ललित मौर्या

उत्तर प्रदेश में किए एक अध्ययन से पता चला है कि बेटे की चाह सिर्फ परिवार की पसंद नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक दबाव है जो सास और बहू की मानसिक सेहत, पारिवारिक रिश्तों और एक महिला की आर्थिक आजादी तक को प्रभावित कर सकता है।गांव के किसी कच्चे आंगन में जब धूप ढलती है, तो एक चौखट पर बैठी सास की निगाहें आने वाली किलकारी में अपना बुढ़ापा तलाशती हैं, वहीं रसोई के धुएं में आंखें मलती बहू अपनी कोख की सलामती की दुआ मांगती है। यह कैसी सोच है जिसमें एक ही छत के नीचे, दो पीढ़ियों का सुकून केवल एक बात पर अटका है—’बेटा होगा या बेटी?’ एक नवजात के लिए यह महज जैविक अंतर हो सकता है, लेकिन भारत के कई परिवारों में यह सवाल एक महिला की मानसिक शांति, उसके सम्मान और भविष्य से जुड़ जाता है। शादी के बाद बच्चे को जन्म देने की जिम्मेदारी के साथ महिलाओं पर यह सामाजिक दबाव भी लाद दिया जाता है कि पहली संतान बेटा ही हो। इसकी वजह केवल वंश आगे बढ़ाने की सोच नहीं, बल्कि बुढ़ापे में सहारे और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी उम्मीदें भी हैं। ऐसे में बच्चे के जन्म की खुशी मनाने से पहले ही कई महिलाओं के मन में यह चिंता घर कर जाती है कि कहीं पहली संतान बेटी तो नहीं होगी।

किलकारी से पहले क्यों उठता है सवाल—बेटा होगा या बेटी?

यह दबाव सिर्फ मां पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सोच और रिश्तों को भी प्रभावित करता है। इस बारे में उत्तर प्रदेश में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि किस तरह बेटे की चाह एक ही घर में रहने वाली सास और बहू, दोनों की मानसिक सेहत, पारिवारिक फैसलों और आर्थिक अवसरों को प्रभावित करती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अर्बाना-शैंपेन के शोधकर्ताओं ने अपने नए अध्ययन में इसी सामाजिक दबाव के एक बेहद अहम पहलू को सामने रखा है। शोधकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में विवाहित महिलाओं और उनके साथ रहने वाली सासों का अध्ययन किया। यह एक ही आंगन में रह रही दो पीढ़ियों के उन अहसासों की दास्तान है, जहां पहला बेटा जन्म लेते ही एक महिला का डर और दूसरी का मानसिक तनाव हमेशा के लिए बदल जाता है।

सास का सुकून, बहू की बेचैनी: रिश्तों का ताना-बाना

उन्होंने पाया कि बहू की पहली संतान बेटा होने से सास की मानसिक सेहत में उल्लेखनीय सुधार होता है। वहीं, दूसरी तरफ उम्र बढ़ने के साथ बहू के लिए बेटा न होने का मानसिक दबाव बढ़ता जाता है। देखा जाए तो भारतीय गांवों में ब्याह कर आई बहुओं के लिए ससुराल का आंगन पराया भी होता है और अपनी पहचान साबित करने की अकेली जगह भी। उस घर की कमान संभालती सास के लिए पोता केवल वंश का चिराग नहीं, बल्कि अपने बुढ़ापे की सुरक्षा और समाज में सिर उठाकर जीने की अकेली गारंटी होता है। अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जब घर में पहला बेटा पैदा होता है, तो सास के मन से अवसाद और चिंता की काली छाया करीब 15 फीसदी तक छंट जाती है।  शोधकर्ताओं के मुताबिक, मानसिक सेहत में यह सुधार किसी पेंशन या संपत्ति पर मालिकाना हक मिलने जैसा गहरा और राहत देने वाला होता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय की सहायक प्रोफेसर कैटालिना हेरेरा-अल्मांजा के मुताबिक, बेटे का जन्म सास के लिए एक तरह की राहत लेकर आता है। भारतीय परिवारों में बेटों को अक्सर वंश आगे बढ़ाने और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। इसलिए पोते के जन्म के साथ सास के मन से भविष्य को लेकर एक बड़ा डर कम हो जाता है।

सिर्फ वंश का चिराग नहीं: बेटे में क्यों तलाशा जाता है बुढ़ापे का सहारा?

लेकिन इन सबके बीच दूसरी तरफ वो युवा बहू खड़ी होती है, जिसके कंधों पर उम्मीदों का यह पूरा पहाड़ लाद दिया जाता है। शुरुआत में शायद उसकी खामोशी नहीं दिखती, पर जैसे-जैसे उसकी उम्र ढलती है और मां बनने की जैविक घड़ी रुकने के करीब पहुंचती है, एक बेटा न दे पाने की तड़प और तानों का डर उसके भीतर एक गहरा डिप्रेशन घोल देता है। ऐसे में ग्रामीण परिवेश में पुरुषों के काम की तलाश में महीनों दूर रहने के कारण, घर का पूरा मानसिक दरोगापन और सास-बहू के बीच की यह कसमकश इसी चौखट के भीतर सुलगती रहती है। यानी एक ही परिवार में बेटे का जन्म दो पीढ़ियों की मानसिक दुनिया को अलग-अलग तरह से प्रभावित करता है, सास के लिए यह राहत है, जबकि अधिक उम्र की बहू के लिए बेटे का न होना चिंता की वजह बन सकता है। अजीब विडंबना यह है कि एक बेटे का जन्म आंगन का पूरा अर्थशास्त्र बदल देता है। भारतीय परिवारों में शादी के बाद महिला पति के परिवार के साथ रहने लगती है। ऐसे संयुक्त परिवारों में सास घरेलू फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले अध्ययनों में भी सामने आया है कि परिवार नियोजन और गर्भनिरोध से जुड़े फैसलों में सास बहू के निर्णयों पर काफी असर डाल सकती है।

