अनिल अश्वनी शर्मा
पिछले पांच वर्षों में तमिलनाडु में लोन यानी ऋण लेनी वाली महिलाओं में 10 प्रतशित चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि की दर देखी गई है, यानी राज्य में लोन लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44 है। प्रतिशत के आधार पर तमिलनाडु की महिलाएं लोन लेने में देश में सबसे आगे हैं।
दूसरी ओर महाराष्ट में लोन लेने वाली महिला की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है, जबकि राजस्थान में 26, मध्य प्रदेश में 25 और उत्तर प्रदेश में 23 प्रतिशत है। यह बात गत दिनों नीति आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तरी और मध्य राज्यों (राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) में पिछले 5 वर्षों में लोन लेने वाली महिला में उच्च चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर देखी गई है, लेकिन इसके बावजूद पूरे देश में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी कम बनी हुई है।
रिपोर्ट को नीति आयोग के महिला उद्यमिता मंच (डब्ल्यूईपी) और माइक्रोसेव कंसल्टिंग (एमएससी) द्वारा जारी किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की वित्तीय पहुंच में तेजी लाना न केवल आर्थिक जरूरत है, बल्कि समावेशी विकास के लिए रणनीतिक अनिवार्यता भी है। महिला उद्यमी अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण लेकिन कम इस्तेमाल की जाने वाली ताकत बन कर रह गई हैं, जिनमें 150 से 170 मिलियन नौकरियां पैदा करने और महिला श्रम शक्ति भागीदारी को बढ़ावा देने की अच्छी खासी क्षमता है।
फिर भी उन्हें सीमित ऋण, जटिल बैंकिंग प्रक्रियाएं और उधार लेने को हतोत्साहित करने वाले सामाजिक मानदंडों जैसी कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 30 प्रतिशत व्यक्तिगत उद्यम और 22.2 प्रतिशत सामूहिक उद्यम में भी छोटे ऋणों के लिए भी ऋण देने की प्रक्रिया बहुत ढिली है। इन तमाम बाधाओं के अलावा कई महिलाएं उपयोगकर्ता के खराब व्यवहार, वित्तीय संस्थानों के प्रति अविश्वास और वित्तीय नतीजों के डर के कारण वित्तीय अवसरों से खुद को अलग कर लेती हैं।
रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्धि में महिलाओं की उभरती भूमिका का विस्तृत अध्ययन किया गया है। अध्ययन में महिलाओं की क्षमता और उनके सामने आने वाली संस्थागत बाधाओं पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए उसमें सुधार के सुझाव दिए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में उनका योगदान केवल 18 प्रतिशत है।
यह सही है कि लोन लेने वाली महिलाओं की संख्या में तीन गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है और यह बात महिलाओं के लोने की बढ़ती प्रवृत्ति को बताता है। ऋण लेने वाली लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं अर्ध शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों से आती हैं। वहीं 30 वर्ष से कम आयु की महिलाएं खुदरा ऋण लेने के मामले में उनकी हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है जबकि पुरुषों का प्रतिशत 40 है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में ऋण लेने वाली महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। 2019 से व्यवसायिक ऋण लेने में उनकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत बढ़ी है। 2024 तक महिलाओं द्वारा लिए गए 42 प्रतिशत ऋण व्यक्तिगत वित्त के लिए थे जो कि 2019 में 39 प्रतिशत के हिसाब से एक मामूली वृद्धि कही जाएगी।
पिछले सात वर्षों में महिला श्रम बल भागीदारी दर 2017-18 में 23.3 से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि काफी हद तक ग्रामीण महिलाओं की बढ़ी हुई आर्थिक भागीदारी दिखाती है। रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु में लोन लेने वाली महिला की हिस्सेदारी सबसे अधिक 44 प्रतिशत है। कुल मिलाकर देखा जाए तो दक्षिणी राज्यों में लोन लेने वाली महिला की हिस्सेदारी अधिक है। तमिलनाडु (44), आंध्र प्रदेश (41), तेलंगाना (35), कर्नाटक (34 प्रतिशत) हिस्सेदारी है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन सबके बावजूद महिलाओं के लिए और अधिक सशक्तिकरण की आवयकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को महिलाओं को ऋण देने की प्रक्रिया को और अधिक सरल व मजबूत करने की सलाह दी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की सलाह दी है कि बैंक ऋण में उनकी हिस्सेदारी 5 प्रतिशत या इससे अधिक बढ़ाने का प्रयास किया जाए।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )