केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि सूर्यास्त के बाद शव परीक्षण नहीं करने को लेकर कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी लेकिन केवल दिन के उजाले में ही पोस्टमार्टम करने की परंपरा को अक्सर प्रक्रिया लंबी खींचने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था खासकर छोटे शहरों में. प्रोटोकॉल में बदलाव से न केवल मृतक के परिजनों के लिए स्थितियां बदलेंगी जिन्हें अक्सर शव पाने के लिए एक लंबा इंतजार करना पड़ता है बल्कि देश में अंग दान कार्यक्रम में भी बड़ा असर पड़ने की संभावना है

 

क्या है नया प्रोटोकॉल

पोस्टमॉर्टम प्रोटोकॉल में बदलाव को सरकार ने अधिसूचित कर दिया है. अब किसी भी समय शव परीक्षण करने की अनुमति दे दी गई है. भले ही प्राकृतिक रोशनी हो या नहीं. हालांकि, ये इस पर निर्भर करेगा कि जिस अस्पताल में ऑटप्सी की जानी हो, वहां उपयुक्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध है या नहीं. प्रोटोकॉल में कहा गया है कि अंगदान के लिए पोस्टमॉर्टम प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए और सूर्यास्त के बाद भी उन अस्पतालों में किया जाना चाहिए, जिनके पास नियमित रूप से इस तरह के पोस्टमॉर्टम के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद हैं.

हालांकि, हत्या, आत्महत्या, रेप, क्षत-विक्षत शरीर और संदिग्ध श्रेणियों के मामलों को तब तक रात के समय पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं लाना चाहिए जब तक कि कानून व्यवस्था से जुड़ी कोई स्थिति न हो. अस्पताल को ये भी सुनिश्चित करना है कि किसी भी संदेह को दूर करने और भविष्य में कानूनी उद्देश्यों के लिए रात में किए गए सभी पोस्टमॉर्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी.

पोस्टमॉर्टम किनका होता है?

हर मौत पर शव का पोस्टमॉर्टम नहीं किया जाता. इसके लिए कुछ क्राइटेरिया हैं. सबसे बड़ा क्राइटेरिया है मेडिको-लीगल केस. जैसे कोई सड़क हादसा, आत्महत्या, हत्या या किसी की मौत का कारण नहीं पता, तो उस स्थिति में मौत का कारण जानने के लिए पोस्टमॉर्टम किया जाता है.

प्राकृतिक रोशनी क्यों मायने रखती है

द प्रिंट की एक रिपोर्ट में एम्स के पूर्व निदेशक और फोरेंसिक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ टी.डी. डोगरा बताते हैं कि ऑटप्सी 1860 के दशक के आसपास शुरू हुई थी. उस समय बिजली नहीं होती थी इसलिए सूर्यास्त के बाद पोस्टमॉर्टम नहीं किया जा सकता था. घावों को ठीक से देखने-समझने में रोशनी बहुत जरूरी है. हालांकि लिखित में ऐसा कोई आदेश नहीं है. ये एक परंपरा है जो चली आ रही है.

किसी भी चीज का रंग इस बात पर निर्भर करता है कि हम उस पर कौन सी रोशनी डाल रहे हैं. अगर आप लाल रंग की चीज पर हरे रंग की रोशनी डालेंगे, तो वो चीज काली दिखेगी. डॉक्टर रौनक का कहना है कि पोस्टमॉर्टम नेचुरल रोशनी में ही किया जाता है, क्योंकि नेचुरल लाइट का कलर हर जगह एक ही होता है. बल्ब का कलर अलग-अलग हो सकता है. पीले बल्ब में अगर पोस्टमॉर्टम किया गया तो बॉडी का रंग अलग दिख सकता है. सफेद में किया गया तो अलग दिख सकता है.

अब किसी भी समय पोस्टमॉर्टम की अनुमति क्यों?

