ललित मौर्या
आईआईटी गुवाहाटी द्वारा किए नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत में जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ खेतों और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। बढ़ती गर्मी बच्चों के पढ़ने और सीखने के समय को भी प्रभावित कर रही है। क्या आप जानते हैं बढ़ता तापमान दबे पांव आपके बच्चे के रोजमर्रा के जीवन और पढ़ाई के बीच संतुलन को बदल रहा है। भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि बहुत गर्म या बेहद ठंडे दिनों में बच्चे पढ़ाई के बजाय अपने समय का अधिक हिस्सा आराम और मनोरंजन जैसी गतिविधियों में बिताने लगते हैं। इतना ही नहीं, गर्म दिनों में उनके स्कूल या कॉलेज जाने की दर में भी गिरावट देखी गई है। यह खुलासा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर भास्कर ज्योति नियोग के नेतृत्व में किए अध्ययन में सामने आई है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल रिव्यु ऑफ इकोनॉमिक्स ऑफ द हाउसहोल्ड में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई है कि मौसम का बदलता मिजाज बच्चों के रोजमर्रा के समय और दिनचर्या को किस हद तक बदल रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 2019 के नेशनल टाइम यूज सर्वे के आंकड़ों को रोजाना के मौसम संबंधी आंकड़ों से जोड़कर देखा है।

गर्मी बढ़ी तो पढ़ाई से दूर हुए बच्चे
अध्ययन में सामने आया कि जब तापमान चरम पर पहुंचता है, तो बच्चों के हाथ से पढ़ाई का समय खिसकने लगता है। वे पढ़ने-लिखने में कम समय देते हैं और आराम या मनोरंजन जैसी गतिविधियों में अधिक समय बिताते हैं। यह सिर्फ दिनचर्या में आया एक छोटा-सा बदलाव नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि मौसम बच्चों की शिक्षा पर कितनी गहरी छाप छोड़ रहा है। चरम गर्मी या ठंड का असर केवल स्कूलों के बंद होने या परीक्षा के नतीजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चों के हर दिन, उनके व्यवहार और सीखने के लिए उपलब्ध समय को भी बदल देता है। गर्म दिनों में स्कूल और कॉलेज में उपस्थिति कम होने का संबंध भी सामने आया है। यानी जिस दिन तापमान ज्यादा होता है, उस दिन बच्चे कक्षा में कम पहुंचते हैं और उनके सीखने का समय भी घट सकता है। यह असर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों के विकास में हर दिन का सीखने का समय मायने रखता है। यदि चरम मौसम बार-बार आता है, तो पढ़ाई में होने वाली छोटी-छोटी रुकावटें समय के साथ बड़ा असर डाल सकती हैं।

मौसम और बच्चों के समय के बीच दिखा नया रिश्ता
विकासशील देशों में अब तक मौसम के आर्थिक प्रभावों पर हुए अधिकांश अध्ययनों का ध्यान कृषि उत्पादन और आय पर रहा है। लेकिन यह शोध बच्चों के समय के इस्तेमाल को मौसम के असर की एक सीधी कड़ी के रूप में सामने लाता है। इसके मुताबिक, चरम मौसम बच्चों के सीखने के समय को प्रभावित कर उनके कल्याण और भविष्य के विकास की संभावनाओं पर भी असर डाल सकता है। उनके अनुसार, बच्चे अपने दिन का समय पढ़ाई, आराम और दूसरी गतिविधियों में कैसे बांटते हैं, इसका सीधा असर उनके कल्याण और भविष्य की मानव पूंजी पर पड़ता है। ऐसे में चरम मौसम इस संतुलन को बिगाड़कर बच्चों के सीखने के अवसरों को कम कर सकता है और शिक्षा की सामाजिक व आर्थिक लागत को और बढ़ा सकता है।

जिन इलाकों में गर्मी सामान्य है, वहां असर कुछ कम
अध्ययन में एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि जिन इलाकों में आमतौर पर तापमान ज्यादा रहता है, वहां मौसम और बच्चों के समय के इस्तेमाल के बीच संबंध अपेक्षाकृत कमजोर था। यह संकेत देता है कि लोग लंबे समय में अपने स्थानीय मौसम के अनुसार व्यवहार में बदलाव कर सकते हैं। यानी लगातार गर्म जलवायु में रहने वाले परिवार और बच्चे कुछ हद तक उस परिस्थिति के साथ तालमेल बैठा सकते हैं। हालांकि, अध्ययन में ऐसे स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले कि बच्चे अचानक बदलने वाले असहज मौसम के साथ कम समय में खुद को उसी तरह ढाल लेते हैं।

