विवेक मिश्रा
मां का दूध यानी ब्रेस्टमिल्क शिशुओं के लिए सबसे सुरक्षित और संपूर्ण पोषण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समेत वैज्ञानिकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसे लंबे समय से नवजात शिशु की पहली वैक्सीन और रोगों के खिलाफ प्राथमिक सुरक्षा कवच बताया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर यही पहला भोजन पर्यावरणीय प्रदूषकों के बढ़ते बोझ को दर्शाने लगे तो क्या होगा? मां का दूध (ब्रेस्टमिल्क) सबसे परिचित लेकिन सबसे रहस्यमय पदार्थों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समेत सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना रहा है कि स्तनपान शिशुओं के लिए सबसे सुरक्षित और संपूर्ण पोषण प्रदान करता है। यह शिशु स्वास्थ्य और जीवन रक्षा के सबसे विश्वसनीय तरीकों में से एक है।

हाल के दशकों में हुए अध्ययनों ने यह भी दिखाना शुरू किया है कि यह “जीवित” तरल दवा की तरह काम करता है, शिशु की विशिष्ट और बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढालता है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को आकार देता है। विकास की प्रक्रिया से यह तरल पोषक तत्वों—जैसे बड़े पोषक तत्व और छोटे पोषक तत्व, जैव सक्रिय अणु और यहां तक कि स्टेम सेल्स का संतुलित मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो शिशु के स्वस्थ विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और तंत्रिका विकास में मदद करता है। शिशुओं में यह सूजन को कम करता है, हानिकारक रोगाणुओं को निष्क्रिय करता है और आंत के सूक्ष्मजीवों को विकसित करता है। यह श्लेष्म झिल्ली के परिपक्व होने को बढ़ावा देकर एलर्जी और ऑटोइम्यून रोगों के जोखिम को कम करता है और पाचन, तंत्रिका, अंत:स्रावी (इंडोक्राइन ग्लैंड) और प्रतिरक्षा तंत्र के सही विकास में योगदान देता है। यह मोटापा और श्वसन संक्रमण से भी सुरक्षा प्रदान करता है। 2015 में द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक दीर्घकालिक अध्ययन ने यह प्रमाण दिया कि लंबी अवधि तक स्तनपान करने वाले बच्चों में वयस्क होने पर अधिक बुद्धिमत्ता, अधिक स्कूलिंग वर्ष और बेहतर आय देखने को मिली। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि अब मां के दूध के कुछ घटकों का उपयोग करके कैंसर, हृदय रोग, गठिया और पेट संबंधी बीमारियों के उपचार की संभावनाओं को खोजा जा रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब यह पहला भोजन पर्यावरणीय प्रदूषकों के प्रभाव को दर्शाने लगे तो क्या होता है? भारत के ग्रामीण हिस्सों में वैज्ञानिकों ने मां के दूध में कीटनाशकों और भारी धातुओं के अवशेष पाए हैं। ताजा शामिल होने वाला प्रदूषक है यूरेनियम। ऐसा लगता है कि प्रदूषकों के संपर्क की शुरुआत केवल वयस्कता या किशोरावस्था में नहीं बल्कि शिशु अवस्था में ही हो सकती है। पाई गई मात्रा अक्सर बहुत कम होती है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव अभी निश्चित नहीं है। फिर भी, यह निष्कर्ष चिंता और सवाल उठाते हैं।

ब्रेस्टमिल्क में रेडियोधर्मी यूरेनियम
बधाई हो! आप कैंसर मुक्त हैं। यह सुनते ही ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आई एक अधेड़ उम्र की महिला का गला रूंध जाता है और वह डॉक्टर के केबिन से बाहर निकलते ही खुशी के आंसू छलका देती है। हालांकि, इसी केबिन के बाहर चेहरे पर डर और हाथों में जांच फाइलों का गट्ठर लिए हुए अलग-अलग स्टेज के कैंसर पीड़ितों की एक लंबी कतार अपनी बारी का इंतजार कर रही है। बिहार की राजधानी पटना में स्थित महावीर कैंसर संस्थान के लिए यह आम बात है। केबिन में बैठी महावीर कैंसर संस्थान की चिकित्सा निदेशक डॉ मनीषा सिंह कहती हैं “कैंसर के मरीजों की लगातार बढ़ती हुई यह कतार अब आश्चर्य का विषय नहीं रही। कैंसर ने महामारी का रूप ले लिया है और पर्यावरणीय प्रदूषण ने इसे ट्रिगर दे दिया है।” यानी