ललित मौर्या
भारत में हर साल करीब 30 लाख लोग साठ की उम्र से पहले जान गंवा देते हैं। नया अध्ययन बताता है कि इन असमय मौतों को रोकने में पैसा नहीं, शिक्षा सबसे अहम भूमिका निभा सकती है। भारत में लाखों लोग 60 के पड़ाव तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। विडंबना यह है कि कमाने और परिवार की जिम्मेदारियां उठाने की उम्र में हर साल करीब 30 लाख भारतीय समय से पहले दुनिया से चले जाते हैं।

इस गंभीर संकट पर किए गए नए अध्ययन से पता चला है कि असमय होने वाली मौतों को रोकने में पैसा या संपत्ति नहीं, बल्कि शिक्षा सबसे बड़ी ढाल है। यानी जीवन बचाने में आर्थिक सम्पन्नता से ज्यादा असर शिक्षा का है। यह अध्ययन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए) के वैज्ञानिकों द्वारा किया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं।

आर्थिक विकास, फिर भी असमय मौतें क्यों?
गौरतलब है कि समय से पहले होने वाली मौतों को रोकना संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास से जुड़े लक्ष्यों (एसडीजी) का एक अहम उद्देश्य है। आमतौर पर माना जाता है कि आर्थिक विकास के साथ स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होती हैं और लोगों की जीवन-प्रत्याशा बढ़ती है। लेकिन भारत के मामले में तस्वीर कुछ अलग है। भारत में लगातार आर्थिक तरक्की के बावजूद स्थिति चिंताजनक है। काम करने की उम्र के लोगों की दुनिया भर में होने वाली मौतों में करीब पांचवां हिस्सा भारत का है। देश में होने वाली कुल मौतों में से करीब आधी 60 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाती हैं। यानी हर साल करीब 30 लाख लोग अपने जीवन में साठवां बसंत भी नहीं देख पाते। यह स्थिति वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा गंभीर है और इसका असर परिवारों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।

शिक्षा बनाम संपत्ति: कौन ज्यादा जरूरी?
आईआईएएसए के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में भारत मानव विकास सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। इसमें 2004-05 में सर्वे किए गए 1.15 लाख से ज्यादा लोगों को 2011-12 तक ट्रैक किया गया। वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि कामकाजी उम्र में मौत के खतरे को कम करने में शिक्षा और आर्थिक स्थिति में कौन ज्यादा भूमिका निभाता है। इसमें व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर दोनों प्रभावों को अलग-अलग देखा गया। विश्लेषण में स्वास्थ्य, उम्र, वैवाहिक स्थिति, जाति, धर्म, स्वास्थ्य से जुड़ी आदतें, रोजगार, रहने की जगह और क्षेत्र जैसे कई कारकों को भी शामिल किया गया।

अध्ययन के जो नतीजे सामने आए हैं वे बेहद स्पष्ट हैं। इनके मुताबिक ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में समय से पहले मृत्यु का खतरा कम है और यह असर हर वर्ग में चाहे वे अमीर हो या गरीब सभी में देखा गया। इसके साथ ही शिक्षा का प्रभाव संपत्ति से ज्यादा मजबूत और स्थाई पाया गया। इसी तरह पुरुषों और महिलाओं दोनों में शिक्षा के आधार पर मृत्यु दर का अंतर, संपत्ति के आधार पर दिखने वाले अंतर से कहीं ज्यादा बड़ा था। हालांकि जब शिक्षा को ध्यान में रखा गया, तो घरेलू संपत्ति का असर उतना स्पष्ट नहीं रहा। अध्ययन से जुड़े मुख्य शोधकर्ता मोरध्वज धाकड़ का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “काम करने की आयु में जीवन बचाने में शिक्षा का संबंध घरेलू संपत्ति से कहीं ज्यादा मजबूत है।” उन्होंने बताया स्वास्थ्य स्थिति, रोजगार और अन्य सामाजिक कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी शिक्षा और लंबे जीवन के बीच यह संबंध बना रहता है।

