दयानिधि

नए शोध में खुलासा: मीठे पेयों का अधिक सेवन करने से किशोरों में चिंता या एंग्जाइटी के लक्षणों में बढ़ोतरी हो सकती है। बोर्नमाउथ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया है कि ज्यादा मीठे पेय पीने वाले किशोरों में चिंता ( एंजायटी) के लक्षण अधिक देखे जा रहे हैं। यह अध्ययन जर्नल ऑफ ह्यूमन न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स में प्रकाशित हुआ है। शोध में यह बताया गया है कि मीठे पेय और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक संबंध हो सकता है।

आजकल किशोरों में चिंता या एंजायटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। कई रिपोर्टों के अनुसार, हर पांच में से एक बच्चा या किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। इनमें चिंता विकार सबसे आम है। चिंता होने पर बच्चों को घबराहट, डर, बेचैनी, नींद की कमी और ध्यान लगाने में कठिनाई जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पहले ज्यादातर लोग सोचते थे कि खराब खान-पान का असर केवल शरीर पर पड़ता है, जैसे मोटापा या डायबिटीज। लेकिन अब वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि भोजन और पेय का असर दिमाग पर भी हो सकता है।

मीठे पेय क्या होते हैं?

मीठे पेय वे पेय होते हैं जिनमें बहुत ज्यादा चीनी मिलाई जाती है। इनमें सोडा और कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक, मीठा जूस, शरबत और स्क्वैश, मीठी चाय और कॉफी, फ्लेवर वाला दूध आदि इनमें शामिल हैं। इन पेयों में कैलोरी बहुत ज्यादा होती है, लेकिन पोषण कम होता है। इनमें विटामिन, फाइबर और जरूरी खनिज कम मात्रा में होते हैं।

शोध में क्या पाया गया?

शोधकर्ताओं ने कई पुराने अध्ययनों के परिणामों को एक साथ मिलाकर देखा। इन अध्ययनों में किशोरों से पूछा गया था कि वे कितने मीठे पेय पीते हैं और उन्हें किस तरह के मानसिक लक्षण महसूस होते हैं। सभी अध्ययनों में एक समान बात सामने आई। जो किशोर ज्यादा मात्रा में मीठे पेय पीते थे, उनमें चिंता के लक्षण ज्यादा पाए गए। इसका मतलब है कि मीठे पेय और चिंता के बीच एक संबंध दिखाई देता है।

क्या मीठे पेय सीधे चिंता या एंग्जाइटी का कारण हैं?

शोधकर्ताओं ने साफ कहा है कि यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि मीठे पेय सीधे चिंता का कारण बनते हैं। क्योंकि यह अध्ययन पुराने सर्वेक्षणों पर आधारित था, इसलिए इसमें कारण और परिणाम को पूरी तरह साबित नहीं किया जा सकता। यह भी हो सकता है कि जो किशोर पहले से चिंता महसूस करते हैं, वे ज्यादा मीठे पेय पीते हों। कुछ बच्चे तनाव होने पर मीठी चीजें ज्यादा खाते-पीते हैं। इसके अलावा, नींद की कमी, परिवार का माहौल या पढ़ाई का दबाव भी दोनों समस्याओं का कारण हो सकता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि केवल मीठे पेय ही चिंता की वजह हैं। लेकिन दोनों के बीच एक अस्वस्थ संबंध जरूर देखा गया है।

मीठे पेय का शरीर और दिमाग पर असर

ज्यादा चीनी खाने से शरीर में ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है और फिर जल्दी गिर जाता है। इससे थकान, चिड़चिड़ापन और मूड में बदलाव हो सकता है। जब शरीर बार-बार इस स्थिति से गुजरता है, तो यह मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ज्यादा चीनी लेने से शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) बढ़ सकती है। यह दिमाग के काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इस पर अभी और शोध की जरूरत है।

माता-पिता और स्कूल की भूमिका

किशोरों की खानपान की आदतों में परिवार और स्कूल की बड़ी भूमिका होती है। अगर घर में रोजाना कोल्ड ड्रिंक या मीठा जूस उपलब्ध होगा, तो बच्चे उसे ज्यादा पिएंगे। इसलिए माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि वे बच्चों को पानी, नारियल पानी या बिना चीनी वाले पेय दें। स्कूलों में भी हेल्दी ड्रिंक के विकल्प होने चाहिए। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि ज्यादा चीनी उनके शरीर और दिमाग दोनों के लिए ठीक नहीं है।

आगे क्या किया जा सकता है?

इस अध्ययन से इस बात का पता चलता है कि हमें किशोरों के खान-पान पर अधिक ध्यान देना चाहिए। एंग्जाइटी की समस्या बढ़ रही है, इसलिए ऐसे जीवनशैली के कारकों को पहचानना जरूरी है जिन्हें बदला जा सकता है। मीठे पेय की मात्रा कम करना एक आसान और सुरक्षित कदम हो सकता है। हालांकि, इसके लिए और गहरे शोध की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि असली कारण क्या है। अंत में, यह कहा जा सकता है कि स्वस्थ शरीर के साथ-साथ स्वस्थ मन के लिए भी संतुलित आहार जरूरी है। किशोरों को सही जानकारी और सही विकल्प देना समय की जरूरत है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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