकी रोकथाम सबसे महत्वपूर्ण उपाय है। शोध में कहा गया है कि भविष्य की डिमेंशिया रोकथाम रणनीतियों में पोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की स्थिति को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। स्वस्थ और संतुलित आहार न केवल शरीर बल्कि मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है। यही स्वस्थ और सक्रिय वृद्धावस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
