वेदप्रिय

19वीं सदी के भारतीय नवजागरण के फलस्वरुप( विशेषकर 1857 की लड़ाई के बाद) विज्ञान के क्षेत्र में यदि कोई मील का पत्थर देखा जाए तो वह मिलेगा ‘ इंडियन एसोसिएशन फॉर दा कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस ‘ की स्थापना। इसकी स्थापना 29 जुलाई ,1876 में डॉक्टर महेंद्र लाल सरकार द्वारा हुई थी। आरंभिक दौर में इसमें पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर ,श्री केसब चंद्र सेन ,श्री जगदीश चंद्र बोस, प्रोफेसर आशुतोष मुखर्जी जैसी महान हस्तियां जुड़ी थी। सर सी वी रमन के जुड़ने के बाद( 1907) तो इसका नाम विश्व की श्रेष्ठ संस्थानों में गिना जाने लगा ।इसमें प्रोफेसर एस एन बोस ,प्रोफेसर एम एन साहा, प्रोफेसर के एस कृष्णान, सरीखे महान वैज्ञानिकों का जुड़ाव रहा है। यह रॉयल सोसाइटी लंदन (1663) की तर्ज पर बनी एक स्वतंत्र शोध संस्था  है। इसमें अनेक वैज्ञानिक विषयों पर शोध एवं अध्ययन होते रहते हैं। आज इसे एक डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। वैज्ञानिक कार्यों का एक बड़ा प्लेटफार्म यह तैयार हो गया ।अब जरूरत थी एक ऐसे मंच की जहां विभिन्न वैज्ञानिक अपने-अपने द्वारा तैयार शोधों एवं कार्यों का मूल्यांकन एक व्यापक स्तर पर अन्य वैज्ञानिकों के साथ कर सकें। इससे वैज्ञानिकों को एक फीडबैक भी मिलता है और आगे की दिशा भी ।

सन 1914 में ऐसा ही एक प्लेटफार्म तैयार हुआ। यूरोप एवं अन्य विकसित देशों में विज्ञान कॉन्फ्रेंस आदि पहले से होती आ रही हैं।भारत में सन 1914 में दो वैज्ञानिकों ने पहल कर भारतीय विज्ञान कांग्रेस Association की स्थापना की ।उनके नाम हैं प्रोफेसर जे एल साइमनसन और प्रोफेसर पी एस मैकमोहन। इनमें से प्रोफेसर मैकमोहन कैनिंग कॉलेज लखनऊ में रसायन विभाग के अध्यक्ष थे तथा प्रोफेसर साइमनसन इंग्लैंड से आए थे। ये इसे ‘ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर दा एडवांसमेंट आफ साइंस’ की तर्ज पर चलना चाहते थे। पहले- पहल ये अन्य स्थानीय वैज्ञानिकों समेत ‘एशियाटिक सोसायटी कोलकाता’ में इकट्ठे हुए। इस संस्था I S C A के नाम इसके कार्यों ,लक्ष्यों एवं उद्देश्यों पर चर्चा हुई ।इसमें सबसे प्रमुख लक्ष्य तय हुए.

To advance and promote the cause of science in India.

To publish it’s proceedings and to go ahead etc.

पहली कांग्रेस जनवरी 15 से 17 सन 1914 में कोलकाता में हुई। इसकी अध्यक्षता माननीय प्रोफेसर आशुतोष मुखर्जी ने की। ये इन दिनों कोलकाता विश्वविद्यालय में उपकुलपति के पद पर कार्य कर रहे थे। इसमें कुल 105 वैज्ञानिक इकट्ठे हुए थे तथा 35 पर्चों पर चर्चा हुई थी। ये पर्चे 6 विभागों में बंटे हुए थे।

आज इस कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 60000 से ज्यादा है तथा इसमें 2000 से ज्यादा पर्चे प्रतिवर्ष पढ़े जाते हैं। आज इन पर्चों के विभागों की संख्या 16 से ज्यादा है। देश के लगभग सभी प्रमुख वैज्ञानिक समय-समय पर इसमें काम कर चुके हैं । बहुत से तो इसके अध्यक्ष रह चुके हैं। कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार हैं– अधिवेशन नागपुर सन 1920 आचार्य पी सी रे ,लाहौर 1927 प्रोफेसर जे सी बोस ,मद्रास 1929 प्रोफेसर सी वी रमन, मुंबई 1934 प्रोफेसर एम एन साहा, दिल्ली 1944 प्रोफेसर एस एन बोस, दिल्ली 1947 पंडित जवाहरलाल नेहरू, बेंगलुरु 1951 प्रोफेसर होमी जहांगीर भाभा ,कोलकाता 1964 प्रोफेसर हुमायूं कबीर, दिल्ली 1975 प्रोफेसर आसीमा चैटर्जी( पहली महिला अध्यक्ष ),कोचीन 1990 प्रोफेसर यशपाल आदि -आदि। इनमें प्रोफेसर डी एन वाडिया 1942 ,1943 वह प्रोफेसर हुमायूं कबीर को दो बार अध्यक्षता करने का अवसर प्राप्त हो चुका है।

