ललित मौर्या

इस तकनीक में बैक्टीरिया पानी में मौजूद सल्फेट को सल्फाइड में बदल देते हैं। इसके बाद यह सल्फाइड पानी में घुले लेड से रिएक्शन करके ‘लेड सल्फाइड’ बना देता है, जिसे आसानी से छानकर अलग किया जा सकता है। एक ऐसा अदृश्य जहर, जो बच्चों की बुद्धि, याददाश्त और भविष्य तक को प्रभावित कर सकता है, हर दिन उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पानी के साथ पर्यावरण में पहुंच रहा है। यह जहर है सीसा (लेड), जिससे निपटने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता हाथ लगी है। आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक नई इको-फ्रेंडली जैविक तकनीक विकसित की है, जो उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल से जहरीले सीसे को प्रभावी ढंग से अलग कर सकती है। खास बात यह है कि इस काम के लिए किसी हानिकारक केमिकल का नहीं, बल्कि कुदरती बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया है।

क्यों खतरनाक है लेड प्रदूषण?

गौरतलब है कि बैटरी रीसाइक्लिंग, माइनिंग (खनन) और धातु पिघलाने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाला तेजाबी पानी (एसिडिक वेस्टवॉटर) सीसे यानी लेड प्रदूषण का सबसे बड़ा जरिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक यह जहरीली धातु न केवल पर्यावरण को दूषित करती है, बल्कि बच्चों के मानसिक विकास, तंत्रिका तंत्र पर भी असर डालती है। साथ ही इसकी वजह से कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। यह समस्या कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीसे से होने वाला प्रदूषण हर साल तकरीबन 55.5 लाख जिंदगियों को निगल रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इससे दुनिया भर में 80 करोड़ से ज्यादा बच्चे प्रभावित हैं, जिनमें से 27.5 करोड़ भारतीय हैं। वहीं यूनिसेफ के मुताबिक दुनिया में हर तीन में से एक बच्चे के रक्त में लेड (सीसे) की मात्रा पांच माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर से ज्यादा है, जोकि उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। गौरतलब है कि अब तक फैक्ट्रियों से निकलने वाले इस जहरीले पानी को साफ करने के लिए मुख्य रूप से रासायनिक तरीकों की मदद ली जाती है। इसमें दो बड़ी मुश्किलें आती हैं, पहला इसमें बहुत ज्यादा वक्त लगता है। और दूसरा सफाई के बाद भारी मात्रा में सीसा युक्त जहरीला स्लज बच जाता है, जिसे ठिकाने लगाना अपने आप में एक बड़ी सिरदर्दी है। लेकिन इस नई जैविक तकनीक में न केवल सीसे को प्रभावी ढंग से हटाया दिया, बल्कि साथ ही पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी कम मात्रा में स्लज भी बना।

कैसे काम करती है आईआईटी की यह नई ‘बायो-तकनीक’?

इन चुनौतियों से निपटने के लिए आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रणब कुमार घोष और उनके रिसर्च स्कॉलर श्रीकांत यादव गोल्ला ने किसी रासायनिक प्रक्रिया की बजाय प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ‘सल्फेट-रिड्यूसिंग बैक्टीरिया’ (बिना ऑक्सीजन के पनपने वाले जीवाणु) की मदद ली है। ये सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन रहित वातावरण में पनपते हैं और दूषित जल में मौजूद सल्फेट को सल्फाइड में बदल देते हैं। इसके बाद यही सल्फाइड पानी में घुले सीसे के साथ प्रतिक्रिया कर ‘लेड सल्फाइड’ नामक ठोस खनिज बना देता है, जिसे आसानी से छानकर अलग किया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दूषित जल की अम्लीयता भी कम हो जाती है, जिससे बैक्टीरिया बेहतर तरीके से काम कर पाते हैं।

कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहे बैक्टीरिया

शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अत्यधिक अम्लीय और भारी धातुओं से भरे अपशिष्ट जल में बैक्टीरिया जीवित कैसे रहें। इसके लिए वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया को धीरे-धीरे अधिक अम्लीय और विषैले वातावरण का अभ्यस्त बनाया। इस रणनीति की मदद से बैक्टीरिया लगातार सक्रिय रहे और सीसे को स्थिर ठोस रूप में बदलते रहे। शोधकर्ताओं ने उपचार के बाद बने जैविक स्लज की भी जांच की। अध्ययन में पाया गया कि इसमें मौजूद अधिकांश लेड ऐसे स्थिर रूप में था, जो आसानी से घुलता या फैलता नहीं है। इसके अलावा, लीचिंग परीक्षणों से यह भी पता चला कि स्लज से निकलने वाले सीसे की मात्रा नियामक मानकों से काफी कम थी। इसका मतलब है कि इस जैविक स्लज का सुरक्षित तरीके से कचरा डंपिंग ग्राउंड में निपटान किया जा सकता है, जिससे भविष्य में पर्यावरण प्रदूषण का खतरा भी कम होगा।

भविष्य की राह

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक केवल बैटरी रीसाइक्लिंग उद्योग तक सीमित नहीं रहेगी। इसका उपयोग खनन, स्मेल्टिंग और मेटल इंडस्ट्रीज से निकलने वाले अम्लीय अपशिष्ट जल के उपचार में भी किया जा सकता है। आगे की योजना के तहत शोधकर्ता इस तकनीक को और किफायती बनाने के लिए कम लागत वाले कार्बन स्रोतों के उपयोग, ट्रीटेड वाटर में सल्फाइड की मात्रा घटाने और सीसे जैसी धातुओं दो दोबारा प्राप्त करने (मेटल रिकवरी) की संभावनाओं पर काम करेंगे। हालांकि, साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। इसे पूरी तरह व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने से पहले अभी और जांच एवं मंजूरियों की जरूरत होगी। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल केमिकल इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुए हैं।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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