ललित मौर्या

क्या आप जानते हैं कि प्रदूषित हवा में थोड़े समय के लिए भी सांस लेने से हमारे सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे न केवल ध्यान केंद्रित करना, बल्कि साथ ही भावनाओं को नियंत्रित करना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में रोजमर्रा के काम और भी मुश्किल हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसा हवा में मौजूद प्रदूषण के महीन कणों की वजह से होता है जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के रूप में जाना जाता है। यह कण हमारी दिमागी क्षमता पर भी असर डालते हैं। बर्मिंघम और मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए नए अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण भावनाओं की समझ, कार्यों पर ध्यान लगाना और दूसरों के साथ कैसे व्यवहार और बातचीत की जाए इसे मुश्किल बना सकता है। इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक यहां तक की थोड़े समय के लिए प्रदूषित हवा में सांस लेने से ध्यान केंद्रित करना कठिन हो सकता है। गौरतलब है कि जर्नल एनवायर्नमेंटल हेल्थ में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि वाहनों से होने वाले प्रदूषण का सामान्य स्तर भी कुछ घंटों में मानव मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।

इस अध्ययन के मुताबिक डीजल प्रदूषण के सिर्फ दो घंटों के संपर्क में आने से इंसानी मस्तिष्क की फंक्शनल कनेक्टिविटी घट जाती है। दिमाग की यह फंक्शनल कनेक्टिविटी ही इस बात को सुनिश्चित करता है कि मस्तिष्क के विभिन्न हिस्से एक दूसरे के साथ कैसे संवाद करते हैं।

बता दें कि इस बात की पहले ही पुष्टि हो चुकी है कि वायु प्रदूषण सांस लेने में कठिनाई के साथ-साथ ह्रदय से जुड़ी अन्य बीमारियों के लिए भी जिम्मेवार है। बर्मिंघम और मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने अपने इस नए अध्ययन में 26 वयस्कों को दो समूहों में अध्ययन किया है। इसमें एक समूह वो था, जो प्रदूषित हवा के संपर्क में आया था, वहीं दूसरे ने साफ हवा में सांस ली थी।

 

इस दौरान शोधकर्ताओं ने प्रदूषित या स्वच्छ हवा में सांस लेने से पहले और बाद में लोगों की सोचने-समझने की क्षमता का परीक्षण किया। इन परीक्षणों में स्मृति, ध्यान, भावना, प्रतिक्रिया की गति और ध्यान की जांच की गई। उन्होंने पाया है कि प्रदूषित हवा में सांस लेने से आत्म-नियंत्रण और ध्यान लगाना मुश्किल हो सकता है। इसका सीधा असर हमारे रोजमर्रा के कामों को करने की क्षमता पर पड़ता है।

हमारा दिमाग हमें हर दिन सोचने और निर्णय करने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, खरीदारी करते समय, यह आपको अपनी सूची पर ध्यान केंद्रित करने, अन्य वस्तुओं को अनदेखा करने में मदद करता है। इस तरह आप उन चीजों को नहीं खरीदते, जिनकी आपको जरूरत नहीं है। देखा जाए तो वर्किंग मेमोरी मस्तिष्क में एक छोटे नोटपैड की तरह होती है जो कुछ समय के लिए जानकारी को याद रखने और उसका उपयोग करने में मदद करती है। यह एक साथ कई काम करने के लिए महत्वपूर्ण है।

कैसे दिमाग पर भारी पड़ रहा है प्रदूषण

इसी तरह सामाजिक-भावनात्मक सोच हमें अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने में मदद करती है। यह हमारा सामाजिक परिस्थितियों में बेहतर व्यवहार करने के लिए मार्गदर्शन करती है। भले ही यह एक अलग कौशल है, लेकिन यह जीवन के अन्य पहलुओं के साथ मिलकर काम करता है और काम के दौरान कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करने और दैनिक जीवन में सफल होने में मदद करता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक प्रदूषण के कारण होने वाली सूजन इसकी वजह हो सकती है। इसकी वजह से ध्यान केंद्रित करना और भावनाओं को समझना मुश्किल हो जाता है। हालांकि इससे इससे याददाश्त पर कोई असर नहीं देखा गया। बर्मिंघम विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर फ्रांसिस पोप ने प्रेस विज्ञप्ति में टिप्पणी की है: “खराब वायु गुणवत्ता बौद्धिक विकास के साथ-साथ श्रमिकों की उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।”

उनके मुताबिक इसकी वजह से सीखना मुश्किल हो जाता है, जिसका खामियाजा समाज और अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ता है। ऐसे में उन्होंने प्रदूषित शहरों में मानसिक स्वास्थ्य पर प्रदूषण के पड़ते प्रभावों से निपटने के लिए सख्त नियमों और बेहतर उपायों की वकालत की है। साथ ही शोधकर्ताओं ने यह समझने के लिए और अधिक शोध करने की आवश्यकता पर जोर दिया है कि वायु प्रदूषण हमारे मस्तिष्क को कैसे प्रभावित करता है। साथ ही शोधकर्ताओं के मुताबिक बच्चों और बुजुर्गों पर इसके पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को समझना भी महत्वपूर्ण है।

शोधकर्ताओं ने इस तथ्य को भी उजागर किया है कि यह इस बात का परीक्षण करने वाला पहला अध्ययन है कि दूषित हवा में सांस लेने से मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह दर्शाता है कि प्रदूषण हमारी सोच को कैसे प्रभावित करता है। एक अन्य अध्ययन के हवाले से पता चला है कि गर्भावस्था और बचपन के दौरान प्रदूषण के कुछ महीन कणों जैसे पीएम 2.5 और नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) का संपर्क मस्तिष्क के श्वेत पदार्थ की संरचना में बदलाव की वजह बन सकता है। यह बदलाव बच्चों के दिमागी विकास को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इसी तरह एक अन्य अध्ययन के मुताबिक लंबे समय तक दूषित हवा में सांस लेने से ल्यूपस नामक बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। ल्यूपस एक ऑटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर को बीमारियों से बचाने वाला अपना इम्यून सिस्टम ही शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है। गौरतलब है कि वायु प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य पर मंडराते सबसे बड़े पर्यावरणीय जोखिमों में से एक है, जो असमय मृत्यु की वजह बन रहा है। इतना ही नहीं दूषित हवा फेफड़ों और ह्रदय सम्बन्धी बीमारियों की भी वजह बनती है। इतना ही नहीं यह मल्टीपल स्केलेरोसिस, अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी मस्तिष्क संबंधी बीमारियों से भी जुड़ा है।

शोध में यह भी सामने आया है कि पीएम 2.5 वायु प्रदूषण का वह घटक है, जो स्वास्थ्य को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है। 2015 में यह करीब 42 लाख मौतों  की वजह बना था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी सिफारिश की है कि एक दिन में हवा में मौजूद पीएम 2.5 का स्तर 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। वहीं यदि साल की बात करें तो यह स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम होना चाहिए। भारत से जुड़े ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के अधिकांश शहरों में अभी भी वायु गुणवत्ता का स्तर इन मानकों पर खरा नहीं है। ऐसे में देश में वायु प्रदूषण की समस्या पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

     (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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