ललित मौर्या
यह संकेत है कि हवा में मौजूद जहर न सिर्फ सांसों को, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सोच और आवाज को भी प्रभावित कर सकता है। मां के गर्भ में पल रहा बच्चा अभी दुनिया में आया भी नहीं होता, लेकिन उसकी सेहत का भविष्य पहले ही हवा में मौजूद जहर तय करने लगता है। नई रिसर्च में सामने आया है कि गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से बच्चों के मानसिक विकास, विशेषकर बोलने और भाषा सीखने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

सेंटर फॉर डेवलपिंग ब्रेन, किंग्स कॉलेज लंदन और इम्पीरियल कॉलेज लंदन से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए अध्ययन में पाया गया कि जिन माओं के गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और प्रदूषण के महीन कणों जैसे पीएम10 और पीएम2.5 के संपर्क का स्तर अधिक था, उनके बच्चों में 18 महीने की उम्र में भी भाषाई विकास में देरी देखी गई। यह संकेत है कि हवा में मौजूद जहर न सिर्फ सांसों को, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सोच और आवाज को भी प्रभावित कर सकता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

पहले तीन महीने सबसे संवेदनशील
गौरतलब है कि भाषाई विकास एक स्वाभाविक, निरंतर और सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से बच्चा जन्म से लेकर बचपन के शुरुआती वर्षों (विशेषकर 0-6 वर्ष) तक शब्दों, हावभाव, बोलने, पढ़ने और लिखने के माध्यम से संवाद करने की क्षमता हासिल करता है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि समय से पहले जन्म लेने वाले (प्रीमैच्योर) बच्चों पर इसका असर और गंभीर था। ऐसे बच्चों में न सिर्फ बोलने की क्षमता देर से विकसित हुई, बल्कि उनकी शारीरिक हरकतों (मोटर स्किल्स) में भी कमजोरी देखी गई। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में 2015 से 2020 के बीच जन्मे 498 शिशुओं के स्वास्थ्य का विश्लेषण किया है। इनमें से 125 बच्चे समय से पहले (प्रीमैच्योर) जन्मे थे। इनमें 54 बच्चे ऐसे भी थे जो 32 सप्ताह से भी कम अवधि में जन्मे थे, जिन्हें ‘अत्यंत और बेहद प्रीमैच्योर’ माना जाता है।

इन शिशुओं के विकास को जांचने के लिए मानक क्लिनिकल टेस्ट ‘बेले स्केल्स’ का उपयोग किया गया, जिसमें उनकी सोचने, भाषा और मोटर स्किल्स का आकलन किया जाता है। इस परीक्षण में 100 का स्कोर औसत सामान्य विकास को दर्शाता है। वैज्ञानिकों ने गर्भावस्था के दौरान उनके घर के पते के आधार पर प्रदूषण के स्तर का भी अनुमान लगाया और 18 महीने की उम्र में बच्चों की भाषा, सोच और शारीरिक विकास की भी जांच की। दिलचस्प बात यह है कि यहां प्रदूषण का स्तर सरकार द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा के भीतर, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नए मानकों से अधिक था।

समय से पहले जन्मे बच्चों पर ज्यादा असर
नतीजों में पाया गया कि गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में अधिक प्रदूषण के संपर्क में आए बच्चों के भाषाई परीक्षण में औसतन 5 से 7 अंक तक की गिरावट थी। वहीं कम प्रदूषण के संपर्क में रहे बच्चों की तुलना में उनका प्रदर्शन कमजोर पाया गया। हालांकि गर्भावस्था के बाद के महीनों में ऐसा कोई स्पष्ट असर नहीं दिखा। अध्ययन में यह भी पहली बार जांचा गया कि क्या समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों पर प्रदूषण का असर अलग होता है। नतीजे बताते हैं कि ऐसे बच्चों में मोटर और भाषा दोनों विकास पर और भी ज्यादा नकारात्मक प्रभाव देखा गया। कुछ मामलों में जो बच्चे गर्भावस्था के दौरान सबसे अधिक प्रदूषण के संपर्क में आए थे, उनमें मोटर स्किल्स के स्कोर 11 अंक तक कम पाए गए। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर एलेक्जेंड्रा बॉन्थ्रोन के मुताबिक, “अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि क्या ये बच्चे आगे चलकर अपने साथियों की बराबरी कर पाएंगे या नहीं। इसके लिए लंबे समय तक अध्ययन की जरूरत होगी।” उन्होंने यह भी कहा कि विकास में दिख रहा यह अंतर आगे चलकर शिक्षा और समझने की क्षमता पर असर डाल सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि भविष्य के शोध से ही हो सकेगी।

क्या सुरक्षित नहीं ‘कानूनी सीमा’
विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध इस बात का मजबूत संकेत है कि हवा का प्रदूषण केवल सांस की बीमारी नहीं, बल्कि बच्चों के दिमागी विकास और उनके भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है। इंपीरियल कॉलेज लंदन में प्रोफेसर फ्रैंक केली ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि “कानूनी सीमा के भीतर भी प्रदूषण बच्चों के विकसित होते मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है।“ उन्होंने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी बताया। उनका कहना है कि, “यह इस बात पर फिर से सोचने के लिए मजबूर करता है कि गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए ‘सुरक्षित’ हवा की गुणवत्ता क्या होनी चाहिए। वायु गुणवत्ता में सुधार सिर्फ साफ आसमान के लिए नहीं, बल्कि हर बच्चे को जीवन की बेहतर शुरुआत देने के लिए जरूरी है।” देखा जाए तो भले ही यह अध्ययन लंदन में बच्चों पर किया गया हो, लेकिन दुनिया के अन्य हिस्सों में भी यह समस्या कम गंभीर नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया की 90 फीसदी से अधिक आबादी यानी 782 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसी हवा में सांस ले रहें हैं जो स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं है। वहीं भारत की बात करें तो यहां कई शहरों में स्थिति काफी खराब है और लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। यह अध्ययन एक स्पष्ट संदेश देता है, साफ हवा केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के दिमाग और भविष्य का भी सवाल है। भारत में वायु गुणवत्ता की ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
