दयानिधि

अल नीनो के खतरे को कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने बादलों को चमकीला बनाने वाली तकनीक पर किया अध्ययन, लेकिन बड़े स्तर पर इस्तेमाल से पहले सावधानी जरूरी। दुनिया में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम के बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक पर अध्ययन किया है, जो भविष्य में बड़े मौसम संबंधी संकटों से निपटने में मदद कर सकती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो के स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में देखा है कि क्या समुद्र के ऊपर बादलों को अधिक चमकीला बनाकर बड़े अल नीनो प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। यह अध्ययन उस समय सामने आया है, जब वैज्ञानिकों ने एक मजबूत या “सुपर” अल नीनो की आशंका जताई है। अल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, तेज गर्मी, सूखा और अन्य मौसम संबंधी घटनाएं बढ़ सकती हैं। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

ऑस्ट्रेलिया की आग बनी प्राकृतिक प्रयोगशाला

वैज्ञानिकों को इस तकनीक के अध्ययन में 2019 और 2020 में ऑस्ट्रेलिया में लगी भीषण जंगल की आग से मदद मिली। इन आगों से बड़ी मात्रा में धुआं वातावरण में पहुंचा। इस धुएं में छोटे-छोटे कण मौजूद थे, जो बादलों के साथ मिलकर उन्हें अधिक चमकीला बना सकते थे। वैज्ञानिकों के अनुसार, चमकीले बादल ज्यादा मात्रा में सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष की ओर भेजते हैं। इससे समुद्र और वातावरण में गर्मी का संतुलन बदल सकता है। ऑस्ट्रेलिया की आग से निकले धुएं ने प्रशांत महासागर के ऊपर मौजूद बादलों को प्रभावित किया और मौसम के पैटर्न में बदलाव देखा गया। इस घटना को वैज्ञानिकों ने एक प्राकृतिक प्रयोग की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि अगर ऐसी प्रक्रिया जानबूझकर अल नीनो के समय की जाए तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं।

समुद्री बादलों को चमकीला बनाने की तकनीक

इस तकनीक को “मरीन क्लाउड ब्राइटनिंग” कहा जाता है। इसमें समुद्र के ऊपर मौजूद बादलों में छोटे-छोटे परावर्तक कण पहुंचाने की कल्पना की जाती है, जिससे बादल ज्यादा रोशनी वापस भेज सकें। वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल की मदद से अध्ययन किया कि अगर 1997 और 2015 जैसे बड़े अल नीनो के समय प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में यह तकनीक अपनाई जाती तो क्या होता। मॉडल के अनुसार, अगर यह प्रक्रिया सही समय पर शुरू की जाए तो अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रशांत महासागर के कुछ क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल करने से ला नीना जैसी ठंडी और सूखी परिस्थितियां 40 प्रतिशत से अधिक मजबूत हो सकती हैं।

वैज्ञानिकों ने जताई सावधानी

हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इस तकनीक को अभी वास्तविक दुनिया में इस्तेमाल करने की कोई योजना नहीं है। मौसम और जलवायु प्रणाली बहुत जटिल है और किसी भी बड़े बदलाव के अनचाहे परिणाम हो सकते हैं। शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि इस तरह की तकनीक को लेकर अभी बहुत अधिक शोध की जरूरत है। उनके अनुसार, यह सामान्य भू-इंजीनियरिंग योजनाओं से अलग सोच है, क्योंकि इसका इस्तेमाल लंबे समय तक जलवायु बदलने के लिए नहीं बल्कि किसी खास प्राकृतिक घटना के प्रभाव को कम करने के लिए किया जा सकता है।

भू-इंजीनियरिंग पर जारी है बहस

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए भू-इंजीनियरिंग की तकनीकों पर कई वर्षों से चर्चा होती रही है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसी तकनीकें भविष्य में मददगार साबित हो सकती हैं, जबकि कई विशेषज्ञ इसके जोखिमों को लेकर चिंतित हैं। आलोचकों का कहना है कि बादलों या वातावरण में बदलाव करने से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अप्रत्याशित प्रभाव पड़ सकते हैं। इसलिए बिना पूरी जानकारी के बड़े स्तर पर ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।

भविष्य में बन सकती है एक अतिरिक्त तैयारी

अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर भविष्य में यह तकनीक सुरक्षित साबित होती है तो यह बाढ़ नियंत्रण, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और अन्य आपदा प्रबंधन उपायों के साथ एक अतिरिक्त साधन बन सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक घटनाओं जैसे अल नीनो को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उनके प्रभाव को कम करने के तरीके खोजे जा सकते हैं। यह शोध इसी दिशा में एक नया कदम है। हालांकि, इसका वास्तविक उपयोग करने से पहले सुरक्षा, पर्यावरण और वैश्विक सहयोग जैसे कई मुद्दों पर गंभीर विचार करना होगा।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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