हवा, पानी और भोजन का लगातार खराब होते जाना इस महामारी के सबसे बड़े कारकों में से एक है। वह आगे कहती हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष इन मरीजों को कैंसर और अन्य अस्पतालों की दहलीज पर पहुंचाने में पर्यावरणीय प्रदूषण का बड़ा हाथ है। यह चिंताजनक है कि सबसे ताजा मिसाल बिहार के कुछ जिलों में ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम-238 का पाया जाना है, हालांकि वह यह भी जोड़ती हैं कि अभी इसके कैंसरकारी होने के परिणाम नहीं हैं और इसके दूरगामी क्या दुष्परिणाम होंगे वह हम अभी नहीं जानते। कई शोध यह पुष्टि करते हैं कि यूरेनियम 238 एक भारी धातु है, जिसकी बहुत छोटी मात्रा भी शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। यह मुख्य रूप से किडनी और हड्डियों में जमा हो सकता है और लंबे समय तक रहने पर स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। कुछ शोध इसे संभावित कैंसरकारी (कार्सिनोजेनिक) मानते हैं। यह रेडियोएक्टिव भी है, यानी यह अपने आप रेडियोधर्मी कण उत्सर्जित करता है। इसलिए ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम 238 की मौजूदगी को अन्य भारी धातुओं में सबसे अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। यूरेनियम की मौजूदगी का पता लगाने वाले शोध में शामिल वैज्ञानिक इसे खतरे की घंटी जरूर मानते हैं लेकिन वह इस रेडियोधर्मी तत्व के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर दीर्घ अवधि की निगरानी का विषय मानते हैं।

महावीर कैंसर संस्थान के मेडिकल रिसर्च हेड अशोक कुमार घोष कहते हैं, “दुनिया में शायद पहली बार ब्रेस्टमिल्क के सैंपल में यूरेनियम की मौजूदगी को जांचा गया है। इसके मानव शरीर में पहुंचने की वजह पानी और भोजन हो सकता है।” लेकिन ठोस और बेहतर अकादमिक और चिकित्सीय नतीजों के लिए वह इस शोध को देशव्यापी करने की बात करते हैं (देखें, करते रहना होगा ब्रेस्टमिल्क की जांच,)। ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम से संबंधित शोध “डिस्कवरी ऑफ यूरेनियम कंटेट इन ब्रेस्टमिल्क एंड एसेसमेंट ऑफ एसोसिएटेड हेल्थ रिस्क फॉर मदर्स एंड इनफैंट्स इन बिहार, इंडिया” को नेचर जर्नल में प्रकाशित किया गया। इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ अरुण कुमार के मुताबिक यह अध्ययन बिहार के उन जिलों में किया गया है जहां पहले पानी में यूरेनियम की उपस्थिति दर्ज की जा चुकी है (देखें, देश के कई राज्यों में भूजल में यूरेनियम,पेज 35)। इनमें भोजपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगडिया, कटिहार और नालंदा जिले शामिल हैं। प्रमुख शोधार्थी और वरिष्ठ वैज्ञानिक अरुण कुमार ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पहले यह जांच पानी और खाद्य पदार्थों में भारी धातुओं तक रही और अंत में यह अध्ययन ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की खोज तक पहुंचा। यह अध्ययन अक्टूबर 2021 से जुलाई 2024 के बीच किया गया। इसमें 17 से 35 वर्ष आयु की 40 स्तनपान कराने वाली माताओं के ब्रेस्टमिल्क के नमूनों का विश्लेषण किया गया। ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम (यू 238) की मात्रा अमेरिका निर्मित एगिलेंट 7850 एलसी आईसीपी एमएस उपकरण से मापी गई। यह विश्लेषण बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर स्थित राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईपीईआर) में किया गया। अध्ययन के परिणामों में पाया गया कि सभी 40 महिलाओं के ब्रेस्टमिल्क के नमूनों में यूरेनियम की मात्रा शून्य से 6 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच थी। हालांकि, वर्तमान में ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मात्रा के लिए कोई अनुमेय सीमा या मानक निर्धारित नहीं है। नमूनों में यूरेनियम की अधिकतम मात्रा 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। डॉ अरुण के