दयानिधि

4डी विश्लेषण से दिल की बीमारियों की पहले पहचान, एआई ने छह नए जोखिम समूह खोजे, गंभीर बीमारियों का सटीक पूर्वानुमान लगाना हुआ संभव।इंपीरियल कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने दिल की जांच के क्षेत्र में एक नई और बेहद उन्नत तकनीक विकसित की है। इस शोध में बताया गया है कि दिल के बाएं हिस्से यानी लेफ्ट वेंट्रिकल की 4-डायमेंशनल (4डी) गति का विश्लेषण करके हृदय रोगों के खतरों को पहले ही पहचाना जा सकता है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य डेटाबेस में से एक यूके बायोबैंक के लगभग 20,000 लोगों के दिल के स्कैन पर आधारित है।

4डी तकनीक क्या है और यह क्यों खास है?

अब तक डॉक्टर दिल की जांच में मुख्य रूप से कुछ सामान्य माप जैसे दिल का आकार, खून पंप करने की क्षमता या इजेक्शन फ्रैक्शन देखते थे। लेकिन यह तरीका कई बार शुरुआती बीमारी को पकड़ नहीं पाता। नई 4डी तकनीक में दिल की 3डी संरचना को समय के साथ बदलते हुए देखा जाता है। यानी दिल कैसे धड़कता है, कैसे फैलता और सिकुड़ता है, यह पूरा “चलता-फिरता मॉडल” बनाया जाता है। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और कंप्यूटर विजन की मदद से इस पूरे डेटा को “4डी पॉइंट क्लाउड मॉडल” में बदला, जिससे दिल की हर हलचल को बेहद बारीकी से समझा जा सका।

एआई ने खोजे दिल की गति के छह अलग पैटर्न

शोध में एआई ने दिल की गति के आधार पर लोगों को छह अलग-अलग समूहों में बांटा, जिन्हें “फेनोग्रुप” कहा गया। ये समूह दिल की सेहत और भविष्य में बीमारी के खतरे को दर्शाते हैं। पहले दो समूह (पीजी1 और पीजी2) सबसे स्वस्थ पाए गए। इन लोगों में मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा कम था। यानी इनके दिल की गति सामान्य और संतुलित थी। तीसरे समूह (पीजी3) में कोई खास खतरा या स्पष्ट बीमारी का संकेत नहीं मिला। चौथे समूह (पीजी4) में उन लोगों को पाया गया जिनमें मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा ज्यादा था, जैसे डायबिटिक हार्ट डिजीज। इसमें दिल की गति में कुछ असामान्य पैटर्न देखे गए। पांचवें और छठे समूह (पीजी5 और पीजी6) सबसे अधिक जोखिम वाले पाए गए। इन लोगों में दिल की बीमारियाँ ज्यादा थीं और भविष्य में गंभीर हृदय घटनाओं का खतरा भी अधिक देखा गया। पीजी5 समूह में हाई ब्लड प्रेशर और दिल का फैलना (डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी) अधिक पाया गया। पीजी6 समूह सबसे गंभीर था, जिसमें हार्ट अटैक और अचानक कार्डियक अरेस्ट जैसी घटनाओं का जोखिम अधिक देखा गया। 

आनुवंशिक जोखिम और बीमारी का संबंध

इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन लोगों की दिल की गति असामान्य थी, उनमें जेनेटिक यानी अनुवांशिक जोखिम भी अधिक था। इसका मतलब है कि शरीर की बनावट और जीन भी दिल की इन गति पैटर्न को प्रभावित करते हैं।

यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बीमारी को बहुत शुरुआती स्तर पर पकड़ सकती है। अभी तक कई मरीजों में तब तक बीमारी पता नहीं चलती जब तक गंभीर लक्षण न आ जाएं। 4डी विश्लेषण से डॉक्टर यह समझ सकते हैं कि किसी व्यक्ति का दिल भविष्य में किस तरह की बीमारी का शिकार हो सकता है। इससे इलाज समय पर शुरू किया जा सकता है और जान बचाई जा सकती है।

इस तकनीक की सीमाएं

हालांकि यह शोध बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें कुछ सीमाएँ भी हैं। यह अध्ययन केवल दिल के बाएं हिस्से पर किया गया है, पूरे दिल पर नहीं। इसके अलावा इसमें शामिल अधिकतर लोग यूरोपीय मूल के थे, इसलिए यह जरूरी नहीं कि यह सभी देशों और जातियों पर समान रूप से लागू हो।

भविष्य की उम्मीद

यदि आगे के शोध में यह तकनीक सफल साबित होती है, तो दिल की बीमारियों की जांच और इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। यह व्यक्तिगत (पर्सनलाइज्ड) इलाज की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है, जहां हर व्यक्ति के दिल की गति के अनुसार उसका जोखिम और उपचार तय किया जाएगा। यह खोज भविष्य में दिल की बीमारियों को पहले से पहचानने और रोकने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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