ललित मौर्या
कुल 88.2 लाख लोगों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि रोज 100 ग्राम अतिरिक्त सेवन हृदय संबंधी घटनाओं के 14 फीसदी अधिक जोखिम से जुड़ा है। चाय के साथ चिप्स, नमकीन का पैकेट, जल्दबाजी में खाई जाने वाली इंसटेंट नूडल्स या दिनभर की थकान के बाद मिलने वाला पहले से तैयार डिब्बा बंद खाना—हमें लगता है कि यह हमारी भागदौड़ भरी जिंदगी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यही छोटी-छोटी आदतें धीरे-धीरे आपके दिल और सेहत पर भारी पड़ रही हैं? देखा जाए तो चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक, इंस्टेंट नूडल्स और रेडी-टू-ईट जैसे फूड आज रोजमर्रा की जिंदगी का आसान विकल्प बन चुके हैं, लेकिन एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि आप जितना अधिक जंक या अल्ट्रा-प्रोसैसड फूड खाते हैं, गंभीर बीमारियों का खतरा उतना ही ज्यादा बढ़ जाता है। मतलब कि जरूरत से ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसैसड फूड यानी अत्यधिक प्रोसेस और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का सेवन धीरे-धीरे हमारे शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है। अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अमरीका, यूरोप, एशिया और ओशिनिया के करीब 88.2 लाख लोगों पर किए 51 बड़े शोधों का व्यापक विश्लेषण किया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित बीएमजे जर्नल ‘फैमिली मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ’ में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में इन सभी लोगों के स्वास्थ्य और खान-पान के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इन सभी लोगों की औसत आयु अलग-अलग अध्ययनों में 23 से 77 वर्ष के बीच थी और उनके स्वास्थ्य पर 2 से 32 वर्षों तक नजर रखी गई।

हर 100 ग्राम अतिरिक्त पैकेटबंद खाना बढ़ा रहा है खतरा
शोधकर्ताओं ने पाया है कि यदि कोई व्यक्ति रोजाना अपनी डाइट में केवल 100 ग्राम अल्ट्रा-प्रोसैसड फूड की मात्रा बढ़ा देता है, तो उसके शरीर पर इसके गंभीर परिणाम दिख सकते हैं। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि इसके चलते दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं जैसे दिल का दौरा या स्ट्रोक आदि का खतरा 14 फीसदी तक बढ़ सकता है। इतना ही नहीं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की इस मात्रा के सेवन से हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप का खतरा 11 फीसदी, जबकि कैंसर होने की आशंका 4 फीसदी बढ़ जाती है। वहीं मेटाबॉलिक सिंड्रोम या डायबिटीज का जोखिम भी दो फीसदी अधिक पाया गया। चिंता की बात है कि यह मात्रा असमय मृत्यु के जोखिम को 3 फीसदी बढ़ा देती है।

100 ग्राम अतिरिक्त सेवन का क्या मतलब है?
शोध में हर दिन अतिरिक्त 100 ग्राम अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को अलग से देखा गया। यह कोई तय ‘सुरक्षित सीमा’ नहीं है, बल्कि अध्ययन में इस्तेमाल की गई मात्रा है जिसके आधार पर जोखिम में बदलाव का आकलन किया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसका यह अर्थ नहीं कि 100 ग्राम खाना किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से बीमार कर देगा। अध्ययन ने सेवन की मात्रा और बीमारी के जोखिम के बीच सांख्यिकीय संबंध पाया है। यह सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ही इन बीमारियों का कारण है।

ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, स्वास्थ्य पर ज्यादा जोखिम
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कम सेवन की तुलना में अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वालों में कई स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम अधिक था। रिसर्च से पता चला है कि यदि कुल कैलोरी या वजन के हिसाब से ऐसे खाने का सेवन 10 फीसदी भी बढ़ जाए, तो डायबिटीज और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा सीधे 16 फीसदी तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि सेवन बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता गया। यानी यह केवल इस बात तक सीमित नहीं था कि कोई व्यक्ति अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाता है या नहीं, बल्कि जितनी अधिक मात्रा में इसका सेवन किया गया, उतने अधिक स्वास्थ्य जोखिम से उसका संबंध पाया गया।