इसका सिल्वर जुबली अधिवेशन 1938 कोलकाता में हुआ था। इसमें पहली बार विदेशी वैज्ञानिकों का शामिल होना शुरू हुआ जो अभी तक जारी है। इसका गोल्डन जुबली अधिवेशन 1963 दिल्ली में हुआ इसकी अध्यक्षता प्रोफेसर डी एस कोठारी (कोठारी कमीशन) ने की थी। इसमें पहली बार इस संगठन के इतिहास पर 12 ग्रंथ निकाले गए थे। शताब्दी समारोह अधिवेशन 2013 कोलकाता में किया गया था ।इसकी अध्यक्षता माननीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने की।आजादी के बाद से इस कांग्रेस में विदेशी वैज्ञानिकों का शामिल होना तेज हो गया ।प्रोफेसर नील्स बोहर( नोबेल) सरीखे महान वैज्ञानिक इसका हिस्सा बन चुके हैं ।इनके बाद तो विदेशी विज्ञान अकादमियों का शामिल होना भी शुरू हुआ ।सन 1976 के बाद से इसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया। एक राष्ट्रीय मुद्दे (आवश्यकता )को चिन्हित करना और इसी को आधार बनाकर मुख्य विषय ( Focal Theme)चुना  जाना आरंभ हुआ। ऐसे पहले अधिवेशन 1976 की अध्यक्षता डॉ  एम एस स्वामीनाथन ने की। स्वाभाविक है मुख्य विषय आ जाने के बाद प्रमुख वैज्ञानिकों की राय व इस विषय पर सिफारिशें आनी शुरू हुई ।इससे विज्ञान नीति बनाने में भी बहुत सहयोग मिला। इससे निकलने वाले कार्यों के आधार पर पहली बार 1980 से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार ने एक टास्क फोर्स का गठन किया ।इस कांग्रेस में देश के जाने-माने वैज्ञानिकों के नाम पर अनेक पुरस्कार, फैलोशिप एवं लेक्चर आदि जारी हुए।

इस कांग्रेस के अभी तक के अधिवेशनों के बहुत ही खट्टे -मीठे अनुभव रहे हैं ।70वां अधिवेशन सन 1983 में तिरुपति में हुआ था ।इसमें न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम को टारगेट किया गया था। इसमें कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्रिक मॉडल को भी नकारा गया था  इस अधिवेशन की अध्यक्षता प्रोफेसर बी रामाचंद्र राव कर रहे थे। 80वां अधिवेशन 1993 में पणजी (गोवा) में हुआ था ।इसमें श्री एम सी भंडारी नाम के एक व्यक्ति ने ज्योतिष पर पर्चा पढ़ा था। इन्हें उस वर्ष का राज क्रिस्टो अवार्ड दिया गया था। प्रोफेसर एम जी के मेनन ने इस पर विरोध जताया था। इस कांग्रेस की अध्यक्षता प्रोफेसर एस ज़ेड कासिम कर रहे थे।इन्होंने कहा,He didnot see anything wrong in allowing astrology a plateform at the congress ।प्रोफेसर एम जी के  मेनन मैसूर में हुई (1982) 69 वीं कांग्रेस की अध्यक्षता कर चुके थे। विज्ञान की नीति निर्माण में भी उनकी बड़ी भूमिका थी। दो अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रोफेसर एस चंद्रशेखर (नोबेल ,सर सी वी रमन के भतीजे ,संयुक्त गणराज्य अमेरिका की नागरिकता प्राप्त) व प्रोफेसर सी एन आर राव( भारत रत्न ,इन्होंने 1988 में 75वीं कांग्रेस की अध्यक्षता की थी) भी उपस्थित थे। इन दोनों ने भी इस पर्चे का विरोध किया था। यहां तक कि इन्होंने इसके विरुद्ध एक सार्वजनिक बयान भी दिया था। प्रोफेसर एस चंद्रशेखर ने तो उस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर भी किए हुए थे जिसमें विश्व स्तर पर अध्ययनों के बाद ज्योतिष को विज्ञान नहीं स्वीकार किया गया था ।यह अध्ययन ‘The Humanist’ के सितंबर/ अक्टूबर 1975 के अंक में छपा था। इस पर 186 महान वैज्ञानिकों के हस्ताक्षर थे ,जिनमें 19 वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार प्राप्त थे। इस कांग्रेस से विश्व वैज्ञानिक समुदाय में देश की विज्ञान के क्षेत्र में शाख कमजोर हुई थी ।