मुताबिक, जिला स्तर पर किए गए विश्लेषण से यह जानकारी सामने आई कि यूरेनियम सांद्रता सर्वाधिक कटिहार फिर समस्तीपुर, इसके बाद नालंदा, खगड़िया, बेगूसराय और भोजपुर में रहा। सबसे अधिक यूरेनियम प्रभावित जिला कटिहार रहा, जहां ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मात्रा 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई। वहीं, स्तनपान करने वाले शिशुओं के स्वास्थ्य जोखिम का आकलन मोंटे कार्लो सिमुलेशन पद्धति से किया गया। इसमें ब्रेस्टमिल्क के माध्यम से शिशुओं द्वारा प्रतिदिन ग्रहण की जाने वाली यूरेनियम की औसत मात्रा का अनुमान लगाया गया। इसके लिए औसत दैनिक खुराक, जोखिम अनुपात और कैंसर जोखिम जैसे मानकों की गणना की गई। परिणामों से यह सामने आया कि अध्ययन में शामिल 70 प्रतिशत शिशु आबादी में गैर कैंसरजन्य स्वास्थ्य प्रभाव उत्पन्न होने की संभावना है। हालांकि, किसी भी प्रभावित व्यक्ति में कैंसरजन्य जोखिम नहीं पाया गया।

ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की औसत न्यूनतम मात्रा नालंदा जिले में 2.35 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई जबकि औसत अधिकतम मात्रा खगड़िया जिले में 4.035 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। यह सवाल अभी अनुत्तरित है कि ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम कैसे पहुंचा। हालांकि, शोध में शामिल वैज्ञानिकों के मुताबिक ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मौजूदगी का कारण पीने का पानी या उसी क्षेत्र में उगाया गया भोजन हो सकता है (देखें, ऐसे घुल रहा भारी धातु, पेज 36)। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि यूरेनियम जैसे संदूषण (कंटेमिनेशन) के बावजूद स्तनपान शिशुओं के पोषण का सर्वोत्तम तरीका है और जब तक चिकित्सकीय रूप से आवश्यक न हो, इसे बंद नहीं किया जाना चाहिए। डॉ मनीषा सिंह कहती हैं, सिर्फ वह कैंसर मरीजों को स्तनपान कराने से रोकती हैं क्योंकि इससे नवजात को परेशानी हो सकती है। वह कहती हैं, “कैंसर ग्रस्त गर्भवती महिलाओं में कीमोथैरेपी के दौरान यह देखा गया है कि दवाएं शरीर के भीतर मौजूद सुरक्षा दीवार को भेद देती हैं और जिसके कारण ब्रेस्टमिल्क में उनकी मौजूदगी रहती है। ऐसे में कीमोथैरेपी कराने वाली महिलाओं को बच्चों को दूध पिलाने से मना कर दिया जाता है। बाकी सभी महिलाएं सुरक्षित स्तनपान करा सकती हैं।” शोध भी बताते हैं कि प्रकृति ने ब्रेस्टमिल्क को इतना परफेक्ट डिजाइन किया है जो नवजात शिशु के लिए एक सुरक्षित जैविक प्रणाली प्रदान करता है। पबमेड जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र “ह्यूमन ब्रेस्ट मिल्क ए रिव्यू ऑन इट्स कम्पोजिशन एंड बायोएक्टिविटी” के मुताबिक मानव दूध को शिशुओं के लिए सबसे उपयुक्त और संपूर्ण पोषण का स्रोत माना जाता है। इस अध्ययन में बताया गया है कि स्तन दूध की संरचना स्थिर नहीं रहती बल्कि स्तनपान की पूरी अवधि में और यहां तक कि एक ही बार दूध पिलाने के दौरान भी इसके घटक बदलते रहते हैं ताकि शिशु की बदलती पोषण जरूरतें पूरी हो सकें। जन्म के तुरंत बाद बनने वाला कोलोस्ट्रम प्रोटीन और प्रतिरक्षा से जुड़े तत्वों की अधिक मात्रा से भरपूर होता है। दूध का निर्माण स्तन ग्रंथियों की एपिथीलियल कोशिकाओं में होता है, जो मां के रक्त से मिलने वाले पोषक घटकों को लेकर दूध का निर्माण करती हैं। वहीं, एक अन्य शोधपत्र “ब्रेस्ट मिल्क इम्युनोग्लोबुलिनोम” के मुताबिक, मानव दूध में कई प्रकार के इम्युनोग्लोबुलिन, जैसे सेक्रेटरी आईजीए के साथ आईजीएम और आईजीजी शामिल हैं। यह शरीर के भीतर मौजूद ऐसे विशेष प्रतिरक्षा प्रोटीन होते हैं जो रोग पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया को पहचानने और उनसे लड़ने में मदद करते हैं। यही कारण है कि स्तन दूध नवजात शिशु को शुरुआती महीनों में संक्रमण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रेडियोधर्मी यूरेनियम