ललित मौर्या

पिछले 33 वर्षों में भारत में बीमारी के साथ बीतने वाले जीवन के साल 26 फीसदी बढ़ गए हैं, जो बता रहे हैं कि लंबी उम्र अब स्वस्थ जिंदगी की गारंटी नहीं रही। अक्सर हम अपनों की लंबी उम्र की दुआ मांगते हैं, लेकिन क्या वो लंबी उम्र सेहतमंद भी है? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब बेहद परेशान कर देने वाला है। यह सही है कि चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने इंसानों की उम्र तो बढ़ा दी है, लेकिन क्या हम इसके साथ उतने ही स्वस्थ भी रह पा रहे हैं? प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट ने इस सवाल का जो जवाब दिया है, वो बेहद चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित दुनिया भर में लोग पहले से अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं, लेकिन उनकी जिंदगी के अतिरिक्त सालों का बड़ा हिस्सा बीमारियों, दर्द और शारीरिक कमजोरियों के साथ गुजर रहा है। यानी लंबी उम्र का मतलब अब जरूरी नहीं कि बेहतर और स्वस्थ जीवन भी हो।

लंबी हुई जिंदगी, लेकिन पीछे छूट गई सेहत

लैंसेट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में हर व्यक्ति अपनी जिंदगी के औसतन 10.5 साल बीमारी, दर्द या शारीरिक दिव्यांगता के साथ बिता रहा है। रुझानों पर नजर डाले तो 1990 में यह अवधि 8.4 साल थी, यानी पिछले 33 वर्षों में इसमें 2.2 साल (करीब 26 फीसदी) की बढ़ोतरी हुई है। यह स्पष्ट संकेत है कि देश में लोगों का जीवन तो लंबा हो रहा है, लेकिन स्वस्थ जीवन के साल उसी गति से नहीं बढ़ रहे।  रिपोर्ट की मानें तो यह रुझान केवल भारत तक सीमित नहीं है। अध्ययन में शामिल 204 देशों और क्षेत्रों में से अधिकांश में बीमारी के साथ बिताए जाने वाले वर्षों में वृद्धि दर्ज की गई। वैश्विक स्तर पर यह अवधि 1990 में 8.8 साल दर्ज की गई थी, जो 2023 में बढ़कर 10.7 साल पर पहुंच गई। यानी दुनिया भर में लोग पहले से अधिक समय तक जीवित तो रह रहे हैं, लेकिन उनके अतिरिक्त वर्षों का बड़ा हिस्सा बीमारी और शारीरिक अक्षमता के साथ गुजर रहा है।

रुझानों में छिपी कड़वी हकीकत

रुझान दर्शाते हैं कि 2023 में दुनिया भर के लोग अपनी कुल जिंदगी का औसतन 14.5 फीसदी हिस्सा खराब स्वास्थ्य में बिता रहे थे, जबकि 1990 में यह आंकड़ा 13.6 फीसदी था। हैरान कर देने वाली बात है कि इस दौरान दुनिया में औसत जीवन प्रत्याशा 64.6 वर्षों से बढ़कर 73.8 पर पहुंच गई, जबकि स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 55.9 वर्ष से बढ़कर 63.1 वर्ष तक पहुंची। यानी जीवन तो करीब 9 साल लंबा हुआ, लेकिन स्वस्थ जीवन के महज करीब सात साल ही बढे। यह अंतर लगातार बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती की ओर इशारा करता है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो चिकित्सा विज्ञान ने लोगों की उम्र तो बढ़ा दी, लेकिन उन अतिरिक्त वर्षों को स्वस्थ बनाने में उतनी सफलता नहीं मिली।