गरीब परिवारों के बच्चों पर बढ़ सकता है जलवायु का बोझ
चरम तापमान का असर सभी बच्चों पर समान नहीं था। अध्ययन में पाया गया कि लड़कों तथा अधिक शिक्षित और अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चों में तापमान और समय के इस्तेमाल के बीच संबंध कमजोर था। यह अंतर बताता है कि परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बच्चों की चरम मौसम से निपटने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। जिन परिवारों के पास बेहतर घर, एसी-कूलर जैसे साधन, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल उपकरण या पढ़ाई के वैकल्पिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, उनके बच्चों के लिए मौसम से पैदा हुई बाधाओं से निपटना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन सीमित संसाधनों वाले परिवारों के बच्चों के लिए यही मौसम पढ़ाई में बड़ी रुकावट बन सकता है। यानी चरम मौसम का असर सभी बच्चों पर एक जैसा नहीं पड़ता, संसाधनों की कमी इसे कमजोर बच्चों के लिए और अधिक गंभीर बना देती है।

गर्म होती दुनिया में बच्चों के सीखने का समय कितना बचेगा?
शोधकर्ताओं ने भविष्य के जलवायु परिदृश्यों का इस्तेमाल कर यह भी अनुमान लगाने की कोशिश की है कि इस सदी के अंत तक बदलता मौसम बच्चों के पढ़ाई और आराम के समय को किस तरह प्रभावित कर सकता है। इस विश्लेषण में अतिरिक्त अनुकूलन उपाय नहीं किए जाने की स्थिति को ध्यान में रखा गया। इसका संकेत साफ है, अगर चरम तापमान बढ़ता रहा, और शिक्षा व्यवस्था उसी तरह चलती रही, तो बच्चों के सीखने के समय पर दबाव और बढ़ सकता है।

स्कूलों को भी बदलती जलवायु के लिए तैयार करना होगा
अध्ययनके निष्कर्ष बताते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को अब जलवायु परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। स्कूलों को केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि बदलते मौसम के बीच बच्चों की सीखने की निरंतरता बनाए रखने वाली सुरक्षित जगह के रूप में तैयार करना होगा। इसके लिए स्कूली इमारतों और बुनियादी ढांचे को भीषण गर्मी, ठंड और दूसरे चरम मौसम के अनुकूल बनाने की जरूरत है। चरम मौसम के दौरान पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए वैकल्पिक शिक्षण व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए। साथ ही, स्थानीय मौसम की स्थिति को देखते हुए स्कूल के समय और शैक्षणिक कैलेंडर में जरूरी लचीलापन लाया जा सकता है। जहां संभव हो, मिश्रित या डिजिटल माध्यम से पढ़ाई की व्यवस्था को भी मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि मौसम की मार के बीच बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह न रुके।

डिजिटल पढ़ाई भी तभी कारगर, जब हर बच्चे तक पहुंचे
लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि जलवायु अनुकूलन की यह कोशिश नई असमानताएं पैदा न करे, यह भी उतना ही जरूरी है। जिन बच्चों के पास घर में इंटरनेट, डिजिटल उपकरण, बिजली या ठंडक की सुविधा नहीं है, वे ऑनलाइन पढ़ाई के विकल्प का लाभ नहीं उठा पाएंगे। इसलिए जलवायु-लचीली शिक्षा व्यवस्था का मतलब सिर्फ स्कूल की बेहतर इमारतें बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि गर्मी या खराब मौसम किसी बच्चे की पढ़ाई और उसके भविष्य के बीच दीवार न बन जाए।

आने वाली पीढ़ी के भविष्य का भी है सवाल
अध्ययन ने आगे के शोध के लिए कई महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े किए हैं। शोधकर्ता यह समझना चाहते हैं कि मौसम बच्चों की नींद, शारीरिक गतिविधि, स्वास्थ्य, संज्ञानात्मक और गैर-संज्ञानात्मक विकास तथा सामाजिक मेलजोल को किस तरह प्रभावित करता है। प्रोफेसर नियोग अब यह भी अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं कि बच्चे, परिवार और शैक्षणिक संस्थान चरम मौसम के साथ किस तरह तालमेल बैठाते हैं। इसके साथ ही जलवायु-अनुकूल स्कूलों, लचीले शैक्षणिक समय और पढ़ाई के वैकल्पिक माध्यमों जैसे उपाय कितने प्रभावी हैं, इसका भी आकलन किया जाएगा। ऐसे में बदलती जलवायु की इस तस्वीर में सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद यही है, अगर गर्मी बच्चों के पढ़ने का समय इसी तरह कम करती रही, तो आने वाली पीढ़ी की सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता पर इसका कितना असर पड़ेगा?
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
