दयानिधि
भारत की 25 से 60 साल की महिलाओं पर एक अध्ययन किया गया, जो कम से कम एक साल से टाइप-टू डायबिटीज से पीड़ित थी और वे मुंह से ली जाने वाली डायबिटीज की दवाएं ले रही थीं। भारत में टाइप-टू डायबिटीज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। अब एक भारतीय अध्ययन में सामने आया है कि दूध से बने खाद्य पदार्थों वाले शाकाहारी भोजन के साथ रोजाना 14 घंटे का टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग यानी समय-सीमित भोजन करने से टाइप-टू डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। यह अध्ययन ‘नुट्रिशन एंड डायबिटीज’ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भारतीय खान-पान और महिलाओं की रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए यह तरीका डायबिटीज प्रबंधन में उपयोगी हो सकता है।

96 महिलाओं पर हुआ अध्ययन
अध्ययन में 25 से 60 वर्ष की 96 महिलाओं को शामिल किया गया। सभी महिलाओं को कम से कम एक साल से टाइप-टू डायबिटीज थी और वे मुंह से ली जाने वाली डायबिटीज की दवाएं ले रही थीं। अध्ययन के दौरान 90 महिलाओं ने 24 सप्ताह की पूरी प्रक्रिया पूरी की। महिलाओं को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को सामान्य डायबिटीज देखभाल दी गई, जबकि दूसरे समूह को दूध और डेयरी उत्पादों वाले शाकाहारी भोजन के साथ रोजाना 14 घंटे का उपवास रखने को कहा गया। इस समूह को पोषण विशेषज्ञ की सलाह, व्यक्तिगत भोजन योजना और नियमित फॉलो-अप भी दिया गया। जरूरत पड़ने पर फोन के जरिए भी सहायता दी गई।

एचबीए1सी में आया बड़ा सुधार
24 सप्ताह बाद दोनों समूहों के परिणामों में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। विशेष रूप से एचबीए1सी, जो लंबे समय तक ब्लड शुगर के स्तर का महत्वपूर्ण संकेतक है, में काफी सुधार देखा गया। इंटरवेंशन समूह में एचबीए1सी करीब 6.53 प्रतिशत रहा, जबकि सामान्य देखभाल वाले समूह में यह 7.65 प्रतिशत था। यानी दोनों समूहों के बीच लगभग 1.12 प्रतिशत अंक का अंतर रहा। शोधकर्ताओं ने फास्टिंग ब्लड शुगर, भोजन के बाद ब्लड शुगर, इंसुलिन और इंसुलिन रेजिस्टेंस में भी सुधार देखा। हालांकि, इन बदलावों के पीछे केवल उपवास को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।

वजन और कोलेस्ट्रॉल में भी फायदा
इस अध्ययन में महिलाओं के वजन में भी उल्लेखनीय बदलाव देखा गया। इंटरवेंशन समूह में औसत वजन 76.25 किलोग्राम से घटकर 70.93 किलोग्राम हो गया। इसके विपरीत सामान्य देखभाल वाले समूह में वजन 73.69 से बढ़कर 74.43 किलोग्राम हो गया। बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई में भी इसी तरह सुधार देखा गया। इसके अलावा, इंटरवेंशन समूह के कोलेस्ट्रॉल और अन्य लिपिड स्तरों में भी सुधार हुआ, जबकि सामान्य देखभाल वाले समूह में इनमें कुछ प्रतिकूल बदलाव देखे गए।

क्यों खास है 14 घंटे का उपवास?
टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग में व्यक्ति दिन के एक निश्चित समय के भीतर ही खाना खाता है और बाकी समय भोजन से दूर रहता है। 14:10 तरीके में 14 घंटे का उपवास और 10 घंटे की खाने की अवधि होती है। 16:8 जैसी अधिक लंबी फास्टिंग लोकप्रिय है, लेकिन डायबिटीज वाले लोगों के लिए इसे लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल हो सकता है। इसके मुकाबले 14:10 तरीका अपेक्षाकृत आसान और टिकाऊ हो सकता है। इस अध्ययन में भोजन की कुल मात्रा भी कम हुई। इसलिए शोधकर्ता यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि सुधार केवल उपवास की वजह से हुआ या कम कैलोरी, वजन कम होने, बेहतर भोजन और नियमित सलाह के संयुक्त प्रभाव से।

भारतीय भोजन को रखा गया केंद्र में
अध्ययन की एक खास बात यह थी कि इसमें पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों को शामिल किया गया। भोजन में साबुत अनाज और अधिक फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी गई। प्रोटीन से मिलने वाली ऊर्जा करीब 15 से 20 प्रतिशत और वसा से मिलने वाली ऊर्जा 20 से 25 प्रतिशत रखी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि परिचित भोजन लोगों के लिए लंबे समय तक अपनाना आसान हो सकता है। खासकर उन महिलाओं के लिए, जिन पर घर, नौकरी और बच्चों की देखभाल जैसी कई जिम्मेदारियां होती हैं।

अध्ययन की सीमाएं भी समझना जरूरी
हालांकि परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन अध्ययन छोटा था और केवल 24 सप्ताह तक चला। इसमें केवल महिलाएं शामिल थीं और सभी प्रतिभागी पुणे के कुछ केंद्रों से आई थीं। एचबीए1सी प्रतिशत से अधिक वाली महिलाओं और इंसुलिन लेने वाली महिलाओं को अध्ययन में शामिल नहीं किया गया था। इसके अलावा, महिलाओं को नियमित पोषण सलाह और भोजन की निगरानी भी मिली। इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि फायदा केवल शाकाहारी भोजन या 14 घंटे के उपवास से हुआ। कुछ महिलाओं में सिरदर्द, थकान, कब्ज और हाइपोग्लाइसीमिया जैसे हल्के और अस्थायी प्रभाव भी देखे गए। हालांकि कोई गंभीर प्रतिकूल घटना सामने नहीं आई।

आगे और शोध की जरूरत
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि भारतीय महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज के लिए सांस्कृतिक रूप से अनुकूल भोजन और अपेक्षाकृत आसान टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। लेकिन इसके असर की पुष्टि के लिए बड़े और लंबे समय तक चलने वाले अध्ययनों की जरूरत है। डायबिटीज की दवा लेने वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह के बिना उपवास या भोजन के समय में बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए। खासकर उन लोगों में ब्लड शुगर बहुत कम होने का खतरा हो सकता है जो कुछ विशेष प्रकार की डायबिटीज की दवाएं लेते हैं। कुल मिलाकर, यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि भारतीय खान-पान की आदतों के अनुरूप आसान और टिकाऊ जीवनशैली में बदलाव डायबिटीज नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
