ललित मौर्या

रिसर्च से पता चला है हवा में मौजूद जहरीले कण (पीएम2.5) रूमेटाइड अर्थराइटिस के दर्द और सूजन को बढ़ा सकते हैं। खराब हवा में 2 सप्ताह या उससे अधिक समय बिताने पर बीमारी के बिगड़ने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। क्या आप जानते हैं कि हम जिस हवा में हम सांस लेते हैं, वह सिर्फ फेफड़ों को ही प्रभावित नहीं करती। उसमें घुले प्रदूषण के बेहद महीन कण शरीर के भीतर जाकर जोड़ों के दर्द और सूजन को बढ़ा सकते हैं। इस बारे में दक्षिण कोरिया में हुए एक व्यापक अध्ययन में सामने आया है कि वायु प्रदूषण, खासकर हवा में मौजूद जहरीले कणों (पीएम2.5) के लंबे समय तक संपर्क में रहने से रूमेटाइड आर्थराइटिस यानी गठिया की बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। साथ ही इसकी वजह से मरीजों में अचानक से असहनीय दर्द, सूजन और बीमारी के अन्य लक्षण तेजी से भड़क सकते हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल एनल्स ऑफ द रूमेटिक डिजीज में प्रकाशित हुए हैं।

प्रदूषण से बढ़ सकती है शरीर में सूजन

गौरतलब है कि रूमेटाइड आर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे जोड़ों में सूजन, दर्द और धीरे-धीरे नुकसान हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक इसका असर केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। अध्ययन में साझा रुझानों पर नजर डालें तो दुनिया में करीब 0.5 से एक फीसदी वयस्क आबादी इस बीमारी से जूझ रही है। इसके पीछे आनुवंशिक कारणों के साथ-साथ प्रतिरक्षा तंत्र में बदलाव और पर्यावरण से जुड़े कारक भी जिम्मेदार हैं। धूम्रपान को रूमेटाइड आर्थराइटिस का एक प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है। वहीं, तापमान और नमी में बदलाव के साथ कुछ औद्योगिक प्रदूषकों के संपर्क का भी इस बीमारी से संबंध सामने आया है। वहीं अब इस नई स्टडी ने संकेत दिया है कि हवा में मौजूद महीन कण भी इस बीमारी को भड़का सकते हैं।

आज की खराब हवा, कई दिन बाद बढ़ा सकती है दर्द

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चार वर्षों तक रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित 1,070 मरीजों पर नजर रखी। 2021 से 2024 के बीच इन मरीजों की 12,583 बार ओपीडी विजिट के दौरान बीमारी की स्थिति दर्ज की गई। इस दौरान शोधकर्ताओं ने मरीजों के संपर्क में आने वाले छह प्रमुख वायु प्रदूषकों के स्तर का विश्लेषण किया। इनमें सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ₂), ओजोन (ओ₃), कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ), पीएम10 और पीएम2.5 शामिल थे। इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रदूषण के स्तर और मरीजों में बीमारी के बढ़ने या अचानक से लक्षण तेज होने के मामलों की तुलना की। इस दौरान मरीजों की उम्र, लिंग, दवाओं, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, बीमारी से जुड़े एंटीबॉडी और मौसम जैसे कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा गया। अध्ययन में पीएम2.5 और रूमेटाइड आर्थराइटिस के बढ़ने के बीच सबसे मजबूत संबंध देखा गया। खासतौर पर, दो सप्ताह से ज्यादा समय तक पीएम2.5 के बढ़ते स्तर के संपर्क में रहने वाले मरीजों में बीमारी के सक्रिय होने का जोखिम अधिक पाया गया।