आखिर क्या है अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ऐसे खाद्य पदार्थ होते हैं जिन्हें घर में सामान्य तरीके से पकाने या संरक्षित करने से कहीं आगे जाकर औद्योगिक स्तर पर कई प्रक्रियाओं से तैयार किया जाता है। इनमें अक्सर स्वाद, रंग, बनावट और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कई तरह के एडिटिव्स और अन्य औद्योगिक सामग्री मिलाई जाती हैं। आसान भाषा में कहें तो ऐसा खाना जो अपने मूल खाद्य रूप से काफी बदल चुका हो और जिसे बनाने में कई औद्योगिक प्रक्रियाओं और सामग्री का इस्तेमाल हुआ हो, उसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कहा जाता है। इसमें आम तौर पर पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, मीठे या फ्लेवर्ड पेय, डिब्बा बंद मिठाइयां, प्रोसेस्ड मीट और तैयार-टू-ईट या रेडी-टू-हीट खाद्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं। हालांकि, हर प्रोसेस्ड फूड अल्ट्रा-प्रोसेस्ड नहीं होता। भोजन को केवल इसलिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड नहीं माना जा सकता क्योंकि वह किसी तरह की प्रक्रिया से गुजरा है। किसी खाद्य पदार्थ का वर्गीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस तरह और किस स्तर तक प्रोसेस किया गया है।

शरीर पर कैसे पड़ सकता है असर?
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और बीमारियों के बीच संबंध के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों में अक्सर चीनी, नमक और ज्यादा कैलोरी, जबकि फाइबर कम होता है। लंबे समय तक इनका अधिक सेवन वजन बढ़ने, ब्लड शुगर बिगड़ने और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। इसके अलावा, इनमें इस्तेमाल होने वाले कुछ एडिटिव्स और औद्योगिक प्रसंस्करण के दौरान बनने वाले यौगिक भी शरीर को प्रभावित कर सकते हैं। अलग-अलग एडिटिव्स के एक साथ शरीर में पहुंचने से संभावित ‘कॉकटेल इफेक्ट’ की आशंका भी जताई गई है। प्रयोगशाला के कुछ अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आंत के माइक्रोबायोम, शरीर में सूजन और इंसुलिन के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इन प्रभावों के पीछे की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। देखा जाए तो आज की तेज रफ्तार जिंदगी में खाना बनाने के लिए समय निकालना कई लोगों के लिए मुश्किल है। ऐसे में इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय और रेडी-टू-ईट भोजन भूख मिटाने का आसान रास्ता बन जाते हैं। हालांकि समस्या तब पैदा हो सकती है जब सुविधा धीरे-धीरे नियमित भोजन की जगह लेने लगे। पैकेज से सीधे निकलने वाला भोजन पेट तो भर सकता है, लेकिन अगर वह फल, सब्जियों, दालों, साबुत अनाज, मेवों और दूसरे कम-प्रोसेस खाद्य पदार्थों की जगह ले रहा है, तो पूरी डाइट की पोषण गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

क्या हर पैकेट वाला खाना छोड़ना जरूरी है?
स्पष्ट कर दें कि अध्ययन ऐसा कोई सीधा निष्कर्ष नहीं देता कि हर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड समान रूप से नुकसानदायक है या किसी व्यक्ति को सभी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ पूरी तरह छोड़ देने चाहिए। शोधकर्ताओं ने इसके बजाय अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करने और उसकी जगह कम-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को शामिल करने को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बताया है। वहीं फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज, मेवे और अपेक्षाकृत कम-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ भोजन में शामिल करना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। इसी तरह रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे बदलाव, जैसे मीठे पेय की जगह पानी या बिना चीनी वाला पेय लेना, पैकेज्ड स्नैक की जगह फल या मेवे चुनना, यह सभी रोजमर्रा के भोजन में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की मात्रा कम करने में मदद कर सकते हैं।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
