ललित मौर्या

पिछले महीने नवंबर के दौरान दिल्ली में कोई भी दिन ऐसा नहीं रहा जब हवा जानलेवा न रही हो। इस बारे में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे लोकसभा में जो जानकारी साझा की है, उसके मुताबिक दिल्ली में 30 के 30 दिन प्रदूषण हावी रहा।

इस दौरान जहां नौ दिनों के दौरान प्रदूषण का स्तर आपात स्थिति में पहुंच गया था। वहीं 17 दिन वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) बेहद खराब रहा, जबकि बाकी चार दिन वायु गुणवत्ता ‘खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई। वहीं इसके विपरीत बेंगलुरु और हैदराबाद में नवंबर के दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं रहा जिसे वायु गुणवत्ता के लिहाज से खराब कहा जा सके। इसी तरह मुंबई और चेन्नई में भी 30 में से 29 दिन अच्छे रहे।

इस दौरान दिल्ली के आसपास के शहरों में भी वायु गुणवत्ता की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं रही। उदाहरण के लिए भिवाड़ी को देखें तो वहां नवंबर के 30 में से 29 दिन प्रदूषण के लिहाज से बुरे दिन थे। भिवाड़ी में नवंबर के 30 में से 16 दिन वायु गुणवत्ता बेहद खराब थी। वहीं नौ दिन प्रदूषण का स्तर आपात स्थिति में पहुंच गया था, जबकि आठ दिन प्रदूषण का स्तर ‘खराब’ दर्ज किया गया। कुछ ऐसी ही स्थिति फरीदाबाद की भी भी जहां 30 में से केवल दो दिन अच्छे रहे। हालांकि इन दो दिनों में भी प्रदूषण का स्तर ‘मध्यम’ रहा। आंकड़ों के मुताबिक फरीदाबाद में नवंबर के 30 में से 17 दिनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहद खराब श्रेणी में रहा, जबकि नौ दिन प्रदूषण के नजरिए से गंभीर रहे और दो दिन प्रदूषण का स्तर ‘खराब’ रहा।

कुछ ऐसी ही स्थिति नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ की रही जहां नवंबर के 30 में से 28 दिन प्रदूषण के लिहाज से बुरे रहे। मेरठ में तो 30 में से 22 दिन वायु गुणवत्ता बेहद खराब श्रेणी में रही। जबकि नोएडा में 19 गाजियाबाद में 18 और ग्रेटर नोएडा में 15 दिन एक्यूआई बेहद खराब रहा। इसी तरह मानेसर, गुरूग्राम, रोहतक, भरतपुर और बागपत में 30 में से केवल तीन दो या तीन दिन अच्छे रहे। गुरूग्राम में तो तीन दिन ऐसे थे जब वायु गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में पहुंच गई, जबकि 16 दिन हवा ‘बेहद खराब’ रही।

वायु गुणवत्ता के लिहाज से अच्छे रहे चेन्नई में नवंबर के 30 में से 29 दिन

वहीं इस दरमियान चेन्नई ऐसा एकलौता शहर था जहां 12 दिन प्रदूषण का स्तर 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे कम दर्ज किया गया। वहीं 14 दिन वायु गुणवत्ता संतोषजनक दर्ज की गई। कुल मिलकर देखें तो चेन्नई में नवंबर के 30 में से 29 दिन अच्छे थे। इसी तरह मुंबई में भी केवल एक दिन प्रदूषण के लिखा से खराब कहा जा सकता है। इनके बाद मांडीखेड़ा में नवंबर के 30 में से 21 दिन प्रदूषण के लिहाज से अच्छे रहे। जबकि खुर्जा में 23 दिन, पलवल में 20 दिन, कोलकाता में 19 दिन अच्छे रहे। वहीं पलवल में आठ दिन प्रदूषण ज्यादा रहा।

अपने इस लिखित जवाब में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए क्या कुछ कदम उठाए हैं उनका भी जिक्र किया है। हालांकि हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली-एनसीआर में नवंबर के दौरान हवा जहरीली ही थी।

यहां तक की दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए दीवाली के दौरान पटाखों पर रोक तक लगा दी थी, लेकिन इसके बावजूद प्रदूषण बढ़ने का सिलसिला इस साल भी जारी रहा। जो कहीं न कहीं इस बात पर जोर देता है कि दिल्ली और उसके आसपास के शहरों में बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम के लिए कहीं ज्यादा ठोस कदम उठाने की जरूरत है। आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में प्रदूषण को जो सिलसिला अक्टूबर का अंतिम सप्ताह में शुरू हुआ था, वो अब तक जारी है। बता दें कि इस दौरान दिल्ली के आसपास के राज्यों में जलती पराली भी बड़े पैमाने पर दिल्ली-एनसीआर को खराब करती है। साथ ही उद्योगों और बिजली संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन भी इसमें अहम भूमिका निभाता है।

पर्यावरण मंत्रालय ने सर्दियों के दौरान दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के लिए जिम्मेवार कारकों का भी जिक्र किया है। इसके मुताबिक सर्दियों के दौरान दिल्ली में होने वाली पीएम 2.5 के करीब 30 फीसदी के लिए उद्योग जिम्मेवार हैं। जबकि प्रदूषण के इन 28 फीसदी महीन कणों की वजह वाहनों से निकलने वाला धुआं है। इसी तरह पीएम 2.5 के 17 फीसदी हिस्से के लिए सड़कों और कंस्ट्रक्शन से होने वाली धूल जिम्मेवार है। घरों से होने वाला प्रदूषण 10 फीसदी जबकि चार फीसदी पीएम 2.5 के लिए पराली जलाने को जिम्मेवार माना गया है। वहीं बाकी के 11 फीसदी पीएम 2.5 के पीछे अन्य कारक जिम्मेवार हैं।

इसी तरह प्रदूषण के दूसरे महत्वपूर्ण कारक पीएम 10 को देखें तो दिल्ली में सर्दियों के दौरान इसके 27 फीसदी हिस्से के लिए उद्योगों को जबकि 25 फीसदी के लिए धूल और 24 फीसदी के लिए यातायात को जिम्मेवार माना गया है। इसी तरह नौ फीसदी पीएम 10 के लिए घरों से होने वाला प्रदूषण वहीं चार फीसदी के लिए पराली और अन्य फसल अवशेषों को जिम्मेवार माना है। बाकी 10 फीसदी पीएम 10 के पीछे की वजह अन्य कारक थे, ऐसा पर्यावरण मंत्रालय का कहना है।

यहां उद्योगों के दायरे में बिजली संयंत्रों, कोल हैंडलिंग इकाइयों, ईंट-भट्ठे, स्टोन क्रशर और अन्य को शामिल किया गया है। इसी तरह प्रदूषण के अन्य स्रोतों में डीजल जेनेरेटर्स, कचरा जलाने से होने वाला प्रदूषण, एयरपोर्ट, रेस्टोरेंट और लैंडफिल आदि से होने वाले प्रदूषण को शामिल किया गया है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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