अब सिर्फ बुढ़ापे की साथी नहीं बीमारियां

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बीमारी का यह बोझ अब केवल जीवन के आखिरी वर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवावस्था और अधेड़ उम्र के लोग भी लंबे समय तक बीमारी या दूसरी समस्याओं के साथ जीने को मजबूर हैं। रिपोर्ट में एक हैरान कर देने वाली तस्वीर भी सामने आई है, जिन देशों में लोग सबसे अधिक उम्र तक जीते हैं, वहीं बीमारी और अक्षमता के साथ बिताए जाने वाले साल भी सबसे ज्यादा हैं। उदाहरण के लिए 2023 में अमेरिका में लोग औसतन 14 साल, ऑस्ट्रेलिया में 13.9 साल और कनाडा में 13.7 साल खराब स्वास्थ्य के साथ जी रहे थे। इसके विपरीत, उप-सहारा अफ्रीका में यह अंतर सबसे कम, करीब 9 साल रहा।

महिलाएं ज्यादा जीती हैं, लेकिन ज्यादा साल बीमारी में भी बिताती हैं

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि दुनिया के करीब-करीब हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक उम्र तक जीवित रहती हैं, लेकिन वे बीमारी और अक्षमता के साथ भी ज्यादा वर्ष बिताती हैं। 2023 में महिलाओं ने औसतन 12.1 वर्ष, जबकि पुरुषों ने 9.3 वर्ष खराब स्वास्थ्य के साथ बिताए। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दुनिया भर में खराब स्वास्थ्य के साथ कट रहे जीवन के सालों के पीछे कोई अचानक आने वाली जानलेवा आफत नहीं, बल्कि वे खामोश बीमारियां हैं जो इंसान को मारती तो नहीं, पर तिल-तिल कर तोड़ देती हैं। आज हड्डियों और मांसपेशियों का असहनीय दर्द (विशेषकर कमर दर्द), अवसाद और चिंता जैसी मानसिक लाचारियां, ढलती उम्र में घटती सुनने की क्षमता और हादसों में लगने वाली चोटें इंसान से उसकी सेहतमंद जिंदगी छीन रही हैं। इसके साथ ही क्रॉनिक बीमारियों का दायरा सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी दीमक की तरह चाट रहा है। ऐसे में अगर हमने इन शुरुआती जोखिमों पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया, तो आने वाले दौर में लंबी उम्र वरदान नहीं, बल्कि एक अंतहीन शारीरिक और मानसिक संघर्ष बनकर रह जाएगी। शोधकर्ताओं के अनुसार, कई कारण ऐसे हैं जिन्हें समय रहते नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें मोटापा (हाई बीएमआई), रक्त में शर्करा का उच्च स्तर, तंबाकू का सेवन, मां और बच्चों में कुपोषण तथा वायु प्रदूषण प्रमुख हैं। बता दें कि आर्थिक रूप से कमजोर वाले देशों में कुपोषण और वायु प्रदूषण का असर अधिक देखा गया।

सिर्फ उम्र नहीं, स्वस्थ जीवन बढ़ाने की है जरूरत

इस रिपोर्ट के वरिष्ठ लेखक और इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन के निदेशक डॉक्टर क्रिस्टोफर मरे का इस बारे में कहना है कि “भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती लोगों की उम्र बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके स्वस्थ जीवन के वर्षों को बढ़ाना है। इसके लिए बीमारी की रोकथाम, समय पर इलाज, पुनर्वास सेवाओं, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और लम्बे समय तक रहने वाली बीमारियों के प्रबंधन में निवेश बढ़ाना होगा।“ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारें और स्वास्थ्य प्रणालियां केवल जीवन बचाने पर नहीं, बल्कि लोगों को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखने पर ध्यान दें, तो इससे न केवल करोड़ों लोगों की जीवन गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि परिवारों, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता आर्थिक बोझ भी कम किया जा सकेगा। हमें समझना होगा कि किसी भी समाज की असली सफलता सिर्फ यह नहीं कि उसके लोग कितने साल जीते हैं, बल्कि यह है कि वे उन सालों को कितनी सेहत, गरिमा और आत्मनिर्भरता के साथ जीते हैं।  अगर बढ़ती उम्र के साथ बीमारी के साल भी बढ़ते रहे, तो लंबी जिंदगी एक उपलब्धि नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के लिए बढ़ता हुआ बोझ बन सकती है। इसलिए अब वक्त सिर्फ जीवन बचाने का नहीं, बल्कि जीवन को स्वस्थ और बेहतर बनाने का है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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