का पानी में होना और अब ब्रेस्टमिल्क में मिलना आखिर कितना खतरनाक है? यह सवाल एक गहरी पड़ताल की तरफ बढ़ता है लेकिन इससे पहले यह जानना भी जरूरी है कि आखिर रेडियोधर्मी तत्व या फिर अन्य भारी धातुओं की मात्रा का पानी में या ब्रेस्टमिल्क में किस स्तर तक मिलना कितना स्वीकार्य है। पेयजल में यूरेनियम की सांद्रता की स्वीकार्य सीमाएं 1990 से लगातार बदल रही हैं लेकिन ब्रेस्टमिल्क में इसकी सांद्रता को लेकर अबतक कोई मानक नहीं है। हालांकि, भारी धातुओं के लिए दोनों जगह स्वीकार्य सीमाएं मौजूद हैं। स्प्रिंगर नेचर जर्नल में प्रकाशित “यूरेनियम स्टैंडर्ड्स इन ड्रिकिंग वाटर : एन एग्जामिनेशन फ्रॉम साइंटिफिक एंड सोशियो इकोनॉमिक स्टैंडप्वाइंटस ऑफ इंडिया” के मुताबिक, यूरेनियम के लिए पेयजल में सुरक्षित स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने लंबे समय में कई बदलाव किए हैं। 1993 1996 की अवधि में, डब्ल्यूएचओ ने विकिरणीय आधार पर पेयजल में यूरेनियम का स्वीकार्य मानक 140 माइक्रोग्राम प्रति लीटर का स्तर सुझाया था क्योंकि उस समय रासायनिक विषाक्तता के पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं थे। इसके बाद 1998 में सीमित विषाक्तता डेटा के आधार पर एक बहुत कड़ा 2 माइक्रोग्राम प्रति लीटर का रासायनिक मान प्रस्तावित किया गया। आगे चलकर, डब्ल्यूएचओ ने 2004 में इसे 15 माइक्रोग्राम प्रति लीटर और 2011 में वैज्ञानिक साक्ष्यों के अद्यतन के बाद 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक बढ़ा दिया, जिसे वर्तमान में पेयजल के लिए मार्गदर्शक मान के रूप में अपनाया गया है। यह स्तर संयुक्त राज्य अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी यूएस-ईपीए द्वारा भी नियामक सीमा के रूप में स्वीकार किया गया है। भारत में, विकिरणीय दृष्टिकोण के आधार पर कुछ मामलों में एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) ने लगभग 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर का स्तर अपनाया है, लेकिन यह डब्ल्यूएचओ द्वारा सुझाए गए मानों से भिन्न है। ब्रेस्टमिल्क में भी यूरेनियम से पहले कई भारी धातुओं और खतरनाक रसायनों की मौजूदगी वैज्ञानिकों शोध और जांच में मिल चुकी है।

महावीर कैंसर संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अरुण कुमार के मुताबिक, एक अध्ययन में उन्होंने ब्रेस्टमिल्क नमूने में लेड की मात्रा स्वीकार्य सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से सैकड़ों गुना अधिक 1309 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई थी और 92 फीसदी ब्रेस्टमिल्क के नमूनों में लेड की मौजूदगी थी। डॉक्टर अरुण कहते हैं कि भले ही यूरेनियम के नवजात पर प्रभावों का हमारे पास अभी कोई ठोस नतीजा नहीं है लेकिन लेड जैसी भारी धातुएं न सिर्फ बच्चों की ग्रोथ को प्रभावित करते हैं बल्कि उनकी संज्ञानात्मक शक्ति भी क्षीण कर रही हैं। बिहार में ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम के स्रोत को लेकर झारखंड के रांची स्थित जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉक्टर अखौरी बिश्वप्रिया का कहना है कि बिहार में वह अन्य भारी धातुओं की खोज कर रहे थे, इस दौरान ब्रेस्ट मिल्क की जांच में बायप्रोडक्ट के तौर पर यूरेनियम मिला है जो निश्चित ही जियोलॉजिकल स्रोतों से नहीं आया है। बिश्वप्रिया के मुताबिक, “झारखंड में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां यूरेनियम खनन होता है, लेकिन बिहार में ऐसी कोई डेफिनिट स्थिति नहीं है। बिहार में यूरेनियम की बढ़ी हुई सांद्रता के भूवैज्ञानिक कारण होने की संभावना बिल्कुल न के बराबर है। बिहार का लगभग 93 फीसदी क्षेत्र जलोढ़ (एलवुयम) से ढका है और केवल 7.3 फीसदी चट्टानी क्षेत्र है और वह भी गहराई में है। इस ऊपरी गंभीर आवरण के कारण यूरेनियम का भूवैज्ञानिक रूप से मौजूद होना मुश्किल है और यह पानी में भी सीमाओं के भीतर मिला है। इसलिए, यदि यूरेनियम की सांद्रता बढ़ती है तो इसके कारण भूवैज्ञानिक नहीं बल्कि चिकित्सा संबंधी या क्षेत्रीय कारण हो सकते हैं।” इस शोध के बाद उपजी चिंताओं को लेकर डॉक्टर मनीषा कहती हैं, “ब्रेस्टमिल्क आज भी अमृत है और कीमोथैरेपी ले रही कैंसर पीड़ितों को छोड़कर सभी मां को बेहिचक अपने नवजात शिशु को यह पिलाते रहना चाहिए।” विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी ब्रेस्टमिल्क में आर्सेनिक, शीशा जैसी भारी धातुओं के मिलने के बावजूद इसे नवजात शिशुओं की सेहत के लिए अभी उत्तम मानता है।

