ललित मौर्या
कहीं लू तो कहीं बाढ़ जैसे चरम मौसम के बीच मार्च 2026 के आंकड़े बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब दुनिया के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। धरती का पारा लगातार चढ़ रहा है, और मार्च 2026 इसका ताजा सबूत है। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल मानवता ने जलवायु इतिहास के चौथे सबसे गर्म मार्च का सामना किया। इस दौरान तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.48 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।

बता दें कि अब तक का सबसे गर्म मार्च 2024 में दर्ज किया गया था। कहीं न कहीं हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता वैश्विक तापमान, पिघलती बर्फ और तेजी से गर्म होते समुद्र…ये संकेत बता रहे हैं कि खतरा अब दूर नहीं, हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। यूरोप की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने अपने ताजा रुझानों में पुष्टि की है कि मार्च 2026 में सतह का वैश्विक औसत तापमान 13.94 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991 से 2020 के बीच दर्ज मार्च के औसत तापमान से 0.53 डिग्री सेल्सियस अधिक है। मतलब की बढ़ता तापमान अब डेढ़ डिग्री सेल्सियस की उस लक्ष्मण रेखा के करीब पहुंच चुका है, जिसे पार करते ही दुनिया गंभीर जलवायु तबाही के दौर में प्रवेश कर सकती है। यह बढ़ोतरी महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलती जलवायु की कहानी है, जो अब हर महाद्वीप पर अपना असर दिखा रही है।

आंकड़ों में दिखता बदलता भविष्य
रिपोर्ट से पता चला है कि इस दौरान यूरोप में हालात और भी गंभीर नजर आए। यूरोप के लिए मार्च 2026 अब तक का दूसरा सबसे गर्म मार्च रहा, जहां तापमान 1991-2020 के औसत तापमान से 2.27 डिग्री अधिक दर्ज किया गया।



