डी एन एस आनंद

अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति महाराष्ट्र का एक 7 दिवसीय अंधविश्वास उन्मूलन प्राथमिक कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर पिछले दिनों संपन्न हो गया। 10 से 16 दिसंबर तक, प्रत्येक दिन संध्या 7 से 9.30 बजे तक चले इस प्रशिक्षण शिविर में देश के विभिन्न भागों से करीब एक सौ से अधिक लोगों ने भाग लिया। प्रत्येक दिन अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के मार्गदर्शक एवं संघटक , प्रमुख विज्ञान संचारक प्रो. श्याम मानव का रिकार्डेड विडियो दिखाया गया एवं सत्र संचालकों तथा विषय विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर दिए।

10 दिसंबर : पहला दिन
प्रशिक्षण शिविर के पहले दिन के सत्र का विषय था – अंधश्रद्धा की निर्मिति – भाग – 1. सत्र संचालक  यानी उसके प्रस्तावना, समापन और सवाल – जवाब में सामिल थे हरिभाऊ पाथोडे, गणेश जी. विषय प्रवेश हरिभाऊ पाथोडे ने किया। उन्होंने बताया कि आज चर्चा इस बात पर केंद्रित होगी कि अंधश्रद्धा का निर्माण कैसे होता है। उन्होंने बताया कि इस संगठन की शुरुआत 1982 में हुई। शुरू में सिर्फ व्याख्यान होते थे। स्कूल कालेज से लेकर गांव मुहल्ले तक को टारगेट किया गया। 1985 से शिविर का आयोजन शुरू हुआ। पहला शिविर 10 दिनों का था जो समय एवं जरूरत के अनुसार बदलता रहा। अपने रिकार्डेड विडियो में श्याम मानव ने सूर्य से धरती के बनने से लेकर क्रमशः जीव जंतुओं का विकास एवं मानव जाति की उत्पत्ति की बात बताई। उन्होंने कहा कि विचार करने की क्षमता ने मनुष्य को अन्य जीवों से भिन्न कर दिया। जरूरत से भाषा उत्पन्न हुई। डर से राहत एवं सुरक्षा कारणों से सूर्य पहला भगवान बना। इसी प्रकार आग, पानी समेत प्रकृति के अन्य प्रमुख अवयवों को उसने ईश्वर मान लिया। धीरे धीरे संगठित धर्म का उदय हुआ। धर्म गुरु, धर्म ग्रंथ , नियम कायदे बनें। शब्द को प्रमाण मान लिया गया। चाहे वह धर्म ग्रंथ का हो या गुरु का। फिर डार्विन का विकासवाद सामने आया। उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई धर्म, धर्मग्रंथ, धर्मगुरु अथवा उनके बनाए नियम कायदे से नहीं बल्कि शब्द को अकाट्य प्रमाण मानने से है। तर्क एवं बुद्धि प्रमाण को स्थापित करने की जरूरत है। धर्म का धंधा करने वाले, लोगों को ठगने वाले लोगों का विरोध जरूरी है। लोगों का माइंडसेट बदलने, सोचने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने, तर्क की प्रवृत्ति को जगाने, उसे बढ़ावा देने, विकसित करने की जरूरत है। तार्किक बुद्धि के आधार पर सच को स्वीकार करना, यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसके बाद प्रश्नोत्तर सत्र चला।

11 दिसंबर, यानी प्रशिक्षण शिविर के दूसरे दिन का विषय था – अंधश्रद्धा की निर्मिति- भाग – 2. उस दिन सत्र का संचालन किया रवि खानविलकर,निता डुबे ने। दूसरे दिन के प्रो. श्याम मानव के विडियो संबोधन में भी ” क्यों एवं कैसे होता है अंधश्रद्धा का निर्माण ” पर ही और विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि 1982 से तर्कशील आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चेहरा बी. प्रेमानंद के साथ संगठन का काम शुरू हुआ। शब्द प्रमाण की जगह बुद्धि प्रमाण पर बल दिया गया। धर्म का विरोध की जगह लोगों में तार्किक दृष्टि के विकास एवं इसके लिए विज्ञान सम्मत जानकारी देने पर जोर दिया गया। इस क्रम में संत परंपरा की भूमिका को भी रेखांकित किया गया। भगवान के विरोध की जगह उसके नाम पर होने वाले ठगी एवं शोषण का विरोध करने का निर्णय हुआ। उन्होंने बताया कि संत परंपरा एवं समाज सुधारकों ने यही भूमिका चुनी थी। भारत में यह अपने ढंग का इकलौता संगठन है, जिसने परंपराओं के साथ आधुनिक जानकारी को जोड़ा। सभी धर्म श्रद्धा/ फेथ पर खड़ा है इसलिए जरूरी है कि हम शब्द प्रमाण को हटाएं एवं श्रद्धा की जगह विश्वास को अपनाएं। प्रश्नोत्तर के साथ दूसरे दिन के सत्र का समापन हुआ।

12 दिसंबर, रविवार यानी प्रशिक्षण शिविर का तीसरा दिन। तीसरे दिन का विषय था – बाबा गिरी और उस दिन के सत्र का संचालन किया हरिश देशमुख, सुरेश झुरमुरे ने। अपने रिकार्डेड व्याख्यान में प्रो. श्याम मानव ने समाज में मौजूद बाबागिरी की विस्तृत चर्चा की । अपने अध्ययन एवं लम्बे अनुभव का सार पेश करते हुए उन्होंने कहा कि बाबाओं में चमत्कार नहीं होते तथा कोई भी बाबा बीमारियों को ठीक नहीं कर सकता। इस क्रम में उन्होंने व्यक्ति पर होने वाले मनोवैज्ञानिक एवं मनोदैहिक बीमारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण कई बार रोगी तत्काल थोड़ी राहत महसूस करता है पर इससे उसकी बीमारी खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी बाबा भूत भविष्य नहीं बता सकता तथा उसके इस तरह के दावे पूरी तरह गलत होते हैं। उन्होंने ऐसे कुछ प्रयोग खुद करके दिखाए, जिसे दिखाकर बाबा लोग ठगी करते हैं।