अमृत में घुलता जहर
अब सवाल है कि मानव दूध के यह गुण क्या प्रभावित हो रहे हैं? जवाब है हां और अब यह घातक सच्चाई सिर्फ बिहार की बात नहीं रही, बल्कि ब्रेस्टमिल्क में रासायनिक प्रदूषकों के एक्सपोजर खतरा देश के कई राज्यों में उभर रहा है। चेन्नई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज और होमी भाभा नेशनल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने मानव ब्रेस्टमिल्क में मौजूद पर्यावरणीय रसायनों से जुड़े शोधपत्रों को एकत्र करके एक विशेष डाटाबेस तैयार किया है, जिसका नाम “एक्सपोसोम ऑफ ह्यूमन मिल्क एक्रॉस इंडिया” (एक्सएचयूएमएलडी डेटाबेस) रखा गया है। एक्सपोसोम का अर्थ किसी व्यक्ति के जीवन भर उस पर पड़ने वाले सभी बाहरी और आंतरिक प्रभावों का कुल योग है। इसमें भोजन, पानी, हवा, रसायन, प्रदूषण और जीवनशैली जैसे कारक शामिल होते हैं। नवजात शिशु के लिए मानव दूध यानी ब्रेस्टमिल्क उसका पहला और सबसे महत्वपूर्ण एक्सपोसोम स्रोत माना जाता है क्योंकि मां के दूध के माध्यम से पोषक तत्वों के साथ साथ कई सूक्ष्म रसायन भी बच्चे के शरीर में पहुंच सकते हैं और उसके स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा और विकास को प्रभावित कर सकते हैं। इस डाटाबेस को तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने 36 प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों का परीक्षण किया। इसके बाद भारत के विभिन्न राज्यों से ब्रेस्टमिल्क में पाए गए प्रदूषकों के आंकड़ों को एक मानकीकृत रूप में व्यवस्थित किया ताकि उनकी तुलना और विश्लेषण किया जा सके। यह डाटाबेस बताता है कि भारत के 13 राज्यों से एकत्र किए गए अध्ययनों में ब्रेस्टमिल्क में 100 से अधिक पर्यावरणीय प्रदूषक दर्ज किए गए हैं। इन प्रदूषकों के स्रोतों को छह प्रमुख वर्गों में बांटा गया है। इनमें सबसे अधिक रसायन ऐसे पाए गए जो उपभोक्ता उत्पादों, औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावरणीय प्रदूषण से जुड़े हैं। वर्गीकरण के अनुसार कृषि से संबंधित 42 रसायन, उपभोक्ता उत्पादों से जुड़े 63 रसायन, औद्योगिक स्रोतों से 54 रसायन, चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े छह रसायन, रासायनिक निर्माण की मध्यवर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े तीन रसायन और व्यापक पर्यावरणीय प्रदूषण की श्रेणी में 67 रसायन शामिल किए गए हैं।

इन प्रदूषकों में भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, लेड और मर्करी के साथ-साथ लंबे समय तक टिके रहने वाले जैविक प्रदूषक भी शामिल हैं। इन रसायनों में डायऑक्सिन, फुरन्स और पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल (पीसीबी) जैसे यौगिक आते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में परसिस्टेंट ऑर्गेनिक पॉल्युटेंट कहा जाता है। शोध बताते हैं कि ऐसे टिकाऊ रसायन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से धीरे-धीरे मानव शरीर में प्रवेश करते हैं और लंबे समय तक बने रहते हैं। यही कारण है कि कई अध्ययनों में मानव शरीर की चर्बी और ब्रेस्टमिल्क दोनों में डायऑक्सिन और पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल जैसे प्रदूषक पाए गए हैं। डायऑक्सिन को अत्यंत विषैले पर्यावरणीय रसायनों में गिना जाता है और यह आम तौर पर कचरा