ललित मौर्या

चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थ जैसे सॉफ्ट ड्रिंक्स स्वाद में भले ही कितने अच्छे लगें, लेकिन यह किसी मीठे जहर से कम नहीं। हालांकि स्वास्थ्य पर पड़ते अनगिनत दुष्प्रभावों के बावजूद दुनिया भर में इनकी खपत आज भी बदस्तूर जारी है। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने देशों से इन मीठे पेय पदार्थों पर लगने वाले टैक्सों में इजाफा करने का आह्वान किया है। इसके साथ ही डब्ल्यूएचओ ने शराब पर भी कर बढ़ाने की बात कही है।

इसके मौके पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने “ग्लोबल रिपोर्ट ऑन द यूज ऑफ शुगर-स्वीटेनेड बेवरेज टैक्सेज 2023” नामक रिपोर्ट भी जारी की है। इस रिपोर्ट में चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थों पर लागू करों का वैश्विक मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है।

रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि कई देश आज भी स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से हानिकारक इन पेय पदार्थों पर कर लगाने से बच रहे हैं, जबकि कई देश ऐसे हैं जहां इनपर नाममात्र का कर लगाया जा रहा है। वहीं जो देश कर लगा भी रहे हैं उनमें से अधिकांश इस कर से होने वाली आय का उपयोग स्वस्थ विकल्प चुनने और उसे प्रोत्साहित करने के लिए नहीं कर रहे हैं।

185 देशों में इसकी खपत को लेकर किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि 1990 के बाद से वयस्कों में चीनी युक्त पेय पदार्थों की खपत 16 फीसदी बढ़ी है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद चिंताजनक है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 10 यूरोपीय देशों के 450,000 से अधिक वयस्कों पर किए एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि दिन में सिर्फ दो गिलास सॉफ्ट ड्रिंक पीना समय से पहले मौत का कारण बन सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में कहा है कि शर्करा युक्त पेय पदार्थों पर कर लगाने से इसकी खपत को कम किया जा सकता है, जो मोटापा, टाइप 2 मधुमेह और दांतों की सड़न को कम करने में मददगार हो सकता है।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार स्वास्थ्य के लिहाज से खराब आहार वैश्विक स्तर पर सालाना 80 लाख से अधिक मौतों की वजह बन रहा है। वहीं शराब पीने से हर साल दुनिया भर में 26 लाख लोगों की मौत हो रही है। ऐसे में इन पेय पदार्थों पर लगाया अतिरिक्त कर इन मौतों में कमी कर सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मीठे पेय पदार्थों पर कर लगाने वाले करीब आधे देश पानी पर भी कर लगा रहे हैं, जिसकी सलाह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) नहीं देता। पता चला है कि भारत सहित दुनिया के करीब 108 देश किसी न किसी रूप में चीनी युक्त पेय पदार्थों पर टैक्स लगा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर इसपर लगाए जा रहे यदि औसत उत्पाद शुल्क को देखें तो वो सोडा की कीमत का केवल 6.6 फीसदी है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत उन देशों में शामिल है जो इन चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स सुनिश्चित करते हैं। भारत में इन पेय पदार्थों पर करीब 40 फीसदी टैक्स लगाता है। इनपर करीब 28 फीसदी जीएसटी और 12 फीसदी अतिरिक्त उपकर भी लगाया जाता है। हालांकि इसके बावजूद भारत में बड़े पैमाने पर इन पेय पदार्थों की खपत हो रही है।

आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 148 देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर शराब या अन्य मादक पेय पदार्थों पर उत्पाद शुल्क लागू किया है। वहीं कम से कम 22 देशों में शराब को उत्पाद शुल्क से छूट दी है, जिनमें से अधिकांश देश यूरोप में हैं। वहीं वैश्विक स्तर पर देखें तो, बीयर के सबसे अधिक बिकने वाले ब्रांड की कीमत में उत्पाद शुल्क का हिस्सा औसतन 17.2 फीसदी है। इसी तरह सबसे अधिक बिकने वाले स्पिरिट ब्रांड पर यह करीब 26.5 फीसदी है।

2017 में किए एक अध्ययन से पता चला है कि करों के रूप में शराब की कीमतों में 50 फीसदी की वृद्धि से अगले 50 वर्षों में 2.1 करोड़ से ज्यादा मौतों को टाला जा सकता है। साथ ही इससे राजस्व में करीब 17 लाख करोड़ डॉलर का इजाफा होगा।

सीएसई भी लम्बे समय से करता रहा है आगाह

यदि भारत की बात करें तो मार्किट रिसर्च फर्म यूरोमॉनिटर के मुताबिक भारत में शहरीकरण, बढ़ती आय और युवाओं में बढ़ते रुझान के चलते गैर-कार्बोनेटेड ड्रिंक्स की मांग बढ़ गई है। इसके अतिरिक्त, काम के बढ़ते दबाव और सामाजिक समारोहों के चलते भी भारतीय उपभोक्ताओं में एनर्जी ड्रिंक्स की मांग बढ़ रही है। बता दें की सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) भी लम्बे समय से लोगों की सॉफ्ट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और अन्य मीठे पेय पदार्थों के चलते बढ़ते खतरों को लेकर सजग करता रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य संवर्धन निदेशक डॉक्टर रोडिगर क्रेच का कहना है, “स्वास्थ्य के  लिहाज से हानिकारक उत्पादों पर कर लगाने से स्वस्थ आबादी बनती है। इसका समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे बीमारियों में कमी आती है और सरकारों को सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने के लिए राजस्व बढ़ता है।” उनके मुताबिक यदि शराब के मामले में देखें तो इन करों से हिंसा और सड़क पर होने वाले हादसों को रोकने में मदद मिलती है।

शोध से पता चला है कि चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थों और शराब पर कर लगाने से उनकी खपत कम हो जाती है। साथ ही यह कंपनियों को स्वस्थ विकल्प बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसके अतिरिक्त, ये टैक्स कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों जैसी बीमारियों को रोकने में भी मददगार होते हैं।

हाल ही में डब्ल्यूएचओ के सहयोग से गैलप द्वारा किए एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला कि इस सर्वे में शामिल सभी देशों के अधिकांश लोग शराब और शर्करा युक्त पेय पदार्थों जैसे स्वास्थ्य के लिहाज से हानिकारक उत्पादों पर कर बढ़ाने के पक्ष में हैं।

     (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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