विवेक मिश्रा

सीटी स्कैन से किडनी ट्यूमर की पहचान और उसके फैलाव का थ्री डी आकलन भी होगा संभव, भविष्य में डिजिटल ट्विन भी बनाने में मदद मिलेगी। किडनी की बीमारी अक्सर तब तक सामने नहीं आती जब तक वह काफी आगे न बढ़ जाए। शुरुआती चरण में लक्षणों की कमी के कारण मरीजों का निदान देर से होता है और कई मामलों में तब तक किडनी को गंभीर नुकसान पहुंच चुका होता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास ( आईआईटी मद्रास) और वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) के शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित तीन तकनीकें विकसित की हैं। इन तकनीकों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे किडनी की बीमारी के जोखिम का अनुमान लगाने, सीटी  स्कैन में किडनी की असामान्यताओं की पहचान करने और ट्यूमर से किडनी को हुए नुकसान का अधिक सटीक आकलन करने में डॉक्टरों की सहायता कर सकें।

पहली तकनीक मशीन लर्निंग पर आधारित है। यह मरीज की क्लिनिकल और लैब से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण कर क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) के जोखिम का अनुमान लगाती है। शोधकर्ताओं ने इस मॉडल को एक उपयोगकर्ता-अनुकूल प्रोटोटाइप इंटरफेस में भी लागू किया है। इसका उद्देश्य भविष्य में डॉक्टरों के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल आसान बनाना है। टीम ने मॉडल की सटीकता बढ़ाने के साथ-साथ इसके नतीजों को चिकित्सकों के लिए अधिक आसानी से समझने योग्य बनाने पर भी काम किया है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती स्तर पर जोखिम की पहचान होने पर डॉक्टर मरीज की आगे की जांच, निगरानी और उपचार की योजना पहले बना सकते हैं। दूसरी तकनीक डीप लर्निंग आधारित सीटी इमेज क्लासिफायर है। इसे 12,000 से अधिक सीटी इमेज से प्रशिक्षित किया गया है। यह सिस्टम सीटी स्कैन के आधार पर किडनी को चार श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकता है। इनमें सामान्य किडनी, किडनी सिस्ट, किडनी स्टोन और किडनी ट्यूमर शामिल हैं।


इस तरह की स्वचालित इमेज जांच डॉक्टरों को बड़ी संख्या में मेडिकल स्कैन की शुरुआती स्क्रीनिंग में मदद कर सकती है। हालांकि, इसे डॉक्टर के निदान का विकल्प नहीं बल्कि चिकित्सकीय निर्णय में सहायक तकनीक के तौर पर देखा जाना चाहिए। वहीं, तीसरी तकनीक सीटी स्कैन से किडनी का थ्री डी  मॉडल तैयार करती है। इसके जरिए ट्यूमर के वॉल्यूम और किडनी के कितने हिस्से में ट्यूमर का असर है, इसका आकलन किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इस थ्रीडी इमेजिंग फ्रेमवर्क को विकसित करने में ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि इससे ट्यूमर के बोझ को मापने का कम लागत वाला और दोहराया जा सकने वाला तरीका उपलब्ध हो सकता है। यह जानकारी उपचार का फैसला लेने वाले डॉक्टरों के लिए उपयोगी हो सकती है, क्योंकि सिर्फ ट्यूमर की मौजूदगी जानना पर्याप्त नहीं होता; उसका आकार और किडनी के साथ उसका संबंध भी उपचार की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है। आईआईटी मद्रास के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर जी.एल. सैमुअल के मुताबिक, इस शोध का उद्देश्य ऐसे बुद्धिमान सिस्टम तैयार करना था जो चिकित्सकों को मरीजों के बारे में तेजी से और अधिक सूचित निर्णय लेने में मदद कर सकें।

आईआईटी मद्रास की रिसर्च स्कॉलर जेनिफर डिलाइटा ने कहा कि किडनी की बीमारी के मामले में शुरुआती पहचान बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, मरीज-विशिष्ट थ्री डी इमेजिंग मानक माप से आगे जाकर बीमारी की सीमा की अधिक व्यापक तस्वीर दे सकती है। इस शोध में सीएमसी वेल्लोर के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर संतोष वरुघीज ने सहयोग किया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि बीमारी की पहले पहचान और समय पर उपचार से किडनी रोग के बढ़ने की गति को धीमा करने में मदद मिल सकती है। लंबे समय में इससे डायलिसिस जैसी महंगी चिकित्सा प्रक्रियाओं की जरूरत कम होने की संभावना भी बन सकती है। हालांकि, इस संभावना को अभी एक शोध लक्ष्य के रूप में ही देखा जाना चाहिए। एआई टूल विकसित हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वे मरीजों में बीमारी के परिणामों को बेहतर करेंगे। इसके लिए अलग-अलग आबादी और वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं में इनकी व्यापक क्लिनिकल वैलिडेशन जरूरी होगी।

बाएं से दाएं : आईआईटी मद्रास की रिसर्च स्कॉलर जेनिफर डिलाइटा, सीएमसी वेल्लोर के प्रोफेसर संतोष वरुघीज और आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर जी.एल. सैमुअल

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह काम भविष्य में किडनी के डिजिटल ट्विन के विकास की दिशा में एक कदम है।
डिजिटल ट्विन किसी मरीज के अंग की डिजिटल प्रतिकृति होती है, जिसमें मरीज की शारीरिक संरचना और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी को कंप्यूटर मॉडल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। भविष्य में एआई आधारित इमेज विश्लेषण, थ्री डी मॉडल और मरीज की लगातार निगरानी से मिलने वाले डेटा को एक साथ जोड़कर बीमारी की निगरानी और व्यक्तिगत उपचार की योजना बनाने की कोशिश की जा सकती है।

टीम अब अधिक मरीजों के डेटा पर इन मॉडलों का परीक्षण और वैलिडेशन करने की तैयारी में है। शोधकर्ता स्वास्थ्य संस्थानों के साथ साझेदारी बढ़ाकर इन तकनीकों को वास्तविक चिकित्सा परिस्थितियों में जांचना चाहते हैं। वे लंबे समय में एआई तकनीकों को मिनिमली इनवेसिव वियरेबल सेंसर और डिजिटल ट्विन प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। यदि यह दिशा सफल होती है, तो भविष्य में किडनी की सेहत की व्यक्तिगत और लगातार निगरानी के लिए नई तकनीक विकसित हो सकती है। यह शोध आईआईटी मद्रास और स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ एकेडमिक एंड रिसर्च कोलब्रेशन (स्पार्क) परियोजना के संस्थागत सहयोग से किया गया है।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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