जलाने, कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा ईंधन या अन्य जैविक पदार्थों के दहन के दौरान बन सकता है। इसके अलावा कई अध्ययनों में डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरोइथेन (डीडीटी) और हेक्साक्लोरोसाइक्लोहेक्सेन (एचसीएच) जैसे क्लोरीन आधारित पुराने कीटनाशक भी ब्रेस्टमिल्क के नमूनों में दर्ज किए गए हैं। इन रसायनों का इस्तेमाल पहले कृषि और मच्छर नियंत्रण कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर किया जाता था। हालांकि बाद में इनके पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभावों को देखते हुए कई देशों में इनके उपयोग पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। चूंकि यह रसायन पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं, इसलिए इनके अवशेष आज भी मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच सकते हैं। एक्सएचयूएमएलडी डेटाबेस में शामिल अध्ययनों के अनुसार भारत के विभिन्न राज्यों से लिए गए कुछ ब्रेस्टमिल्क नमूनों में पीसीबी, डीडीटी और एचसीएच जैसे रसायनों के स्तर कई मामलों में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा सुझाई गई स्वीकार्य सीमाओं के करीब या उससे अधिक दर्ज किए गए हैं। विशेष रूप से पंजाब से लिए गए कुछ नमूनों में इन प्रदूषकों की उल्लेखनीय मात्रा रिपोर्ट की गई है। इन अध्ययनों से संकेत मिलता है कि पर्यावरणीय रसायनों का संपर्क मातृ और शिशु स्वास्थ्य से जुड़े जैविक मार्गों को प्रभावित कर सकता है। कुछ शोध यह भी संकेत देते हैं कि ऐसे रासायनिक एक्सपोजर का संबंध दीर्घकाल में कैंसर, हॉर्मोन असंतुलन और शिशुओं के मस्तिष्क तथा तंत्रिका तंत्र के विकास से जुड़े संभावित जोखिमों से हो सकता है, हालांकि इन प्रभावों की प्रकृति और तीव्रता कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती है।

हर तरफ खतरा
एक्सएचयूएमएलडी डाटाबेस के आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु में सबसे अधिक 66 अलग-अलग प्रदूषक दर्ज किए गए, इसके बाद पश्चिम बंगाल में 61, कर्नाटक में 34 और पंजाब में 25 प्रदूषक पाए गए हैं। मध्यम स्तर पर दिल्ली में 11 और उत्तर प्रदेश में 12 प्रदूषक दर्ज किए गए, जबकि छत्तीसगढ़ में केवल चार प्रदूषक रिपोर्ट हुए हैं। यह राज्यवार वितरण इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत में पर्यावरणीय रसायनों के संपर्क और उन पर होने वाले शोध दोनों में क्षेत्रीय असमानता मौजूद है, जिसके कारण मानव दूध में पाए जाने वाले रसायनों की प्रकृति और संख्या अलग अलग क्षेत्रों में भिन्न दिखाई देती है।

छह दशकों में बढ़ा रसायनों का दायरा
एनवायरमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित समीक्षा अध्ययन “कैरेक्टराइजेशन ऑफ डिफरेंट कंटेमिनेंट्स एंड करेंट नॉलेज फॉर डिफाइनिंग केमिकल मिक्सचर्स इन ह्यूमन मिल्क : ए रिव्यू” में स्पष्ट होता है कि पिछले छह दशकों (1960-2020) के दौरान मानव ब्रेस्टमिल्क में पाए जाने वाले पर्यावरणीय प्रदूषकों पर किए गए अध्ययनों की संख्या और रसायनों की विविधता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रारंभिक दशकों (1960-1990) में शोध मुख्य रूप से पारंपरिक टिकाऊ जैविक प्रदूषकों (पीओपी) जैसे पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफिनाइल (पीसीबी) और ऑर्गानो-क्लोरीन कीटनाशकों तक सीमित थे। 2000 के बाद के वर्षों में न केवल इन पारंपरिक प्रदूषकों की रिपोर्टिंग बढ़ी, बल्कि नए उभरते रसायनों जैसे हैलोजेनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स, बिसफेनॉल्स, फिनॉल्स, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) और ट्रेस मेटल्स भी मानव दूध में पाए जाने लगे। वहीं, हाल के दशकों में विश्लेषणात्मक तकनीकों के विकास और पर्यावरणीय रसायनों के व्यापक उपयोग के कारण मानव दूध में रासायनिक एक्सपोजर की जटिलता भी बढ़ी है। ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मौजूदगी कैसे हुई यह अब भी एक अनसुलझा सवाल बना हुआ है। वैज्ञानिकों का इशारा पानी में हो रहे प्रदूषण की तरफ है।

