ललित मौर्या
यूएनडीपी की नई रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते सरकारी कर्ज का सबसे भारी बोझ महिलाओं पर पड़ रहा है, जिससे 5.5 करोड़ नौकरियां खतरे में हैं और स्वास्थ्य, आय व सामाजिक सुरक्षा पर गहरा असर पड़ रहा है। जब कोई देश कर्ज के दलदल में फंसता है, तो फाइलों में दर्ज आंकड़े सिर्फ अर्थव्यवस्था की गिरावट नहीं दिखाते, बल्कि उन घरों के चूल्हे और उम्मीदों को भी बुझा देते हैं जिन्हें महिलाएं संभालती हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दुनिया के कई विकासशील देशों में बढ़ता सरकारी कर्ज अब केवल आर्थिक संकट नहीं रह गया, बल्कि यह करोड़ों महिलाओं के जीवन, रोजगार और स्वास्थ्य पर गहरी चोट कर रहा है। रिपोर्ट ने चेताया है कि यदि सरकारें कर्ज चुकाने में ही अपने संसाधन झोंकती रहीं, तो विकास की वर्षों की उपलब्धियां पीछे जा सकती हैं और इसकी सबसे बड़ी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ेगी। ‘हू पेय्स द प्राइस? जेंडर इनइक्वालिटी एंड सॉवरेन डेट’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में 85 विकासशील देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।

आंकड़ों के पीछे की दर्दनाक हकीकत
रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते कर्ज के इस भारी बोझ के कारण अल्पावधि में करीब 5.5 करोड़ महिलाओं की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं, जबकि लंबे समय में यह आंकड़ा 9.25 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह केवल विकास की उल्टी गिनती नहीं है, बल्कि इंसानी जिंदगियों के बिखरने की भी दास्तान है। रिपोर्ट बताती है कि जब किसी देश पर कर्ज का बोझ मध्यम से उच्च स्तर पर पहुंचता है, तो महिलाओं की प्रति व्यक्ति आय में औसतन 17 फीसदी की गिरावट दर्ज की जाती है। इसके विपरीत पुरुषों की आय पर अपेक्षाकृत बहुत कम असर पड़ता है, जिससे महिलाओं और पुरुषों के बीच आय का अंतर और बढ़ जाता है।

कर्ज चुकाने की कीमत: स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं में कटौती
अक्सर सरकारों के कर्ज प्रबंधन को केवल एक वित्तीय गणना माना जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपी मानवीय हकीकत बेहद चिंताजनक है। जब सरकारें अपनी कमाई को विकास कार्यों और जनता की भलाई में लगाने के बजाय भारी-भरकम कर्ज का ब्याज चुकाने में झोंकने लगती हैं, तो बजट की कैंची सबसे पहले स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों पर चलती है। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, लेकिन महिलाओं को कहीं अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। इतना ही नहीं जब सार्वजनिक देखभाल सेवाएं घटती हैं, तो बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों की देखभाल का अतिरिक्त बोझ परिवारों पर आ जाता है। यह जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं के कंधों पर पड़ती है। नतीजतन उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है, काम के घंटे घटाने पड़ते हैं या रोजगार के अवसरों से समझौता करना पड़ता है।

मातृ मृत्यु दर में 32.5 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का खतरा
स्वास्थ्य बजट में होने वाली यह कटौती सीधे माओं की जान से खिलवाड़ कर रही है। यूएनडीपी द्वारा जारी विश्लेषण के मुताबिक, इस संकट के चलते मातृ मृत्यु दर में 32.5 फीसदी की वृद्धि होने की आशंका है।इसका सीधा मतलब यह है कि हर 1 लाख जन्म पर 67 और माओं की मौत सिर्फ इसलिए हो जाएगी क्योंकि उनके देशों के पास स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसे नहीं बचे। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर बढ़ते इस अत्यधिक दबाव के कारण महिलाओं और पुरुषों, दोनों की जीवन प्रत्याशा (औसत उम्र) में भी गिरावट आ रही है।

सरकारी कर्ज सिर्फ गणित नहीं, इंसानी जिंदगी का सवाल
यूएनडीपी के प्रशासक अलेक्जेंडर डी क्रू का कहना है “सरकारी कर्ज को केवल आर्थिक आंकड़ों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।“ उनके मुताबिक, जब सरकारों के पास कर्ज चुकाने के बाद सामाजिक क्षेत्रों में निवेश के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता, तो सबसे पहले स्वास्थ्य, शिक्षा और देखभाल जैसी बुनियादी सेवाएं प्रभावित होती हैं। इसका सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर पड़ता है, क्योंकि परिवारों में बिना वेतन के देखभाल से जुड़े कामों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाएं ही निभाती हैं। ऐसे में कर्ज प्रबंधन की रणनीतियों में उन सामाजिक निवेशों को सुरक्षित रखना होगा जो एक मजबूत अर्थव्यवस्था और मानव विकास की बुनियाद हैं।

बढ़ता वैश्विक संकट, सिकुड़ती विकास की राह
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा समय में बढ़ते सैन्य तनाव, ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता और महंगाई जैसी वैश्विक चुनौतियों ने सरकारों पर वित्तीय दबाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे में सामाजिक कल्याण पर होने वाला खर्च और कम होने का खतरा है, जिससे विकास की दिशा पलट सकती है। सच कहें तो सरकारें सुरक्षा और अनिश्चितता से निपटने के नाम पर अपने रक्षा बजट तो बढ़ा रही हैं, लेकिन इसकी भारी कीमत आम जनता, विशेषकर महिलाओं के सामाजिक निवेशों को काटकर चुकाई जा रही है। यह स्थिति दशकों की कड़ी मेहनत से हासिल किए गए विकास को पूरी तरह से पीछे धकेल रही है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कर्ज प्रबंधन की रणनीतियां हर इंसान को प्रभावित करती हैं, लेकिन जब भी सरकारी खर्च पर कैंची चलती है, सबसे पहले महिलाएं ही अपनी नौकरी, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता गंवाती हैं। इसलिए अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि कोई भी देश जब कर्ज लेने या चुकाने का फैसला करे, तो उसमें ‘जेंडर इम्पैक्ट असेसमेंट’ (महिला सुरक्षा प्रभाव आकलन) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ऐसे में रिपोर्ट में सरकारों और वैश्विक वित्तीय संस्थानों से अपील की गई है कि वे कर्ज प्रबंधन की रणनीतियों में केवल वित्तीय संतुलन नहीं, बल्कि रोजगार, मानव विकास और लैंगिक समानता को भी बराबर महत्व दें। साथ ही, केवल आर्थिक आंकड़ों को सुधारने के लिए ऐसी नीतियों से बचें जो सामाजिक असमानताओं को और गहरा करती हैं।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
