ललित मौर्या
भारतीय वैज्ञानिकों की इस खोज से दिमाग और पेट के संकेतों के जरिए अवसाद की सही दवा का असर पहले ही भांपने की उम्मीद जगी है, जिससे मरीज को लंबे इंतजार से राहत मिल सकती है। अवसाद यानी डिप्रेशन सिर्फ उदासी का नाम नहीं। यह ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें इंसान धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा, उम्मीद और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ाव खोने लगता है। ऐसे में सही दवा का समय पर असर करना बेहद जरूरी है। लेकिन समस्या यह है कि अब तक मरीजों को यह जानने के लिए 4 से 6 सप्ताह (करीब एक से डेढ़ महीना) घुट-घुट कर इंतजार करना पड़ता था कि जो दवा वे खा रहे हैं, वह असर कर भी रही है या नहीं। कई बार महीनों की आजमाइश के बाद पता चलता था कि दवा बेअसर रही। ऐसे में उन्हें दूसरी दवा आजमानी पड़ती है।

लेकिन अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), कानपुर और गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने इस इंतजार को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उनके द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि उपचार शुरू होने के महज 7 से 10 दिनों के भीतर मस्तिष्क और पेट से मिलने वाले विद्युत संकेतों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मरीज का शरीर अवसाद की रोकथाम के लिए दी जाने वाली दवा का जवाब देगा या नहीं। साथ ही यह भी पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दवा मरीज के लिए कितनी प्रभावी है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ‘फ्रंटियर्स इन साइकियाट्री’ में प्रकाशित हुए हैं।

पेट और दिमाग का अनूठा रिश्ता
शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापने के लिए इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी (ईईजी) और पेट की विद्युत गतिविधि दर्ज करने के लिए इलेक्ट्रोगैस्ट्रोग्राफी (ईजीजी) का इस्तेमाल किया। इन संकेतों को मरीज के अवसाद से जुड़े लक्षणों की जानकारी के साथ मिलाकर देखा गया। अध्ययन में 206 लोग शामिल थे, जिनमें अवसाद से पीड़ित 144 ऐसे मरीज थे, जिन्होंने पहले अवसाद के लिए उपचार नहीं लिया था। शोधकर्ताओं ने उपचार शुरू होने पर और करीब एक सप्ताह बाद ईईजीऔर ईजीजी संकेत दर्ज किए। इसके बाद देखा गया कि क्या ये शुरुआती संकेत 4 से 6 सप्ताह बाद उपचार के परिणाम का अनुमान लगा सकते हैं। नतीजे उत्साहजनक रहे। मॉडल ने 84 प्रतिशत मामलों में सही तरीके से पहचान लिया कि किन मरीजों पर दवा का असर होने की संभावना कम है। वहीं, जिन मरीजों पर दवा का असर होने की संभावना थी, उनमें से 78 प्रतिशत की भी सही पहचान की गई। जब इस मॉडल को मरीजों के एक अलग समूह पर आजमाया गया, तो इसकी कुल सटीकता 77.3 फीसदी रही। इस परीक्षण में दवा का असर न होने वाले मरीजों की पहचान 71.4 फीसदी मामलों में सही हुई, जबकि दवा का असर होने वाले मरीजों की पहचान 80 फीसदी मामलों में सही रही।

हर मरीज पर एक जैसी दवा क्यों नहीं करती असर?
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अलग-अलग लक्षणों वाले मरीजों में मस्तिष्क और पेट की कार्यप्रणाली के भी अलग-अलग पैटर्न दिखाई दिए। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि क्यों एक ही दवा किसी मरीज को फायदा पहुंचाती है, जबकि दूसरे पर उसका असर कम या बिल्कुल नहीं होता। आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग की सहायक प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर प्रगति प्रियदर्शिनी बालसुब्रमण्यम ने कहा कि उपचार के पहले सप्ताह में ही बिना किसी सर्जरी के मस्तिष्क और पेट से मिलने वाले विद्युत संकेतों में उपचार के संभावित परिणाम की महत्वपूर्ण जानकारी मौजूद होती है। अध्ययन के प्रथम लेखक और आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग के शोधार्थी अश्विन फ्रांसिस के मुताबिक, अलग-अलग जैविक पैटर्न को पहचानने से मरीजों के लिए अधिक व्यक्तिगत उपचार रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।

इलाज के लंबे इंतजार को छोटा करने की उम्मीद
दुनिया भर में करीब पांच फीसदी वयस्क अवसाद से जूझ रहे हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा करीब 4.5 फीसदी दर्ज किया गया है। अनुमान है कि आधे से अधिक मरीजों को अवसाद के लिए दी जाने वाली पहली दवा से पर्याप्त राहत नहीं मिलती। सही उपचार तक पहुंचने में लगने वाला लंबा समय मरीज और उसके परिवार, दोनों के लिए बेहद कठिन हो सकता है। ऐसे में अगर शुरुआती 7 से 10 दिनों में ही यह पता चल सके कि किसी दवा के असर करने की संभावना कम है, तो डॉक्टर समय रहते उपचार की रणनीति बदल सकते हैं। इससे मरीज को कई सप्ताह तक ऐसे उपचार पर निर्भर रहने से बचाया जा सकता है, जिसका फायदा मिलने की संभावना कम है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले बड़े और अलग-अलग आबादी वाले मरीज समूहों में और अध्ययन जरूरी हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार तकनीक को न्यूरोक्लिनिकल इनोवेटिव सॉल्यूशंस (एनसीआईएस) प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध कराया जा रहा है। हालांकि यह खोज अभी अंतिम समाधान नहीं है, लेकिन अवसाद के इलाज में एक ऐसी उम्मीद जरूर जगाती है, जिसमें मरीज को सही दवा के लिए हफ्तों तक इंतजार और प्रयोग से गुजरने के बजाय, उपचार के शुरुआती दिनों में ही दिशा मिलने की संभावना हो सकती है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