सन 2015 में इस कांग्रेस का 102 वां अधिवेशन मुंबई में हुआ। इसमें एक पर्चा प्रस्तुत हुआ। इस पर्चे में दावा किया गया था कि भारत में वैदिक काल में वायुयान चलते थे ।ये न केवल  आगे की तरफ चलते थे बल्कि पीछे की तरफ भी चल सकते थे। इस  पर्चे के पढ़ने वाले ने ऋषि भारद्वाज को इसका प्रणेता कहा था। यह पर्चा प्रोफेसर एस एम देशपांडे इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस बेंगलुरु से तैयार हुआ था। इनका कहना था कि हमें ऐसे दावों को छद्मसाइंस कहकर एकदम नकारना नहीं चाहिए ।इस पर्चे पर प्रोफेसर एच एस मुकुंद भी एक हस्ताक्षरकर्ता थे। इन्होंने कहा हमें बहस चलानी चाहिए। नासा के एक वैज्ञानिक श्री राम प्रसाद गांधीरमन ने तो 220 वैज्ञानिकों के हस्ताक्षर करवा कर इसके विरुद्ध पिटीशन भी डाल दी थी। इसमें कहा गया था कि यह पर्चा छद्मविज्ञान है। मिथकों  को विज्ञान के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए ।जाने-माने एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रोफेसर जयंत नारलीकर ने कहा था कि हमें ऐसे दावों से बचना चाहिए जिनके हमारे पास पुख्ता प्रमाण मौजूद नहीं हों। इससे अपने देश की शाख गिरती है।

सन 2019 जालंधर में इस कांग्रेस का 106 वां अधिवेशन संपन्न हुआ। यह कांग्रेस तो बहुत ही ज्यादा विवादों में घिरी हुई थी। इसका उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया था। इसमें माननीय मंत्री डॉ हर्षवर्धन (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग) भी उपस्थित थे ।इन्होंने अपने वक्तव्य में कहा- स्वयं प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने स्वीकारा है कि भारतीय वेदों में आइंस्टीन से बेहतर सिद्धांत मौजूद हैं। इस कांग्रेस में तीन नोबेल वैज्ञानिक भी शामिल हुए थे। इस कांग्रेस का मुख्य विषय था Future India ।इस कांग्रेस में एक वक्तव्य में  श्री के जे कृष्णान  कह रहे थे कि न्यूटन व आइंस्टीन के सिद्धांत गलत है। कुछ समय के बाद आप देखेंगे की गुरुत्वाकर्षण पर मेरा अपना सिद्धांत आएगा ।जब यह स्वीकृत होगा तो गुरुत्वाकर्षण तरंगों का नाम ‘ Narender Modi’s Wave’  होगा और इसे ‘ हर्षवर्धन इफेक्ट ‘  के नाम से जाना जाएगा। एक और वक्तव्य प्रोफेसर वी नागेश्वर राव( प्रोफेसर कार्बनिक रसायन विभाग) उपकुलपति ,आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा रखा गया ।इसमें कहा गया था कि  महाभारत के समय में अपने देश का विज्ञान Stem Cell की खोजो तक पहुंच चुका था ।कौरवों की एकसौ सन्तानें आज के समय के टेस्ट ट्यूब बेबी थे ।वे यहीं तक नहीं रुके। वे आगे कहते हैं कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत ठीक नहीं है। इससे अच्छा विकासवाद का सिद्धांत तो अपना प्राचीन दशावतार का सिद्धांत है। इस कांग्रेस में श्री रामचंद्र द्वारा प्रयुक्त अस्त्र -शस्त्रों को आधुनिक मिसाइल बताया गया था। इन सब के खिलाफ देशभर में बहुत प्रदर्शन भी हुए थे। निराशाजनक बात तो यह थी कि इन दावों से संबंधित बातों पर प्रश्न उठाने से भी मना कर दिया गया था। यह बात तो सरासरा अवैज्ञानिक है। बाद में इन सब पर पिटीशन भी दायर की गई। एसोसिएशन  के महासचिव डॉक्टर परमेंद्र माथुर ने स्पष्ट कर दिया था कि हम तो इन वैज्ञानिक दावों से पूरी तरह किनारा करते हैं।

इससे पूर्व सन 2016 में नोबेल वैज्ञानिक सर वेंकटरमन रामाकृष्णन इस कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा दे चुके थे। इन्होंने कहा था– ‘I attended one day and very little sciences was discussed .It was a circus.I find that it is an organization where very little science is discussed.I will never attend a science congress again in my life . ‘सन 2021-22 में यह कांग्रेस कोविद के कारण नहीं हुई। 2023 की कांग्रेस नागपुर में आयोजित हुई थी ।इसमें DST ने 5 करोड़ रुपए दिए थे। स्वाभाविक है अगली कांग्रेस 2024 की तैयारी काफी पहले शुरू हो जाती है ।सितंबर 2023 में कुछ बात उठी की पैसों को लेकर विभाग( भारत सरकार) और कांग्रेस के बीच तनातनी है। पहले तो तय हुआ था कि यह लखनऊ में होगी। बाद में इसका स्थान बदलकर लवली प्रोफेशनल विश्वविद्यालय कर दिया गया। DST ने अपने सभी सरकारी वैज्ञानिक विभागों को कह दिया कि वह इसमें सहयोग न करें। DST का इसके पीछे तर्क था कि यह मनमाने निर्णय लेती है। जबकि हकीकत सभी जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के रुझान के बाद( एकेडमिक गिरावट) सरकार एवं इस कांग्रेस के बीच अनबन है। सन 2024 कांग्रेस के अध्यक्ष प्रोफेसर अरविंद सक्सेना हैं। इन्होंने भारत के विश्वविद्यालयों से एक विनम्र अपील जारी की है कि वे इसकी मेजबानी के लिए आगे आएं ।वे फरवरी 2024 तक प्रतीक्षा करेंगे ,क्योंकि आयोजनों की तैयारी में समय लगता है।

सन 2015 के बाद से देश में एक विशेष प्रकार का साइंटिफिक शिफ्ट रवैया चल रहा है ।केंद्र सरकार ‘इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल’ को आगे बढ़ा रही है ।यह आयोजन ‘विज्ञान भारती’ के साथ मिलकर किया जा रहा है जो कि विज्ञान के क्षेत्र में एक प्रतिक्रियावादी संगठन है। हम जानते हैं कि पिछले वर्ष ‘विज्ञान प्रसार’ बंद किया जा चुका है ।राष्ट्रीय अध्यापक विज्ञान कांग्रेस भी लगभग समाप्त की जा चुकी है ।राष्ट्रीय बाल- विज्ञान कांग्रेस पर भी ढुलमुल रवैया है। सन 2023 दिसंबर कांग्रेस अभी तक नहीं हुई है, जबकि अनेक राज्यों में राज्य स्तरीय आयोजन हो चुका है। इस पर भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों से एक सोची- समझी रणनीति के तहत देश में विज्ञान एवं तर्क पर सतत हमला है ।विडंबना तो यह है कि यह केंद्र प्रेरित है। शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के बेतुके बयान आ रहे हैं। इन पर किसी का कोई शोध नहीं है और न ही कोई प्रमाण ।जबकि हम सब जानते हैं कि यदि प्रमाण नहीं तो विज्ञान नहीं ।निस्सन्देह हमें हमारी प्राचीन उपलब्धियों पर गौरव है। लेकिन इसकी आड़ में हम अवैज्ञानिकता को कभी स्वीकार नहीं कर सकते। न केवल प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अपितु सामाजिक- संस्कृतिक महत्व के मुद्दो पर भी छद्म शोधों की बात की जाती है (सरस्वती नदी की खोज, गोमूत्र में सोने की उपस्थिति आदि-आदि)। सरकारी अनुदान ऐसी संस्थाओं की ओर मोड़े जा रहे हैं जो उनके हितों की सेवा करती हैं। विश्व समुदाय में विज्ञान के क्षेत्र में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए देश के सामने इस समय एक बड़ी चुनौती है।

      (लेखक हरियाणा के वरिष्ठ विज्ञान लेखक एवं विज्ञान संचारक हैं तथा हरियाणा विज्ञान मंच से जुड़े हैं )

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