ललित मौर्या

यह नैनो-कैटालिस्ट प्रकाश की ऊर्जा का इस्तेमाल करके रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेजी से पूरा करता है। कल्पना कीजिए, दवाइयों और औद्योगिक रसायनों को बनाने के लिए अब जहरीले रसायनों, भारी गर्मी और ऊर्जा की बर्बादी की जरूरत न पड़े। भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी ही एक नई तकनीक विकसित की है, जो सिर्फ रोशनी की मदद से रासायनिक प्रक्रियाओं को तेज और आसान बना सकती है। पंजाब के मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों ने एक बेहद खास ‘लाइट-पावर्ड नैनो-कैटालिस्ट’ यानी रोशनी से चलने वाला उत्प्रेरक तैयार किया है।

क्या है यह नया ‘ग्रीन’ नैनो-कैटेलिस्ट?

यह नैनो-कैटालिस्ट प्रकाश की ऊर्जा का इस्तेमाल करके रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेजी से पूरा करता है। साथ ही पारंपरिक कैटेलिस्ट की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से काम करता है। डॉक्टर प्रकाश पी नीलकंदन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने इस नैनो-कॉम्पोजिट को सोना, पैलेडियम और प्रकाश को सोखने वाले एक खास अणु ‘बीओडीपीआई’ को मिलाकर बनाया है। यह तीनों मिलकर ऐसा तंत्र तैयार करते हैं, जो सामान्य कैटेलिस्ट की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल है। प्रतिष्ठित जर्नल नैनोस्केल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक यह किसी रिले-रेस की तरह काम करता है। इसमें सबसे पहले सोने के नैनोकण रोशनी की ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। इसके बाद यह ऊर्जा ‘बीओडीपीआई’ अणु तक पहुंचती है और अंत में पैलेडियम तक ट्रांसफर हो जाती है, जो मुख्य कैटेलिस्ट के रूप में काम करता है।

कैसे काम करता है यह ‘सुपर मैटेरियल’?

पैलेडियम इसी ऊर्जा का इस्तेमाल करके रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेजी और दक्षता से पूरा करता है। इससे पूरी प्रक्रिया न केवल तेज हो जाती है, बल्कि इसमें कम ऊर्जा की भी जरूरत पड़ती है। सरल शब्दों में कहें तो जो काम पहले जानलेवा केमिकल्स और भारी मशीनों की गर्मी से होता था, वह काम अब यह नैनो-मैटेरियल सूरज या कृत्रिम रोशनी की ऊर्जा को समेटकर बेहद तेजी से कर सकता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जहरीले सॉल्वेंट और अत्यधिक तापमान की जरूरत कम हो जाती है। यानी अब कई रासायनिक प्रक्रियाएं हानिकारक सॉल्वेंट की जगह पानी जैसे सुरक्षित माध्यम में कम तापमान पर भी हो सकेंगी। इससे प्रदूषण घटेगा और ऊर्जा की बचत होगी। वैज्ञानिकों के मुताबिक सोने, ‘बीओडीपीआई’ और पैलेडियम को एक ही प्रणाली में जोड़ने से इन तीनों की संयुक्त क्षमता बढ़ जाती है। साथ मिलकर काम करने पर यह प्रणाली किसी एक घटक की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी साबित होती है, जिससे अधिक शक्तिशाली और बेहतर कैटेलिटिक प्रक्रिया विकसित की जा सकती है।

दवा उद्योग के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है यह खोज

देखा जाए तो दुनियाभर में उद्योगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रदूषण कम करने और ऊर्जा बचाने की है। ऐसे में यह नई खोज दवाइयों और रसायनों के उत्पादन को अधिक सस्ता, तेज और पर्यावरण के लिए सुरक्षित बना सकती है। इस तकनीक को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉक्टरों प्रकाश पी नीलकंदन का मानना है कि भविष्य में यह खोज ‘ग्रीन’ औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा दे सकती है और लोगों तक सस्ते एवं पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद पहुंचाने में मददगार साबित होगी।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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