दयानिधि
शहद, मोम और पेड़ों से मिलने वाला चिपचिपा पदार्थ प्रोपोलिस मिलकर बनाते हैं प्राकृतिक एंटीबायोटिक दीवार। आसपास के जंगल और फूलों की विविधता भी तय करती है मधुमक्खियों की सेहत। मधुमक्खियों का छत्ता सिर्फ उनका घर नहीं है। यह उनका अस्पताल भी है, जहां बीमारी से बचाव का इंतजाम प्रकृति ने बेहद चतुराई से कर रखा है। यहां शहद केवल भोजन नहीं, मोम सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं और पेड़ों से मिलने वाला चिपचिपा पदार्थ केवल दरारें भरने के काम नहीं आता। ये सभी मिलकर पूरे छत्ते को बीमारियों से बचाने का काम करते हैं। वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में पाया है कि मधुमक्खियों का छत्ता किसी जीवित प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) की तरह काम करता है। इसकी खास बात यह है कि छत्ते के अलग-अलग हिस्सों में सुरक्षा की अलग-अलग व्यवस्था है। इतना ही नहीं, मधुमक्खियों के आसपास उगने वाले पेड़-पौधे भी उनकी इस प्राकृतिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

शहद से लेकर मोम तक, हर चीज में छिपी है सुरक्षा
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में किए गए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 24 मधुमक्खी कॉलोनियों का परीक्षण किया। शोधकर्ताओं ने शहद, परागकण, मोम और प्रोपोलिस की रासायनिक संरचना और रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता का अध्ययन किया। यह अध्ययन आईएसएमई कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। नतीजों में शहद सबसे प्रभावशाली रोगाणुरोधी पदार्थों में शामिल मिला। इसमें मौजूद हाइड्रोजन पेरॉक्साइड जैसे तत्व हानिकारक सूक्ष्मजीवों को रोकने में मदद करते हैं। इसके बाद आता है प्रोपोलिस। यह पेड़ों और पौधों से मिलने वाले रेजिन से बना चिपचिपा पदार्थ है, जिसे मधुमक्खियां छत्ते की दरारें बंद करने और खुले हिस्सों को सुरक्षित करने में इस्तेमाल करती हैं। इसमें मौजूद फ्लेवोनॉयड्स जैसे प्राकृतिक रसायन बैक्टीरिया और दूसरे हानिकारक सूक्ष्मजीवों के खिलाफ काम करते हैं।

छत्ते के भीतर बदल जाता है सुरक्षा का तरीका
शोध में एक दिलचस्प बात सामने आई। छत्ते के बाहरी हिस्सों में रोगाणुओं से लड़ने वाली सुरक्षा ज्यादा मजबूत थी। लेकिन जैसे-जैसे वैज्ञानिक छत्ते के अंदर की ओर बढ़े, सुरक्षा का तरीका बदलता गया। जहां रानी मधुमक्खी अंडे देती है और लार्वा विकसित होते हैं, वहां मोम के छत्ते, जमा परागकण और खुद मधुमक्खियों के शरीर से निकलने वाले पदार्थ अहम भूमिका निभाते हैं। ये हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को नियंत्रित करने के साथ उपयोगी सूक्ष्मजीवों को भी पनपने का मौका देते हैं। शोध के मुताबिक, छत्ते में इन प्राकृतिक पदार्थों की व्यवस्था कोई संयोग नहीं है। हर पदार्थ अपनी जगह पर रहकर सुरक्षा की पूरी व्यवस्था में योगदान देता है। यानी मधुमक्खियों ने अपने घर को एक व्यवस्थित सुरक्षा कवच में बदल रखा है।

जंगल से दूरी बढ़ी तो कमजोर हो सकता है सुरक्षा कवच
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू छत्ते और आसपास के पर्यावरण का संबंध है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन मधुमक्खी कॉलोनियों के आसपास प्राकृतिक जंगल और झाड़ियां थीं, उनके रासायनिक सुरक्षा तंत्र में उन कॉलोनियों से अंतर था, जो कृषि भूमि के नजदीक थीं। इसका कारण फूलों और वनस्पतियों की विविधता हो सकती है। मधुमक्खियां अलग-अलग पौधों से रस और रेजिन जुटाती हैं। यही सामग्री बाद में शहद और प्रोपोलिस जैसे पदार्थों के जरिए छत्ते की सुरक्षा में योगदान देती है। शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि जंगलों की कटाई और गहन खेती मधुमक्खियों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकती है। इसलिए फूलों से भरे प्राकृतिक आवासों को बचाना मधुमक्खियों के स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।

बैक्टीरिया से बड़ा खतरा, फंगस से कम मुकाबला
अध्ययन में यह भी सामने आया कि छत्ते की प्राकृतिक सुरक्षा फंगस की तुलना में बैक्टीरिया के खिलाफ ज्यादा प्रभावी थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी एक वजह बैक्टीरिया से होने वाली गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। अमेरिकन फाउलब्रूड ऐसी ही एक खतरनाक बीमारी है, जो मधुमक्खियों के लार्वा को मार सकती है और पूरी कॉलोनी को तबाह कर सकती है।

अब दूसरे सामाजिक जीवों पर नजर
यह शोध मधुमक्खियों तक ही सीमित नहीं रह सकता। वैज्ञानिक अब जानना चाहते हैं कि क्या भारत और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली देशी डंक रहित मधुमक्खियों, चींटियों और दीमकों में भी ऐसी ही प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है। इस अध्ययन का संदेश साफ है। मधुमक्खियों को बचाने के लिए सिर्फ उनके छत्तों की रक्षा करना काफी नहीं। उनके आसपास फूलों, पेड़ों और प्राकृतिक वनस्पतियों का होना भी उतना ही जरूरी है। प्रकृति ने मधुमक्खियों को बीमारी से लड़ने का हुनर दिया है, लेकिन उस हुनर को मजबूत बनाए रखने के लिए स्वस्थ पर्यावरण जरूरी है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