13 दिसंबर, प्रशिक्षण शिविर का चौथा दिन। उस दिन का विषय था भाग्य – नसीब एवं फल ज्योतिष। सत्र का संचालन किया प्रकाश धोटे, चंद्रकात सर्वगौड ने। प्रो. श्याम मानव ने अपनी बात इस प्रश्न से शुरू की कि क्या हमारा नसीब तय होता है ? उन्होंने बताया कि भाग्य/ नसीब नहीं होता दरअसल यह समस्याओं से भागने का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय देश में लोगों की औसत आयु काफी कम, यानी करीब 37- 38 साल थी जो अब बढ़कर लगभग 78 वर्ष तक पहुंच गई। यह शिक्षा, खान पान, रहन सहन एवं चिकित्सा सुविधाओं के कारण संभव हो पाया। यदि भाग्य में लोगों का जन्म मरण तय होता तो व्यक्ति की औसत आयु में यह वृद्धि संभव नहीं होती। इस क्रम में उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर विभिन्न धटनाक्रमों का उल्लेख किया। 


14 दिसंबर, प्रशिक्षण शिविर का पांचवां दिन। उस दिन का विषय था भूत, देवी-देवताओं का शरीर में संचार। सत्र संचालन किया अशोक घाटे, नरेंद्र पाटील ने। उस दिन अपने व्याख्यान में प्रो. श्याम मानव ने कहा कि न तो भाग्य न ही फलित ज्योतिष सच है और न ही भूत-प्रेत का अस्तित्व। उन्होंने कहा कि भविष्य पर विश्वास करने वाला व्यक्ति परावलंबी हो जाता है। यह पलायनवादी मानसिकता को बढ़ावा देता है। इस सिलसिले में उन्होंने विगत करीब दो हजार वर्षों की शूद्रों की गुलामी का उदाहरण दिया। भूत प्रेत के अस्तित्व को एवं आदमी पर देवी देवताओं के संचार को झूठ बताया एवं उसे पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली ऐसी घटनाएं दरअसल मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण होती हैं। अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कथित चमत्कार कहें, माने जाने वाले कुछ प्रयोग करके दिखाए।

15 दिसंबर, प्रशिक्षण शिविर का छठा दिन। उस दिन का विषय था संत चमत्कार, भानामती, मंत्र तंत्र, जादू-टोना।उस दिन के सत्र का संचालन क्षितीज यामीनी , पंकज वंजारे ने किया। छठे दिन के अपने व्याख्यान में प्रो श्याम मानव ने काला जादू, तंत्र मंत्र, टोना टोटका को पूरी तरह गलत एवं भानामती को मानवजनित घटना करार दिया। इस क्रम में उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कई घटनाओं की चर्चा की‌। उन्होंने कहा कि किसी भी मांत्रिक तांत्रिक ने कोई ताकत नहीं होती तथा डर एवं उनका सजेशन स्वीकार करने के कारण व्यक्ति अपने ऊपर उसका प्रभाव महसूस करता है तथा शब्द प्रमाण व बचपन से की गई दिमाग की, की गई कंडिशनिंग के कारण ऐसा होता है। इस सिलसिले में उन्होंने विभिन्न संतों के विचारों एवं कार्यों का उल्लेख किया जिसका लोगों के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने कुछ संतों के विचारों को बेहद सकारात्मक एवं रचनात्मक बताया तथा समाज की बेहतरी के लिए इसे सही करार दिया। उस दिन भी उन्होंने कुछ प्रयोग करके दिखाए।

16 दिसंबर, प्रशिक्षण शिविर का सातवां एवं अंतिम दिन। उस दिन का निर्धारित विषय था – प्रतिभागियों के साथ सवाल जवाब। सत्र संचालन का दायित्व हरिभाऊ पिथोडे, क्षितिज यामिनी श्याम एवं प्रशांत सेपाटे निभाया। अंतिम दिन के सत्र में विभिन्न राज्यों क्षेत्रों से भाग लेने वाले 18 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण शिविर के अपने खट्टे-मीठे अनुभव साझा किए एवं भविष्य के कार्यक्रमों को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने भविष्य में मिलकर अथवा साथ काम करने एवं अंधश्रद्धा अंधविश्वास विरोधी इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया। समापन सत्र को अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्याध्यक्ष – सुरेश जी झुरमुरे, राष्ट्रीय अध्यक्ष – मधुकर काम्बले एवं महासचिव – हरीश देखमुख ने भी संबोधित किया। संगठन के शीर्ष नेताओं ने यह मांग की कि अंधविश्वास विरोधी कानून, महाराष्ट्र की तरह ही पूरे देश में बने। साथ ही कहा कि पूरे देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास एवं विस्तार ही अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का लक्ष्य है तथा इसे हासिल करने के लिए समिति हर संभव प्रयास करती रहेगी। इसी क्रम में उन्होंने संगठन के अगले प्राथमिक कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर की भी घोषणा की।

डी. एन. एस. आनंद,
संपादक, वैज्ञानिक चेतना साइंस वेब पोर्टल जमशेदपुर झारखंड

 

 

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