दयानिधि
समुद्र के बढ़ते खतरे से उजड़ रहे तटीय गांव, सुरक्षित पुनर्वास के साथ रोजगार, आजीविका और सामाजिक पहचान बचाना अब बड़ी चुनौती बन गई है। भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा का पुराना पोडमपेट्टा कभी एक छोटा और खुशहाल मछुआरा गांव था। यहां रहने वाले परिवारों की जिंदगी समुद्र से जुड़ी थी। लोग समुद्र की लहरों, हवाओं और ज्वार-भाटे को समझकर मछली पकड़ते थे। सुबह उनकी आंख खुलती थी तो सामने समुद्र होता था और उसी से उनका जीवन चलता था। लेकिन धीरे-धीरे समुद्र का कटाव बढ़ने लगा। इसके साथ ही लगातार आने वाले चक्रवातों ने गांव के लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं। घर टूटने लगे और जमीन समुद्र में जाने लगी। आखिरकार लोगों के लिए वहां रहना सुरक्षित नहीं रहा। गांव के कई परिवारों को अपना पुराना घर छोड़ना पड़ा। यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित किया गया है।

दक्षिण एशिया में बढ़ रही है समस्या
पोडमपेट्टा की कहानी अकेली नहीं है। दक्षिण एशिया के कई तटीय इलाकों में जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ रहा है। बांग्लादेश और भारत में वर्ष 2024 में तेज गति से आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण करीब 80 लाख लोग अपने ही देशों के अंदर विस्थापित हुए। इनमें से बहुत से लोग चक्रवात, बाढ़ और दूसरी आपदाओं के समय कुछ समय के लिए सुरक्षित स्थानों पर गए। उनका इरादा वापस अपने घर लौटने का था। लेकिन कुछ लोगों के लिए घर लौटना अब संभव नहीं है। ऐसे मामलों में लोगों को हमेशा के लिए किसी दूसरी जगह बसाने की जरूरत पड़ती है। इसे नियोजित पुनर्वास या नियोजित स्थानांतरण कहा जाता है।

सिर्फ नया घर देना काफी नहीं
नियोजित पुनर्वास का उद्देश्य लोगों को खतरे से दूर सुरक्षित जगह देना है। लेकिन केवल पक्का घर बना देने से किसी परिवार की समस्या खत्म नहीं होती। घर के साथ रोजगार, सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधा और पानी जैसी जरूरी चीजें भी चाहिए। बांग्लादेश में कुछ लोगों ने बताया कि नई जगह पर घर मिलने से उन्हें स्थायी पता मिला। इससे सरकारी योजनाओं और दूसरी सुविधाओं तक पहुंच आसान हुई। लेकिन दूसरी तरफ कई लोगों को नई बस्ती में जलभराव और खराब सड़कों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इससे साफ है कि एक खतरे से बचाने के बाद अगर दूसरी नई समस्याएं पैदा हो जाएं, तो पुनर्वास पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता।

रोजगार छूटने का बड़ा डर
गांव छोड़ने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ी चिंता रोजगार की होती है। मछुआरों के लिए समुद्र सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी का आधार है। किसानों के लिए खेत उनकी आय का मुख्य साधन हैं। ओडिशा के केंद्रापड़ा जिले में कुछ लोगों ने बताया कि उन्हें नया घर बनाने के लिए जमीन तो मिली, लेकिन खेती के लिए जमीन नहीं मिली। नई जगह पर रोजगार भी नहीं था। पहले वे अपने खेत, आसपास के जंगल और पानी के स्रोतों से कई जरूरतें पूरी कर लेते थे। नई जगह पर उन्हें चावल, सब्जियां और मछली जैसी चीजें भी खरीदनी पड़ती थीं।इस तरह पुनर्वास के बाद लोगों की नकद पैसे पर निर्भरता बढ़ जाती है। कई परिवार रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों और राज्यों में जाने लगते हैं। यानी पुनर्वास के बाद भी पलायन पूरी तरह खत्म नहीं होता।

लोगों की भागीदारी जरूरी
किसी समुदाय को उसकी इच्छा के बिना दूसरी जगह भेजना अक्सर नई परेशानियां पैदा कर सकता है। इसलिए पुनर्वास की योजना बनाते समय वहां रहने वाले लोगों की राय लेना बहुत जरूरी है। नई जगह उनके रहने के तरीके और संस्कृति के अनुसार होनी चाहिए। घरों में खाना बनाने, पशु रखने और परिवार की निजी जरूरतों के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए। बच्चों के खेलने और समुदाय के लोगों के साथ मिलने के लिए भी साझा स्थान होने चाहिए। इसके साथ नई बस्ती को बाढ़, गर्मी और चक्रवात जैसे खतरों से सुरक्षित बनाना जरूरी है। लोगों की संस्कृति और परंपराओं के लिए भी जगह होनी चाहिए, ताकि वे नई जगह को अपना घर महसूस कर सकें।

पोडमपेट्टा से मिलती है सीख
पुराने पोडमपेट्टा के लोगों का नया घर समुद्र से कुछ अंदर बनाया गया। इस जगह को चुनने में समुदाय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। नई बस्ती समुद्री कटाव और चक्रवात के खतरे से सुरक्षित है। साथ ही समुद्र पास होने के कारण मछुआरों के रोजगार पर भी बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा। यह उदाहरण दिखाता है कि सही योजना और लोगों की भागीदारी से पुनर्वास बेहतर तरीके से किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों को जब अपना घर छोड़ना पड़े, तो उन्हें केवल सुरक्षित छत नहीं, बल्कि सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का अवसर भी मिलना चाहिए। आखिरकार, किसी पुनर्वास की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि वहां रहने वाले लोग सुरक्षित, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी पा रहे हैं या नहीं। घर बदलना केवल शुरुआत है, असली लक्ष्य लोगों को बेहतर भविष्य देना होना चाहिए।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
