ललित मौर्या

वैज्ञानिकों ने यह बायोपॉलिमर ‘पॉलीहाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट (पीएचबी)’ एक बैक्टीरिया ‘बैसिलस सबटिलिस एफडब्ल्यू1’ से तैयार किया है, जिसे नागालैंड के मोकोकचुंग जिले में मछली के कचरे वाली जगहों से खोजा गया था। दुनिया भर में माइक्रोप्लास्टिक के बढ़ते प्रदूषण के बीच एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। नागालैंड यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में देश के कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसा बायोडिग्रेडेबल बायोपॉलिमर तैयार किया है, जो पारंपरिक प्लास्टिक का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है।

बता दें कि प्लास्टिक के बेहद महीन कणों को माइक्रोप्लास्टिक के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही कपड़ों और अन्य वस्तुओं के माइक्रोफाइबर के टूटने से भी माइक्रोप्लास्टिक्स बनते हैं। आम तौर पर प्लास्टिक के एक माइक्रोमीटर से पांच मिलीमीटर के टुकड़े को ‘माइक्रोप्लास्टिक’ कहा जाता है। आज हालात ऐसे हैं कि ये सूक्ष्म कण हवा, पानी और मिट्टी के साथ आज धरती के करीब-करीब हर हिस्से में फैल चुके हैं। चिंता की बात यह है कि वैज्ञानिकों को इनकी मौजूदगी के सबूत इंसानों और दूसरे जीवों के शरीर में भी मिले है। देखा जाए तो यह कण मछलियों से लेकर इंसानों तक, पूरी खाद्य श्रृंखला में जमा होते जाते हैं। इस प्रक्रिया को बायोमैग्नीफिकेशन कहा जाता है, जिसमें हर स्तर पर इनकी मात्रा बढ़ती जाती है और अंततः इंसानों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती है।

क्या है नया समाधान?

इसी समस्या को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का बायोपॉलिमर ‘पॉलीहाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट (पीएचबी)’ तैयार किया है। यह प्लास्टिक की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन फर्क यह है कि यह प्राकृतिक रूप से टूटकर खत्म हो जाता है। यह पदार्थ एक बैक्टीरिया ‘बैसिलस सबटिलिस एफडब्ल्यू1’ से तैयार किया गया है, जिसे नागालैंड के मोकोकचुंग जिले में मछली के कचरे वाली जगहों से खोजा गया था। यानी, कचरे से ही समाधान निकालने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

क्यों खास है यह बायोपॉलिमर?

शोधकर्ताओं द्वारा साझा जानकरी के मुताबिक यह बायोपॉलिमर पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है। इसके साथ ही शरीर के लिए सुरक्षित (बायोकम्पैटिबल) पाया गया।इसकी एक और विशेषता यह है कि यह उच्च तापमान भी सह सकता है। मतलब कि एक तरफ जहां यह प्लास्टिक की तरह उपयोगी है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है, क्योंकि यह प्राकृतिक स्रोतों से बना है।

कितनी असरदार है यह तकनीक?

इस अध्ययन में कई अहम और उम्मीद जगाने वाले नतीजे सामने आए। शोध में पाया गया कि यह बैक्टीरिया करीब 69.2 प्रतिशत तक पीएचबी बायोपॉलिएस्टर बना सकता है, जो इसकी मजबूत उत्पादन क्षमता को दिखाता है। जांच में यह भी सामने आया कि यह बायोपॉलिमर उच्च तापमान को सहने में सक्षम है। सबसे महत्वपूर्ण बात, लैब परीक्षणों में यह पदार्थ मानव लिवर की कोशिकाओं (एचईपीजी2) के साथ सुरक्षित और अनुकूल पाया गया, जिससे संकेत मिलता है कि इसका उपयोग मेडिकल क्षेत्र में भी किया जा सकता है। साथ ही, मिट्टी में दबाने पर यह बायोपॉलिमर 28 दिनों में लगभग 60 फीसदी तक गल गया, जो इसे एक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प साबित करता है। इस शोध में देश के कई बड़े संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने भाग लिया, जिनमें सीएसआईआर-नार्थ ईस्ट इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, सत्यभामा विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान, तेजपुर विश्वविद्यालय, भारतियार विश्वविद्यालय, कोयंबटूर और गलगोटिया विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता शामिल हैं। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ पॉलीमर रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं। नागालैंड यूनिवर्सिटी और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रांजल भराली ने प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए कहा कि “माइक्रोबियल बायोटेक्नोलॉजी में हो रही ऐसी प्रगति वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती है। इससे ऐसे पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं, जो उद्योग और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद हों।“

घट सकता है बढ़ता कार्बन उत्सर्जन

उन्होंने बताया कि, “बैक्टीरिया से बने बायोपॉलिमर पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक पर निर्भरता कम कर सकते हैं और सर्कुलर बायोइकोनॉमी को बढ़ावा दे सकते हैं। अगर इन बायोडिग्रेडेबल पदार्थों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल शुरू होता है, तो इससे प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक की समस्या कम होगी, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और मेडिकल, कृषि व पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खुलेंगे।“ हालांकि यह खोज नई उम्मीद जगाती है, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए अभी कई अहम कदम उठाने बाकी हैं। सबसे पहले, इसके उत्पादन को सस्ता और बड़े स्तर पर संभव बनाना होगा। साथ ही, अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में इसके प्रभाव और व्यवहार को समझना भी जरूरी है। इसके अलावा, लोगों के बीच ऐसे टिकाऊ विकल्पों को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा, ताकि इसका इस्तेमाल व्यापक स्तर पर हो सके। नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अगुवाई में हुई यह खोज साबित करती है कि स्थानीय संसाधनों और वैज्ञानिक सोच के संगम से वैश्विक समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। ऐसे में अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया गया, तो यह प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ा हथियार साबित हो सकती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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