पानी का संकट
डाउन टू अर्थ ने हाल ही में बिहार के दो प्रमुख जिले नालंदा और कटिहार में करीब 10 गांवों में यात्रा की जहां ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम के सैंपल लिए गए। नालंदा के मेयार गांव का नाम उस शोध सूची में दर्ज है जहां से ब्रेस्ट मिल्क के नमूने लिए गए थे। यहां मंजू देवी कानू टोला में हमें लेकर जाती हैं। वह चापाकल की तरफ इशारा करती हैं, जिसके चबूतरे पर पानी में आयरन होने के निशान हैं। वह कहती हैं, “हर घर नल की योजना हमारे टोले में अब तक नहीं पहुंची है। पानी की टंकी शुरू होते ही खराब हो गई और आजतक नहीं बनी।” वह बताती हैं कि चंदा मिलाकर आस-पास के लोगों ने यह हैंडपंप जल्द ही ठीक कराया है और यही उनके यहां पानी का एकमात्र सहारा है। फिलहाल वह चापाकल का पानी पीने को मजबूर हैं, बिना यह जाने कि उनका पानी कितना प्रदूषित है। टोले में ही पानी की समस्या से परेशान होकर साधू साव ने अपनी कई वर्षों की जमा पूंजी खर्च करके एक लाख रुपए में समर्सिबल लगवाया है। पूछने पर बताते हैं, यह बोरवेल 300 फीट से ज्यादा गहरा है। उनके मुताबिक पानी अच्छा है और उन्हें कोई समस्या नजर नहीं आ रही। शायद वह इसलिए कि भारी धातुएं पानी में दिखाई नहीं देतीं। इसलिए पूरा गांव आश्वस्त है कि उन्हें जैसा भी पानी मिल रहा वह ठीक है। हालांकि, गांव की एक अन्य सदस्य ममता देवी कहती हैं कि दूर दूसरे टोले से रोजाना पानी भरकर लाना पड़ता है और यह हर घर नल योजना पूरी तरह से बर्बाद है, जहां पानी आता भी है वहां सिर्फ दो घंटे। लड़ाई की नौबत आ जाती है। बिहार के अधिकांश स्थानों पर सरकार के जरिए बनवाए गए जल मीनार की उपयोगिता नहीं रह गई है। या तो उनमें लीकेज है या फिर उन पानी टंकी से पानी ही नहीं सप्लाई हो रही। नालंदा के ही कटारी गांव के पास लोग जलमीनार से ही सिंचाई कर रहे जबकि पेयजल के लिए कॉमर्शियल आरओ वाटर पर आश्रित हो गए हैं। बिहार के कटिहार में गंगा किनारे लिए गए सैंपल में सर्वाधिक यूरेनियम की मात्रा मिली। कटिहार के आजमपुर गोला में दशकों पुराना एक कुआं आज भी सैकड़ों लोगों के लिए पानी का एकमात्र जरिया है। यहां भी हर घर नल नहीं पहुंचा है। गरीबी और साफ पानी का स्रोत न होने कारण महिलाएं इसी कुएं पर आश्रित हैं। कुआं के चारों तरफ काई लगी है और कुएं से निकलने वाला पानी हरा है। पूर्णिमा देवी कहती हैं, हमने पैसे इकट्ठे करके बीते साल इसे साफ कराया था लेकिन अब हर वक्त यह कैसे हो?

इसी कुएं के ठीक सामने आरओ प्लांट चलाने वाले राजेंद्र कुमार पासवान बताते हैं कि उन्होंने अपने पानी की जांच कराई थी उच्च स्तर आयरन और आर्सेनिक उनके पानी में मिला था। वह बताते हैं कि गाल ब्लैडर में पथरी की समस्या तेजी से फैल रही है। कैंसर चिकित्सकों ने बताया कि गाल ब्लैडर कैंसर की एक बड़ी वजह गाल ब्लैडर में पथरी बनना भी है। कटिहार में मनिहारी के गोपाल मंडल कहते हैं, यह इलाका पूरे बरसात में कट जाता है और हमारे गांव तक पहुंचना या यहां से जाना बहुत मुश्किल होता है। यह टापू बन जाता है। मंडल के नल से आने वाले पानी में आयरन की जबरदस्त अधिकता है। लेकिन आर्सेनिक, शीशा, यूरेनियम जैसी भारी धातुओं को पानी के जरिए पीने वाले यह सभी नहीं जानते कि भारी धातुएं क्या है और कहां से आ रही हैं। ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की खोज में शामिल दिल्ली स्थित एम्स के बायोकेमेस्ट्री विभाग के प्रमुख डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि “पहले हम ज्यादातर रेन वाटर हार्वेस्टिंग वाटर पेयजल में इस्तेमाल करते हैं। अब हम पानी काफी डीप बोरिंग के जरिए निकालते हैं। यह हैवी मेटल्स भी डीप क्रस्ट में होती हैं। वाटर लेवल काफी नीचे जा रहा है और लोग डीप बोरिंग में जा रहे हैं, जिससे यह स्रोत पानी के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं। लेकिन ब्रेस्टमिल्क या फूड में यूरेनियम जैसे भारी धातुओं का पहुंचना भारी चिंता की बात है। आमतौर पर जो भी हम खाते-पीते हैं वह पहले आंतों में अवशोषित होता है और फिर ब्लडस्ट्रीम में जाता है। इसके बाद लीवर में जाकर डी-टॉक्सिफाई होकर वह किडनी में पहुंचता है और जहां जो भी एक्स्ट्रा मटेरियल होता है वह यूरिन के तहत निकल जाता है, हालांकि इस दौरान कुछ हैवी मेटल्स ब्लड में भी पहुंच जाते हैं लेकिन यह एक बायोकेमेस्ट्री के शोध का विषय है कि यह ब्लड से ब्रेस्टमिल्क में कैसे पहुंच रहा है।”

