दयानिधि
डब्ल्यूएचओ-यूनिसेफ रिपोर्ट में खुलासा, 2025 में टीकाकरण बढ़ा लेकिन 1.35 करोड़ बच्चों को नहीं मिला कोई भी जीवनरक्षक टीका, करोड़ों बच्चे अब भी सुरक्षा से दूर। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ की नई रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में दुनिया के 90 प्रतिशत शिशुओं को डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खांसी (डीटीपी) की वैक्सीन की कम से कम एक खुराक मिली। यह संख्या करीब 11.6 करोड़ बच्चों के बराबर है। वहीं, 85 प्रतिशत यानी लगभग 11 करोड़ बच्चों ने इस वैक्सीन की तीनों खुराक पूरी कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में टीकाकरण दर में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन दुनिया अभी भी 2019 के स्तर से एक प्रतिशत पीछे है। पिछले कई वर्षों से वैश्विक टीकाकरण दर लगभग एक ही स्तर पर बनी हुई है। इससे पता चलता है कि बच्चों तक टीके पहुंचाने की कोशिशों के बावजूद गति धीमी है।

1.35 करोड़ बच्चों को एक भी टीका नहीं मिला
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 में लगभग 1.35 करोड़ बच्चे ऐसे रहे, जिन्हें अपने जीवन के पहले साल में कोई भी टीका नहीं मिला। हालांकि यह संख्या पिछले साल की तुलना में करीब 7.5 लाख कम है, लेकिन अभी भी यह बड़ी चिंता का विषय है। इन बच्चों में ज्यादातर वे हैं जो युद्ध, गरीबी, विस्थापन और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं वाले देशों में रहते हैं। कई बच्चे टीकाकरण अभियान की शुरुआत तो करते हैं, लेकिन बाद की खुराक पूरी नहीं कर पाते।

खसरे से बचाव में बड़ी चुनौती
टीकाकरण कार्यक्रम में सबसे बड़ी चिंता खसरे को लेकर बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 73 लाख बच्चों ने डीटीपी वैक्सीन की पहली खुराक तो ली, लेकिन खसरे की पहली वैक्सीन तक पहुंचने से पहले ही टीकाकरण कार्यक्रम से बाहर हो गए।

संघर्ष और गरीबी वाले देशों में सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के आधे से ज्यादा ऐसे बच्चे, जिन्हें कोई टीका नहीं मिला, वे संघर्ष प्रभावित और कमजोर देशों में रहते हैं। इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण टीकाकरण अभियान प्रभावित होते हैं। उदाहरण के तौर पर, सीरिया में एक साल के दौरान डीटीपी वैक्सीन की पहली खुराक लेने वाले बच्चों की संख्या में छह प्रतिशत की कमी आई। वहीं, सूडान ने संघर्ष के बावजूद टीकाकरण में बड़ी सफलता हासिल की। वहां डीटीपी की पहली खुराक की कवरेज में 35 प्रतिशत और खसरे की पहली खुराक में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। यह दिखाता है कि मुश्किल हालात में भी मजबूत स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर पहुंच से बच्चों को बचाया जा सकता है। दुनिया में केवल 84 प्रतिशत बच्चों को खसरे की पहली खुराक और 77 प्रतिशत बच्चों को दूसरी खुराक मिल पाई। विशेषज्ञों के अनुसार, खसरे जैसी बेहद संक्रामक बीमारी को रोकने के लिए 95 प्रतिशत टीकाकरण जरूरी है। कम टीकाकरण के कारण 2025 में 57 देशों में खसरे के बड़े या गंभीर प्रकोप सामने आए।

अमीर देशों में भी घट रहा भरोसा
रिपोर्ट के अनुसार, केवल गरीब या संघर्ष प्रभावित देश ही चुनौती का सामना नहीं कर रहे हैं। कई मध्यम और उच्च आय वाले देशों में भी टीकाकरण दर में गिरावट देखी जा रही है। इन देशों में वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद लोगों में बढ़ती हिचकिचाहट, बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएं और स्वास्थ्य व्यवस्था की समस्याएं टीकाकरण को प्रभावित कर रही हैं। दक्षिण अफ्रीका में 2019 के बाद डीटीपी की पहली खुराक की कवरेज में 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। बोस्निया और हर्जेगोविना में भी खसरे की वैक्सीन कवरेज में पिछले साल बड़ी कमी दर्ज की गई।

25 वर्षों में बड़ी उपलब्धियां, लेकिन आगे की राह कठिन
डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में सरकारों, स्वास्थ्यकर्मियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रयासों से टीकाकरण में काफी सुधार हुआ है। इस दौरान ऐसे बच्चों की संख्या में 40 प्रतिशत की कमी आई है, जिन्हें कोई भी टीका नहीं मिला। कम आय वाले देशों में वैक्सीन कार्यक्रमों को समर्थन देने वाली संस्था गावी के सहयोग से बच्चों को पहले से अधिक बीमारियों से सुरक्षा मिल रही है। लेकिन आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहायता में कमी, आर्थिक दबाव और कमजोर होती स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था बड़ी चुनौती बन सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों तक टीके पहुंचाने के लिए मजबूत आंकड़ों और निगरानी व्यवस्था की जरूरत है।

हर बच्चे तक टीका पहुंचाने की अपील
डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ ने सरकारों और सहयोगी संस्थाओं से अपील की है कि वे संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में टीकाकरण सेवाओं को मजबूत करें, टीकों को लेकर गलत जानकारी का मुकाबला करें और स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराएं। विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण बच्चों को जानलेवा बीमारियों से बचाने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका है। दुनिया के हर बच्चे तक वैक्सीन पहुंचाना केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि बच्चों के सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