एक बेटे का जन्म और घर का बदलता अर्थशास्त्र

अध्ययन में पाया गया है कि पहला बेटा होते ही सास का वो कठोर रूप पिघल जाता है। उसकी अपनी मानसिक शांति लौटते ही वो न सिर्फ बहू को गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की इजाजत दे देती है, बल्कि मुस्कुराकर अपने पोते को अपनी गोद में संभाल लेती है। चूंकि परिवार की नजर में बेटे की चाह पूरी हो चुकी होती है, इसलिए आगे गर्भधारण को लेकर दबाव कम हो जाता है। इसी सहारे के दम पर बहू के कदम घर की दहलीज लांघकर बाहर काम करने और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में उठ पाते हैं यानी, एक महिला का दुलार और उसकी आर्थिक आजादी तक, सब कुछ एक बेटे की मौजूदगी पर टिक जाता है। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि जब सास बच्चों की देखभाल में मदद करती है, तो बहू के लिए नौकरी या काम करना आसान हो जाता है। यानी एक सामाजिक मान्यता महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य, घरेलू रिश्तों और उनकी आर्थिक स्वतंत्रता—तीनों को प्रभावित कर सकती है।

घर से दूर पुरुष, चौखट के भीतर सुलगती सास-बहू की कशमकश

 अध्ययन में पुरुषों की भूमिका का प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका एक कारण ग्रामीण परिवारों में पुरुषों का रोजगार के लिए लंबे समय तक घर से दूर रहना हो सकता है। कई पुरुष प्रवासी श्रमिक के रूप में महीनों घर से बाहर रहते हैं। ऐसे में रोजमर्रा के घरेलू जीवन और परिवार से जुड़े फैसलों में सास की भूमिका अधिक प्रभावशाली हो जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि बेटे की चाह भारत तक सीमित समस्या नहीं हैदक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के कई समाजों में भी ऐसी सामाजिक मान्यताएं मौजूद हैंइन्हें बदलना आसान नहीं है, क्योंकि सामाजिक धारणाएं पीढ़ियों से चली आती हैंयह बदल सकता है लेकिन इसके लिए केवल महिलाओं को समझाना पर्याप्त नहीं होगापरिवार और समुदाय के उन लोगों को भी बातचीत का हिस्सा बनाना होगा, जो महिलाओं के फैसलों को प्रभावित करते हैंभारत में सासों को ध्यान में रखकर परिवार नियोजन से जुड़े सामुदायिक कार्यक्रम पहले से चलाए जा रहे हैं, जिनमें महिलाओं को अपनी सास के साथ इस विषय पर बातचीत के लिए प्रोत्साहित किया जाता है

बदलनी होगी सोच

शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य भी इसी दिशा में हस्तक्षेप तैयार करना है, ताकि बेटे को लेकर बनी सामाजिक अपेक्षाओं को बदला जा सके और महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो। क्योंकि आखिरकार किसी मां की खुशी इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसने बेटे को जन्म दिया है या बेटी को। जब बच्चे के जन्म का मतलब खुशी के बजाय ‘बेटा हुआ या नहीं’ इसकी चिंता बन जाए, तो समस्या सिर्फ परिवार की सोच में नहीं रहती, उसका बोझ महिला के मन पर भी पड़ता है। ऐसे में आखिरकार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसी घर में बेटा पैदा हुआ या बेटी। असली सवाल यह है कि हमने एक मासूम बच्चे के जन्म को मां की खुशी से ज्यादा उसकी ‘काबिलियत’ का पैमाना क्यों बना दिया? क्यों एक बेटी के जन्म के साथ मां के हिस्से में ताने, डर और अनिश्चितता आ जाती है, जबकि बेटे की पहली किलकारी सास के लिए मानसिक सुकून और बहू के लिए स्वीकार्यता का रास्ता खोल देती है?  शायद बदलाव की शुरुआत वहीं से होगी, जब किसी मां की गोद में आए बच्चे से पहले उसके मन को देखा जाएगाजब बेटी और बेटे के बीच फर्क करना बंद होगा, तब शायद किसी आंगन में जन्म लेने वाली किलकारी के साथ यह सवाल नहीं उठेगा—“बेटा हुआ या बेटी?” बल्कि सिर्फ इतना कहा जाएगा—“मां और बच्चा दोनों स्वस्थ और खुश हैं।” और शायद वही दिन होगा, जब किसी महिला का सम्मान, उसका मानसिक सुकून और उसकी आजादी उसकी कोख से जन्मे बच्चे के लिंग से नहीं, बल्कि उसके अपने अस्तित्व से तय होगी।

        (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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