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सूर्यास्त के बाद शव परीक्षण नहीं करने को लेकर कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी, लेकिन केवल दिन के उजाले में ही पोस्टमॉर्टम करने की परंपरा को अक्सर प्रक्रिया लंबी खींचने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, खासकर छोटे शहरों में.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आने वाले स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय में एक तकनीकी समिति ने सूर्यास्त के बाद पोस्टमॉर्टम संबंधी मुद्दे की पड़ताल की. पता चला कि कुछ संस्थान पहले से ही रात में पोस्टमॉर्टम कर रहे हैं. टेक्नोलॉजी में हुई आई तेज प्रगति और सुधार को देखते हुए, खासतौर से जरूरी प्रकाश की व्यवस्था और पोस्टमॉर्टम के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता की वजह से अस्पतालों में अब रात के समय भी पोस्टमॉर्टम करना संभव है.

अब OT यानी ऑपरेशन थियेटर लाइट्स मॉर्डन हो गई हैं. LED लाइट्स का जमाना है, उनका रंग वाइट होता है. वही लाइट पोस्टमॉर्टम रूम में भी यूज होती है. बिजली हर जगह मौजूद है तो अब ये मुमकिन है कि आर्टिफिशियल लाइट्स में हम पोस्टमॉर्टम कर सकें. और हमें वही कलर दिखे जो वास्तव में है

ऑर्गन डोनेशन को कैसे बढ़ावा मिलेगा ?

प्रोटोकॉल में कहा गया है कि अंगदान के लिए पोस्टमॉर्टम प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए और सूर्यास्त के बाद भी उन अस्पतालों में किया जाना चाहिए, जिनके पास नियमित रूप से इस तरह के पोस्टमॉर्टम के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद है.

ऑर्गन डोनेशन दो तरह के होते हैं. कुछ ऑर्गन ऐसे हैं जिसे मौत से पहले निकालने होते हैं. ब्रेनडेड नाम की एक स्टेज होती है. दिमाग मर चुका होता है, इंसान के शरीर को आर्टिफिशियली जिंदा रखते हैं. वेंटिलेटर और कई दूसरे तरीके हैं. किडनी, हार्ट, लंग और पैंक्रियाज को डोनेट कर सकते हैं. पोस्टमॉर्टम का प्रोटॉकोल बदलने से इसमें कोई चेंज नहीं आएगा. जिन ऑर्गन डोनेशन को लेकर चेंज आएगा वो हैं आंखें, हड्डी और स्किन.

एक अनुमान के मुताबिक, हर साल भारत में 1.5 लाख लोग रोड एक्सीडेंट में जान गंवाते हैं. इसका मतलब हुआ 3 लाख आंखें. देश में हर साल 2.5 लाख आंखों की जरूरत है. ब्लाइंडनेस को खत्म करने के लिए. इस समय जो डोनेशन है वो 25 हजार है. रोड एक्सीडेंट के ज्यादातर मामलों में जान गवांने वालों, खासकर जिनकी मौत हेड इंजरी की वजह से होती है उनके बाकी अंग सही होते हैं. उन केस में स्किन, आंख और हड्डी में कोई दिक्कत नहीं होती है. तो इसका इस्तेमाल हो सकता है.

स्किन की बात करें तो मौत के 6 घंटे बाद स्किन निकालना जरूरी होता है. इसके बाद इसे तीन हफ्ते के लिए रखा जा सकता है. इतने दिनों में किसी और को लगा सकते हैं. वैसे ही आंखों की बात करें तो उसके लिए भी जरूरी है कि मौत के बाद जल्द से जल्द उसे निकाला जाए. एक बार आंखें निकालने के बाद उसे रखा जा सकता है, ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है और उनका इस्तेमाल हो सकता है.

अभी के प्रोटोकॉल के मुताबिक दिन में ही पोस्टमॉर्टम होता था. मान लीजिए कि सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक ही काम हो रहा है तो 8 घंट ही मिल रहे हैं. ऐसे में तो हम एक तिहाई ही अंग निकाल सकते हैं. जबतक पोस्टमॉर्टम नहीं होगा मेडिको-लीगल केस में कोई ऑर्गन नहीं निकाल सकते. स्किन की जरूरत उन लोगों को ज्यादा पड़ती है जो पूरी तरह से झुलस गए हों. हालांकि इंडिया में अभी बोर्न डोनेशन का कॉन्सेप्ट ही नहीं है. अगर बोर्न डोनेशन शुरू होता है तो उन लोगों को फायदा मिलेगा जिनकी बोर्न किसी वजह से खराब हो गई है.

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