महामारियां तो बदल रही हैं लेकिन उनमें होने वाला भेदभाव सदियों से वैसा ही है
– रामचन्द्र गुहा
14वीं सदी में ब्यूबॉनक प्लेग नाम की एक महामारी ने यूरोप और एशिया के एक बड़े हिस्से को तबाह कर दिया था. इतिहास में यह महामारी ब्लैक डैथ यानी काली मौत के नाम से दर्ज है. यह समाज के लिए असाधारण कष्ट का कारण तो बनी ही, इस दौरान इंसानी पूर्वाग्रहों का बर्बर रूप भी दिखा. इसी महीने फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने एक लेख में कोलंबिया विश्वविद्यालय के इतिहासकार साइमन स्कामा ने लिखा है, ‘हमेशा की तरह प्लेग से पस्त ताकतों ने इसके लिए किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था और यह भी अवश्यंभावी था कि निशाना यहूदी होंगे. ब्लैक डेथ के दौरान कहीं उन पर कुंओं में जहर मिलाने का आरोप लगाया गया तो कहीं कहा गया कि यह बीमारी वही लाए हैं क्योंकि वे ईसाइयों से दुश्मनी रखते हैं.’

साइमन स्कामा ने लिखा है कि मध्ययुग के उस दौर में पूरे यूरोप में ईसाइयों ने यहूदियों पर हमले किए. लेकिन यह कोई नई बात नहीं थी. उनके मुताबिक हर महामारी के दौरान कमजोर अल्पसंख्यकों पर हमलों का इतिहास रहा है. जब 19वीं सदी में अमेरिका के पूर्वी तट वाले इलाकों में हैजा फैला तो इंग्लिश मूल के प्रोटेस्टेंटों ने आइरिश मूल के कैथोलिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया जो अमेरिका अपेक्षाकृत बाद में आए थे और जिनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही थी. यह अभियान नेटिविस्ट आंदोलन में बदल गया जिसकी मांग थी अपनी पहचान की सुरक्षा. साइमन स्कामा के मुताबिक इस दौरान आइरिश प्रवासियों पर हमले हुए. प्रोटेस्टेंट एंग्लो अमेरिकी समुदाय उन्हें दोहरे खतरे के तौर पर देखता था. उसका मानना था कि इन लोगों से बीमारी और वेटिकन के हस्तक्षेप, दोनों का खतरा है. असल में आइरिश मूल के कैथोलिकों पर पोप का बड़ा असर था.


साइमन स्कामा का लेख हमें मोटे तौर पर यूरोप और अमेरिका में महामारियों के इतिहास के बारे में बताता है. अब हम आधुनिक भारत में आई महामारियों पर केंद्रित दो अध्ययनों की बात करते हैं. साल 2002 में अर्बन हिस्ट्री नाम के एक चर्चित जर्नल में इतिहासकार प्रशांत किदांबी का एक लेख प्रकाशित हुआ था. इसमें 1896 में बॉम्बे में आए प्लेग के असर का अध्ययन किया गया था. तब भारत में अंग्रेजों का राज था. प्लेग से निपटने की उनकी जो नीतियां थीं उनमें एक वर्ग के प्रति भेदभाव था. प्रशांत किदांबी लिखते हैं कि इस नजरिये का निशाना शहरों में रहने वाला गरीब तबका बना. अंग्रेज और रसूखदार भारतीय मानते थे कि यह बीमारी मुख्य रूप से झुग्गियों में रहने वालों से आई है. इन इलाकों पर हमले हुए. सैकड़ों झुग्गियां या तो जला दी गईं या फिर उन्हें ढहा दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि बॉम्बे में हजारों लोगों के सर से छत छिन गई.


1918 में भारत में इन्फ्लूएंजा महामारी का प्रकोप हुआ. इस महामारी ने देश में एक करोड़ 20 लाख से भी ज्यादा जानें ली थीं. इस दौरान भी गरीबों को कहीं ज्यादा नुकसान हुआ. इस पर बीते साल ट्रांसएक्शंस ऑफ द रॉयल हिस्टॉरिकल सोसायटी में इतिहासकार डेविड आर्नोल्ड का एक लेख प्रकाशित हुआ था. आर्नोल्ड ने उस समय मध्य प्रांत के सैनिटरी कमिश्वर के हवाले से लिखा है, ‘बीमारी ने सबसे ज्यादा नुकसान गांवों में किया. लोग पूरी तरह से असहाय थे. ऊपर से खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के भी लाले पड़ गए. इस सबने मिलकर आपदा को एक ऐसा रूप दे दिया जिसे बयां नहीं किया जा सकता.’ इसी दौरान पंजाब के सैनिटरी कमिश्नर ने कहा, ‘जो लोग सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं वे गरीब और देहाती हैं जिनके पास छत, इलाज, खाने और पहनने-ओढ़ने का ठीक से इंतजाम नहीं है.

भारत में कोविड-19 को देखकर 14 सदी में यूरोप में फैले प्लेग और ब्रिटिश राज में भारत में फैली महामारियों की याद आती है. यह अच्छी बात नहीं कि आज भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है देश के शहरों और गांवों में सांप्रदायिकता का वायरस लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले चुका है।
कथित रूप से आधुनिक हमारे समाज ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए जिस तरह की जहरीली नफरत दिखाई है वह वैसी ही है जो एक समय में मध्ययुगीन यूरोप की पहचान थी.

( ” सत्याग्रह ” में प्रकाशित आलेख का अंश, साभार )

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