ललित मौर्या
बिहार में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक रही, जहां हल्दी में सीसे का औसत स्तर तय सीमा से करीब पांच गुना अधिक था, जबकि एक नमूने में तो यह मानकों से 642 गुना तक अधिक मिला। भारतीय घरों में हल्दी सिर्फ रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक मसाला नहीं है। यह स्वाद और रंग से कहीं आगे हमारी संस्कृति, परंपराओं और जीवन का हिस्सा रही है। शादी की रस्मों से पूजा की थाली तक और दादी-नानी के घरेलू नुस्खों से रोजमर्रा के खाने तक, हल्दी पीढ़ियों से हमारे जीवन में रची-बसी है।लेकिन जिस पीले रंग को हम शुद्धता, स्वास्थ्य और शुभता से जोड़ते आए हैं, उसके पीछे अब एक चिंताजनक सच सामने आया है।भारत के पांच राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़) में किए एक अध्ययन में हल्दी के 30 फीसदी नमूनों में तय सीमा से अधिक सीसा (लेड) मिला है। चिंता की बात यह है कि कई नमूनों में यह मिलावट इतनी ज्यादा थी कि रोजमर्रा की रसोई का यह परिचित मसाला बच्चों के दिमागी विकास और भविष्य की सीखने की क्षमता के लिए खतरा बन सकता है।शोधकर्ताओं के मुताबिक, हल्दी को चमकीला पीला रंग देने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए उसमें जानबूझकर लेड क्रोमेट मिलाया जा रहा है।

बिहार में मानकों से 642 गुना तक अधिक मिला सीसा
अपने इस अध्ययन में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने 2021 से 2023 के बीच भारत के 34 शहरों से हल्दी के 503 नमूने लिए और हल्दी की सप्लाई चेन से जुड़े 128 लोगों से बातचीत की। जांच में 30 फीसदी नमूनों में सीसे की मात्रा भारत में इसके लिए तय सीमा (10 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम) से अधिक मिली। सबसे चिंताजनक स्थिति बिहार में सामने आई। यहां हल्दी में सीसे का औसत स्तर 48 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम पाया गया, यानी तय सीमा से करीब पांच गुना अधिक थी। वहीं एक नमूने में तो सीसे की मात्रा 6,416 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तक दर्ज की गई, जो तय सीमा से करीब 642 गुणा अधिक है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित नेचर जर्नल एनपीजे साइंस ऑफ फूड में प्रकाशित हुए हैं।

पहले भी चेता चुके हैं अध्ययन
बता दें कि भारतीय हल्दी में सीसे की मिलावट का यह कोई पहला सबूत नहीं है। इससे पहले भी जर्नल साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन ने पटना से लिए नमूनों में इसकी मौजूदगी की पुष्टि की थी। इन सैम्पल्स में लेड का स्तर तय मानकों से 200 गुणा अधिक था। विश्लेषण के मुताबिक पटना से लिए गए करीब-करीब सभी नमूनों में लेड की कुछ न कुछ मात्रा मौजूद थी, जिसे मापा जा सकता था। यदि औसत रूप से देखें तो यहां से लिए नमूनों में लेड की औसत मात्रा 1,232 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम थी, जबकि अधिकतम मात्रा 2,274 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तक दर्ज की गई।

खेत से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते कैसी बदल जाती है तस्वीर
बता दें कि भारतीय हल्दी में सीसे की मिलावट का यह कोई पहला सबूत नहीं है। इससे पहले भी जर्नल साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन ने पटना से लिए नमूनों में इसकी मौजूदगी की पुष्टि की थी। इन सैम्पल्स में लेड का स्तर तय मानकों से 200 गुणा अधिक था। विश्लेषण के मुताबिक पटना से लिए गए करीब-करीब सभी नमूनों में लेड की कुछ न कुछ मात्रा मौजूद थी, जिसे मापा जा सकता था। यदि औसत रूप से देखें तो यहां से लिए नमूनों में लेड की औसत मात्रा 1,232 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम थी, जबकि अधिकतम मात्रा 2,274 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तक दर्ज की गई।

चमकीली हल्दी के पीछे छिपा जहरीला सच
देखा जाए तो तय मानकों से इतनी भारी मिलावट कोई भूल नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है। मुनाफा के चक्कर में हल्दी को गहरा पीला रंग देने और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए इसमें जानबूझकर लेड क्रोमेट मिलाया जा रहा है। रिसर्च में पाया गया है कि मिलावट का एक प्रमुख कारण हल्दी की जड़ों को अधिक गहरा और आकर्षक पीला रंग देना है। इसके साथ ही लेड क्रोमेट का इस्तेमाल हल्दी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए भी किया जा रहा है। यानी बाजार में ज्यादा चमकीली और देखने में अच्छी लगने वाली हल्दी उपभोक्ता के लिए ज्यादा सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं। वैज्ञानिक आगाह करते हैं कि सीसा शरीर में पहुंचने के बाद खासकर बच्चों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। यह मस्तिष्क के विकास और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इससे बच्चों की सीखने और समझने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) का भी अनुमान है कि लेड पॉइजनिंग की वजह से दुनिया में सालाना 15 लाख से ज्यादा मौतें हो रहीं हैं, जबकि करोड़ों बच्चे इसके बढ़ते प्रदूषण के संपर्क में आने के कारण जीवनभर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करने को मजबूर हैं। इनमें एनीमिया, उच्च रक्तचाप, इम्यूनोटॉक्सिसिटी और जनन अंगों पर पड़ता प्रभाव जैसी समस्याएं शामिल हैं। अध्ययन में की गई आबादी-स्तर की एक्सपोजर मॉडलिंग के मुताबिक, अगर हल्दी में लेड क्रोमेट की मिलावट पूरी तरह रोक दी जाए तो बच्चों के आईक्यू में 2.3 अंक तक की बढ़ोतरी हो सकती है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि केवल बिहार में बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमता में इस सुधार से भविष्य में उनकी आय में हर साल 160 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक का लाभ मिल सकता है। वहीं यदि हृदय रोग से होने वाली मौतों में संभावित कमी को भी शामिल किया जाए, तो आर्थिक लाभ सालाना करीब 280 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है।

नियम हैं, लेकिन निगरानी कमजोर
भारतीय हल्दी में सीसे की मौजूदगी की अनुमति नहीं है, फिर भी शोधकर्ताओं के मुताबिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था में कई खामियां हैं। जांच और निगरानी की सीमित क्षमता तथा दूसरी अधिक तत्काल या दिखाई देने वाली समस्याओं को प्राथमिकता दिए जाने के कारण इस तरह की मिलावट पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। समस्या केवल किसी एक दुकानदार या उत्पाद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे पूरी सप्लाई चेन और नियामकीय व्यवस्था से जुड़े तंत्र काम करते हैं। इसलिए मिलावट रोकने के लिए केवल अंतिम उत्पाद की जांच पर्याप्त नहीं होगी। हल्दी की खेती से लेकर प्रोसेसिंग, भंडारण, थोक व्यापार और बाजार तक पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी मजबूत करनी होगी। अध्ययन का संदेश बेहद स्पष्ट है, रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाली एक मामूली-सी चीज में छिपी मिलावट भी बच्चों के दिमाग और उनके पूरे भविष्य पर असर डाल सकती है। इसलिए चमकीली हल्दी का सवाल केवल खाने के रंग का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सेहत का भी है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