फेफड़ों से रक्त तक, फिर शरीर में पहुंचते हैं महीन कण

बता दें कि पीएम2.5, प्रदूषण के बेहद महीन कण होते हैं, जो लाल रक्त कोशिका से भी छोटे होते हैं। ये महीन कण सांस के रास्ते फेफड़ों में उतरते हैं और वहां से सीधे रक्त प्रवाह में शामिल हो जाते हैं। इसके बाद ये कण रक्त के जरिए शरीर के अलग-अलग हिस्सों और जोड़ों तक पहुंच जाते हैं। वहां पहुंचकर ये कण शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा करने वाली प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकते हैं। यही प्रक्रियाएं रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसे ऑटोइम्यून रोगों में दर्द और सूजन को और भड़का सकती है। ये कण शरीर में हानिकारक अणुओं (रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज) का निर्माण करते हैं, जिससे कोशिकाओं पर तनाव बढ़ जाता है। अध्ययन में देखा गया कि, पीएम2.5 का स्तर बढ़ने के साथ रूमेटाइड आर्थराइटिस के सक्रिय होने का खतरा भी बढ़ा। वहीं, पीएम10 और अन्य प्रदूषकों के मामले में ऐसा कोई स्पष्ट संबंध नहीं पाया गया। अध्ययन में एक और अहम बात यह सामने आई कि प्रदूषण का असर हमेशा उसी समय दिखाई नहीं देता। इसके प्रभाव में कुछ दिनों का अंतर हो सकता है। विश्लेषण से पता चला कि प्रदूषण का स्तर बढ़ने के करीब 12 से 20 दिन बाद रूमेटाइड आर्थराइटिस के फ्लेयर यानी बीमारी के लक्षण अचानक बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है। यानी जिस दिन हवा खराब थी, जरूरी नहीं कि उसी दिन दर्द और सूजन बढ़े। प्रदूषण का असर शरीर में धीरे-धीरे जमा होकर कुछ दिनों बाद बीमारी को भड़का सकता है।

गठिया के मरीजों के लिए क्यों जरूरी है साफ हवा?

सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर यून बोंग ली के मुताबकि ये निष्कर्ष सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि उनके मुताबिक यह जानने के लिए और अध्ययन जरूरी हैं कि हवा की गुणवत्ता सुधारने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की सक्रियता वास्तव में कम होती है या नहीं, लेकिन मरीजों को लंबे समय तक खराब हवा, खासकर पीएम2.5 के ऊंचे स्तर, के संपर्क से बचने की सलाह दी जा सकती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़े जेफ्री ए स्पार्क्स ने अध्ययन के साथ प्रकाशित संपादकीय में कहा कि वायु प्रदूषण के बढ़ते दौर में इस अध्ययन के नतीजे बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनके अनुसार, हवा के साथ शरीर में पहुंचने वाले प्रदूषण के कण केवल रूमेटाइड आर्थराइटिस को ही प्रभावित नहीं कर सकते, बल्कि अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों के खतरे और उनके बढ़ने की प्रक्रिया पर भी असर डाल सकते हैं।

हर मरीज के लिए एक जैसी नहीं तस्वीर

विशेषज्ञों ने सावधानी बरतते हुए कहा है कि यह अध्ययन दक्षिण कोरिया की आबादी पर किया गया है। वहां की आनुवंशिक बनावट, पर्यावरण और जीवनशैली दूसरे देशों से अलग हो सकती है। इसलिए यह समझने के लिए कि प्रदूषण का रूमेटाइड आर्थराइटिस पर कितना असर पड़ता है, दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसे अध्ययन जरूरी हैं। हालांकि फिर भी यह शोध हमें एक अहम सवाल पर सोचने को मजबूर करता है, क्या रूमेटाइड आर्थराइटिस से लड़ाई सिर्फ दवाओं तक सीमित रह सकती है, या मरीज जिस हवा में हर दिन सांस ले रहा है, उसे साफ रखना भी उतना ही जरूरी है? स्पष्ट है कि साफ हवा अब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा प्रश्न नहीं, बल्कि सेहत का भी सवाल है। अध्ययन दर्शाता है कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसका सीधा असर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली और ऑटोइम्यून बीमारियों पर पड़ सकता है। ऐसे में रूमेटाइड आर्थराइटिस से जूझ रहे लोगों के लिए हर सांस के साथ शरीर में पहुंचने वाला प्रदूषण बीमारी के दर्द और सूजन को और बढ़ा सकता है। इसलिए इलाज सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं रह सकता। बीमारी को नियंत्रित रखने की कोशिश में साफ हवा भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि जिस हवा में हम रोज सांस लेते हैं, वही हमारे शरीर के भीतर चल रही सूजन को कम या ज्यादा कर सकती है। भारत में वायु गुणवत्ता की ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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