इलाके का शिक्षा स्तर भी बचाता है जान
यह अध्ययन समुदाय के माहौल की भूमिका को भी रेखांकित करता है। अध्ययन में सामने आया है कि शिक्षा महज किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे सामाजिक माहौल में बदलाव लाती है। अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता नंदिता साकिया के मुताबिक, “जिन इलाकों में शिक्षा का औसत स्तर ज्यादा है, वहां रहने वाले वयस्कों में मृत्यु का खतरा कम पाया गया। यह असर उनकी अपनी शिक्षा और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहता है, और खासतौर पर महिलाओं में यह ज्यादा स्पष्ट दिखता है।” उनके मुताबिक उच्च शिक्षित समुदायों में रहने वाले लोगों में मृत्यु का खतरा कम होता है, चाहे उनकी खुद की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो। इसके उलट, किसी इलाके की औसत संपन्नता का ऐसा कोई लगातार सुरक्षात्मक असर नहीं दिखा। कुछ मामलों में, खासकर पुरुषों में, अधिक संपन्न समुदायों में मृत्यु जोखिम बढ़ा हुआ भी पाया गया।

सिर्फ आय बढ़ने से नहीं बचेगी जान
इन अंतरों को बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्य से जुड़ी आदतों, बीमारियों, पेशे, जाति, धर्म और वैवाहिक स्थिति जैसे कई पहलुओं की जांच की। नतीजों से पता चला कि कामकाजी उम्र में शिक्षा और मृत्यु दर के बीच संबंध काफी हद तक सीधे तौर पर जुड़ा है। वहीं घरेलू संपन्नता का असर मुख्य रूप से कुछ मध्यवर्ती कारणों के जरिए होता है, जिनमें बीमारियां भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में समय से पहले हो रही मौतों को कम करने के लिए केवल आर्थिक विकास काफी नहीं है। नतीजे बताते हैं कि भारत में वयस्कों की समय से पहले हो रही मौतों को सिर्फ आय बढ़ने से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए शिक्षा में लंबे समय तक निवेश जरूरी है, जो लोगों को मजबूत बनाता है और समाज को ज्यादा स्वस्थ वातावरण देता है। आईआईएएसए के वरिष्ठ शोधकर्ता समीर के सी के अनुसार आर्थिक विकास से संसाधन और अवसर तो बढ़ते हैं, लेकिन इसके साथ कामकाजी दबाव, पर्यावरणीय खतरे और अस्वास्थ्यकर व्यवहार जैसे जोखिम भी बढ़ सकते हैं। ऐसे में यदि शिक्षा, नियमों और सामाजिक सुरक्षा में निवेश नहीं हुआ, तो ये जोखिम कम नहीं होंगे।

स्वास्थ्य और विकास की असल कुंजी है शिक्षा
अध्ययन का निष्कर्ष बेहद स्पष्ट है भारत में असमय मौतों को रोकने का सबसे मजबूत रास्ता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में निवेश है। इसमें खासकर महिलाओं और वंचित समुदायों पर ध्यान देने की जरुरत है। वरिष्ठ वैज्ञानिक वोल्फगैंग लुट्ज कहते हैं, “शिक्षा सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि काम करने की उम्र के लोगों के लिए भी जीवन बचाने की सबसे बड़ी ताकत है।” अध्ययन स्पष्ट तौर पर आगाह करता है कि अगर भारत में आर्थिक विकास के साथ-साथ शिक्षा का विस्तार नहीं हुआ, तो असमय मौतों का यह संकट आगे भी बना रहेगा। यह समझना जरूरी है कि शिक्षा केवल रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाती, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य, जागरूक व्यवहार और सुरक्षित सामाजिक माहौल भी तैयार करती है। यही कारण है कि लंबे समय तक जीवन बचाने में शिक्षा सबसे अहम भूमिका निभाती है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
