हिमांशु नितनवारे

चूहों से केवल भारतीय परेशान नही हैं, बल्कि पूरी दुनिया इससे त्रस्त है। यह परेशानी तब और बढ़ जाती है जब विज्ञान भी अपने शोधों के दम पर इस बात को सही ठहराता है कि वास्तव में विश्वभर में चूहों की संख्या में तेज गति से बढ़ रही है।

एक शोध से बात निकलकर आई है कि दुनिया भर के प्रमुख शहरों में चूहों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। और इनकी संख्या में बढ़ोतरी का कारण जलवायु परिवर्तन बताया जा रहा हैं। ध्यान रहे कि चूहों को 50 से अधिक जूनोटिक रोगों के संचारित करने के लिए जाना जाता है। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं। यह बात साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित शोध में कहा गया है।

इस नए अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन दुनिया भर के प्रमुख शहरी केंद्रों में चूहों की आबादी को बढ़ाने में अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहा है। शोध में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि कैसे बढ़ते तापमान और शहरीकरण से चूहों की संख्या में तेज वृद्धि को बढ़ावा मिल रहा है।

इस शोध में शामिल 16 में से 11 शहरों में चूहों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। न्यूयार्क और एम्स्टर्डम में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई, जबकि ऑकलैंड, शिकागो, बोस्टन, कैनसस सिटी और सिनसिनाटी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि टोक्यो, लुइसविले और न्यू ऑरलियन्स जैसे कुछ शहरों में चूहों की आबादी में गिरावट देखी गई। विशेष रूप से न्यू ऑरलियन्स में अध्ययन अवधि के दौरान सबसे अधक कमी दर्ज की गई।

शोध में पाया गया कि उच्च तापमान, घनी मानव आबादी, व्यापक शहरीकरण, प्रचुर मात्रा में खाद्य और कम हरियाली वाले शहरों में चूहों की आबादी में वृद्धि होने की अधिक संभावना देखी गई। अध्ययन में चूहों की दो प्रजातियों रैटस नॉर्वेजिकस और रैटस पर ध्यान केंद्रित किया गया जो वैश्विक रूप से फैले हुए हैं।

और ये कृषि उपज और खाद्य आपूर्ति को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार माने होते हैं। अकेले अमेरिका में इन चूहों द्वारा होने वाले नुकसान की कुल अनुमानित लागत सालाना लगभग 27 बिलियन डॉलर आंकी गई है। अध्ययन में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर चूहों की आबादी को नियंत्रित करने के हर साल लगभग 500 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं।

चूहों में 50 से अधिक जूनोटिक रोगाणु इंसानों में फैल सकते हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चिंताएँ पैदा होती हैं। अध्ययन में कहा गया है कि इससे जुड़ी बीमारियों में लेप्टोस्पायरोसिस, हंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम, म्यूरिन टाइफस और ब्यूबोनिक प्लेग आदि शामिल हैं।

शोधकार्य के प्रमुख जोनाथन रिचर्डसन और उनके सहयोगियों ने चूहों की आबादी, तापमान औसत, मानव आबादी की स्थिति के आंकड़े अमेरिकी शहरों की सरकारों एकत्र किए हैं। अध्ययन में पाया गया कि चूहों की आबादी के बदलाव में तापमान की अहम भूमिका होती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि चूहों की संख्या में 40.7 प्रतिशत की तेजी शहर के औसत तापमान में वृद्धि से जुड़ा था।

शोधपत्र में कहा गया है कि अधिकांश छोटे स्तनधारियों की तरह चूहों की गतिविधियां भी ठंडे तापमान से बाधित होती हैं। जब तापमान कम हो जाता है तो चूहों को लंबे समय तक आश्रय में रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए न्यूयॉर्क शहर में चूहों की गमिर्यों के अंत में आबादी चरम पर थी और सदिर्यों के दौरान कम हो गई। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि कम वनस्पति वाले शहरों में चूहों की संख्या में अधिक वृद्धि देखी गई जो भोजन की उपलब्धता और आवास से जुड़ी हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन से निपटने और चूहों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए आक्रामक रणनीतियों को लागू करने के लिए एक सामूहिक वैश्विक प्रयास का आह्वान किया है। उनकी सिफारिशों में कहा गया है कि कचरा और खाद्य अपशिष्ट का प्रबंधन सबसे प्रमुख क्षेत्र हैं। इसके अलावा स्वच्छता को सर्वोत्तम प्राथमिकता बताई गई है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

Spread the information