ललित मौर्या

शोधकर्ताओं ने वैश्विक स्तर पर छतों के कुल क्षेत्र की गणना की है और यह भी पता लगाया कि अगर हर छत पर सोलर पैनल लगे हों तो इससे कितना फायदा होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि यदि सारी दुनिया में मौजूद छतों को सोलर पैनल्स से ढंक दिया जाए तो क्या होगा। इसका वैश्विक तापमान पर क्या असर पड़ेगा? क्या तापमान कम होगा, या बढ़ेगा?

इन्हीं सवालों की खोज में चीनी शोधकर्ताओं ने सिंगापुर और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक नया अध्ययन किया है। इस अध्ययन के  नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन के मुताबिक पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के बजाय सभी छतों को सोलर पैनलों से ढकने से वैश्विक तापमान में 0.13 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आ सकती है। गौरतलब है कि वैश्विक तापमान में होती वृद्धि पहले ही डेढ़ डिग्री सेल्सियस की सीमा रेखा को पार कर चुकी है।

हालांकि पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान में होती वृद्धि को डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस के बीच सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन यदि समय रहते कार्रवाई न की गई तो सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में होती वृद्धि 2.8 डिग्री सेल्सियस से बढ़ जाएगी। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के बेहद खतरनाक प्रभाव सामने आ सकते हैं।

बढ़ता तापमान एक ऐसी समस्या है, जिससे निपटने के लिए आज सारी दुनिया जूझ रही है। विशेषज्ञों की मानें तो सौर ऊर्जा इस दिशा में काफी मददगार साबित हो सकती है। इससे न केवल जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी, साथ ही दुनिया में बढ़ते प्रदूषण में भी कमी आएगी।

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जानकारी दी है कि उन्होंने वैश्विक स्तर पर छतों के कुल क्षेत्र की गणना कैसी की है। उन्होंने यह भी पता लगाया कि अगर हर छत पर सोलर पैनल लगे हों तो कितनी बिजली बनेगी। साथ ही उन्होंने यह भी अध्ययन किया है कि इससे पृथ्वी को किस तरह फायदा होगा।

शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया है कि कैसे कोयला आधारित बिजली की जगह सोलर पैनलों को लगाने से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिल सकती है। ऐसा करके वे उन लोगों के विचारों को चुनौती देना चाहते थे जो मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन को रोकना असंभव है।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दुनिया की हर छत को सोलर पैनलों से ढकने की कल्पना करके उनकी अधिकतम क्षमता का पता लगाया। उन्होंने दुनिया में छतों के कुल क्षेत्रफल और उसके प्रभावों का अनुमान लगाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और भू-स्थानिक आंकड़ों की मदद ली है।

नतीजे दर्शाते है कि दुनिया की छतें करीब 286,393 वर्ग किलोमीटर में फैली हैं। पूर्वी एशिया में इस क्षेत्र का 30 फीसदी हिस्सा है, और उत्तरी अमेरिका में 12 फीसदी। यदि देशों के आधार पर देखें तो चीन में छतों का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है, जो 74,426 वर्ग किलोमीटर है। इसके बाद 30,928 वर्ग किलोमीटर के साथ अमेरिका दूसरे, जबकि 23,087 वर्ग किलोमीटर के साथ भारत तीसरे स्थान पर है।

सौर ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों का अनुमान लगाते समय उन्होंने मौसम, भूमध्य रेखा से दूरी और स्थानीय संपदा जैसी चीजों पर भी विचार किया है। इसकी गणना के लिए शोधकर्ताओं ने दुनिया को समूहों में विभाजित किया और गणना की है कि प्रत्येक समूह में सोलर पैनल कितनी ऊर्जा पैदा कर सकते हैं। उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि यदि प्रत्येक समूह सोलर एनर्जी पर स्विच करता है तो कार्बन उत्सर्जन में कितनी गिरावट आएगी।

इसके बाद उन्होंने वैश्विक तापमान पर कुल प्रभाव का पता लगाने के लिए सभी समूहों से कार्बन कटौती को जोड़ा है। उनकी गणना से पता चला कि 2050 तक ऐसा करने से  वैश्विक तापमान में 0.05 से 0.13 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आएगी।

शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि सभी छतों को सोलर पैनलों से ढंकना नामुमकिन नहीं तो कठिन जरूर है, लेकिन उनके अध्ययन से पता चलता है कि सौर ऊर्जा पर स्विच करने से जलवायु संकट को रोकने में मदद मिल सकती है। यह मुमकिन है क्योंकि जहां चाह होती है, वहीं राह होती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

Spread the information