प्रभावितों को आक्सीजन की किल्लत ने रुलाया
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भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने गंभीर रूप धारण कर लिया है। अचानक इसके प्रभावितों की संख्या में उछाल आ गया। देश भर में तेजी से मरीजों की बढ़ती संख्या ने स्वास्थ्य सेवा एवं प्रशासनिक व्यवस्था को हिला कर रख दिया। अस्पताल में बेड कम पड़ गए। आक्सीजन की कमी ने बड़ी संख्या में कोरोना पीड़ितों को मौत के मुंह में धकेल दिया।इस गहराते संकट पर नजर डाल रहे हैं हरियाणा के विज्ञान शिक्षक एवं विज्ञान संचारक सुनील अरोड़ा। सुनिए उन्हीं की जुबानी ….

आज चौतरफा बात हो रही है प्राणवायु की यानी ऑक्सिजन की। दिल बहुत दुखी है ये देख कर की हमारे अपने लोग अपने भाई बन्धुओं को बचाने के लिए ऑक्सीजन के खाली सिलिंडर लिए घूम रहे है कहीं से ऑक्सीजन मिल जाये। सोशल मीडिया पर लोग अपने नंबर सार्वजनिक कर रहे है कि यहां सम्पर्क करें पर जब फ़ोन करते है तो कोई जवाब नही। इस समय में भी लोगो के साथ भी फ्रॉड हो रहे हैं। आज मैं आपको ऑक्सजन पर कुछ जानकारियां दूंगा गलतियों को नजरअंदाज करते हुए लेख को सूचनार्थ में ले।

अमीरों के लिए उच्च दाब शुद्ध ऑक्सिजन थेरेपी

वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन है 21 प्रतिशत ऑक्सीजन
हम सांस लेते है तब ऑक्सीजन का उपयोग करते है और कार्बोंडिओक्सीड छोड़ते है। पर जब वायु को अंदर ले लर जाते तब नाइट्रोजन भी अंदर जाती है पर नाइट्रोजन हमारे रक्त द्वारा अवशोषित नही की जाती और वैसे ही वापस आ जाती है। हमे हर समय जीवित रहने के लिये ऑक्सिजन की आवश्यकता होती है। वायु में उपस्थित 21 प्रतिशत ऑक्सीजन हमारे रक्त में हेमोग्लोबिन को 95 प्रतिशत तक संतृप्त कर देती है। मैं जब भी कक्षा में जाता था तो ये प्रश्न बच्चों से जरूर पूछता था कि हम ऑक्सीजन क्यों लेते है। बहुत कम बच्चों को पता होता था। ऑक्सिजन हमारे शरीर मे मेटाबोलिज्म का कार्य करता है। जब भी ये बात करता हूँ मुझे मेरी स्टूडेंट रही चार्टेड अककूटंट अनु छाबड़ा की याद आती है जब वो आठवीं में थी तब मैंने उसे समझाते हुए एक बार ये कहा था कि खाना के जलने को मेटाबोलिज्म कहते है और जलने के लिए ऑक्सीजन जरूरी होती है इसलिये हम ऑक्सीजन लेते है। तब उसने मुझसे प्रश्न किया था कि सर फिर तो हमे जला हुआ भोजन ही क्यो नही खा लेते। आज वो पंजाब सरकार में चंडीगढ़ में कार्यरत है। वो CA है।

सिलिंडर में जो वायु होती उसमे 30 प्रतिशत से अधिक ऑक्सीजन का परिमाणं होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब ये ऑक्सीजन किसी को लगाई जाती है तब वो किसी मुश्किल में है उसे सांस लेने में दिक्कत पर हमारी कोशिश ये है कि उसे हेमोग्लोबिन को ऑक्सीजन की संतृप्त कम म हो। जब कि आम आदमी इसे शुद्ध ऑक्सीजन समझ लेता है।

आजकल तो 30 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत ऑक्सिजन युक्त वायु भी सिलिंडर में भरी जाती है। दरअसल बैक्टीरिया व वायरस को ऑक्सीजन से भय लगता है जब हम इतनी सांद्र वायु को शरीर के अंदर लेते है तो ये बैक्टेरिया नष्ट हो जाते है ये ऑक्सीजन हमारे लिये प्रतिजैविक का काम भी करती है। इस वायु को फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन विधि द्वारा प्राप्त किया जाता है। नाइट्रोजन का क्वथनांक 77K है जबकि ऑक्सिजन का क्वथनांक 90K है। टी इस प्रकार हम फ्रैक्शनल आसवन विधि द्वारा एकत्रित करते है। कक्षा +2 की केमिस्ट्री के solution चैप्टर में स्कूबा डाइवर का जिक्र है के क्यों उनके सिलिंडर में ऑक्सीजन का पप्रतिशत अधिक किया गया। आज से 30 साल पहले कितने स्कूबा डाइवर अपनी जान से हाथ दो बैठते थे जब वो जल्दी से वापिस ऊपर की तरफ आते तो नाइट्रोजन गैस दाब कम होने पर बुलबुले बनाती और रक्त में आ जाती वह रक्त प्रवाह को रोक देती जिससे स्कूबा डाइवर की मौत तक हो जाती।

इस उच्च दाब शुद्ध ऑक्सीजन का उपयोग कार्बन मोनोऑक्साइड व साइनाइड जैसी विषैली गैसों से पीड़ित लोगों के उपचार में किया गया। इस गैस का दाब हमारे वायुमंडलीय दाब से 3 से 4 गुना अधिक था। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि माइकल जैक्सन ने एक उच्च दाब शुद्ध ऑक्सीजन का चैम्बर अपने घर पर रखा था। वो उसमे रोज घण्टो इस चैम्बर में बैठते थे वो इसी कारण शो करने के बाद थकावट महसूस तक नही करते थे।

हमारा रक्त एक ऊतक है जो कि विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं का बना हुआ है। लाल रक्त कोशिकाएं, श्वेत रक्त कोशिकाएं, प्लेटलेट्स व प्लाज्मा। जब रक्त के हर अणु में ऑक्सिजन से परिपूर्ण हो जाता है तो ये अधिक प्रभावशाली हो जाती है ये शरीर के विषाणुओं व जीवाणुओं को ऑक्सिकृत करके निष्क्रिय करती है।एक और बात जब प्लाज्मा में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में होती है तो ये पतला तरल पदार्थ शरीर के उस भाग तक जाता है जहाँ RBC व WBC नही पहुंचते ये हमारे शरीर के उन कोशिकाओं को भी जीवित कर देता है जो कि ऑक्सिजन के कमी से निष्क्रिय हो गए थे। शोधकर्ताओं ने ये पाया है कि इस थेरेपी का प्रयोग पुराने से पुराने माइग्रेन, मधुमेह से हुए नासूर, को पैरों पर लगी चोट, कैंसर तक रोगों में प्रभावशाली है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति के एक रिश्तेदार की जान भी इसी थेरेपी से बचे गई थी। और ये थेरेपी गरीबों के लिए नही है। ये तो अमीरों के लिये ही है वही इसका खर्च वहन कर सकते है।

सुनील अरोड़ा।
पीजीटी रसायन विज्ञान
पंचकुला

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