खेती-किसानी से भी कनेक्शन
सिर्फ पानी का संकट ही नहीं, बल्कि खेती किसानी के संकट का तार भी इससे जुड़ता है। कटिहार के दालावीर गांव में मक्के के खेत को पानी से भर रहे हैं। वह बताते हैं कि एक एकड़ में इस फसल में उनके 13 से 14 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे। इसमें पांच बार यूरिया और डीएपी 50:50 के अनुपात में डालेंगे। वह बताते हैं कि यदि ऐसा न करें तो फसल ही नहीं होगी। जब फसल के अंत में हिसाब करते हैं तो हम नुकसान में ही रहते हैं। आगे मैं यह खेती-किसानी छोड़ दूंगा। सद्दाम की तरह बिहार के कटिहार में यूरिया और डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) का इस्तेमाल एक दशक में तीन गुना से चार गुना तक बढ़ा गया है। लेकिन इसका यूरेनियम से क्या लेना देना? साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित शोधपत्र “यूरेनियम इन ग्राउंडवाटर-फर्टिलाइजर्स वर्सेज जियोजेनिक सोर्सेज” के मुताबिक, भूमिगत जल में यूरेनियम का स्रोत केवल एक प्रकार का नहीं है बल्कि भू-वैज्ञानिक सतहों से निकलने वाला यूरेनियम और कृषि उर्वरकों से जुड़ा यूरेनियम दोनों ही भूमिगत जल को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि,बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के सॉयल केमेस्ट्री के चीफ साइंटिस्ट डॉ आशुतोष कोहली कहते हैं कि यूरेनियम का स्रोत फर्टिलाइजर से बहुत मुश्किल है। यही बात अन्य कृषि वैज्ञानिक भी कहते हैं। हालांकि एनवायरमेंट साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित “फर्टिलाइजर डीराइव्ड यूरेनियम एंड इट्स थ्रेट टु ह्यूमन हेल्थ” शोधपत्र में कहा गया है कि फॉस्फेट उर्वरक कृषि भूमि में यूरेनियम प्रदूषण का मुख्य स्रोत बने हुए हैं, इसका मुख्य कारण यह है कि उर्वरक बनाने में उपयोग होने वाली फॉस्फेट चट्टानों में अशुद्धियां होती हैं। विशेष रूप से, लंबे समय तक यूरेनियम युक्त उर्वरकों का उपयोग मिट्टी में यूरेनियम की सांद्रता को काफी बढ़ा सकता है। उर्वरकों के कारण खेती की गई मिट्टी में यूरेनियम की वृद्धि की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उर्वरक कितनी मात्रा में लगाया गया है, उसमें यूरेनियम की मात्रा कितनी है, मिट्टी का प्रकार क्या है और वहां की जलवायु कैसी है। उदाहरण के लिए, जर्मनी में 1951 से 2011 तक फॉस्फेट उर्वरक के उपयोग से कृषि भूमि पर कुल लगभग 14,000 टन यूरेनियम लगा, जो औसतन एक किलो यूरेनियम प्रति हेक्टेयर के बराबर है। फॉस्फेट उर्वरक कृषि भूमि में यूरेनियम का मुख्य स्रोत हैं, क्योंकि इन उर्वरकों में इस्तेमाल होने वाली फॉस्फेट चट्टानों में यूरेनियम जैसी अशुद्धियां होती हैं। मिट्टी में यह यूरेनियम उरानिल (यू6+) यौगिक के रूप में आसानी से पानी में घुल सकता है, जबकि कुछ हिस्से मिट्टी की गहरी परतों में सोखने या “साथ में जमने” (सह-उपसंचयन) के कारण स्थिर रहते हैं। ऑक्सीकरण की स्थितियों में यह बहुत घुलनशील होता है और भूजल, नदियों, नालों और समुद्री जल में पहुंच सकता है। जर्मनी जैसे क्षेत्रों में कृषि भूमि के पानी में यूरेनियम जंगलों वाले क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक पाया गया है और यह पीने के पानी में भी पहुंच चुका है। मनुष्यों के लिए मुख्य जोखिम खाने-पीने, त्वचा या सांस के जरिए होता है और यह गुर्दे, हड्डियों, प्रजनन, विकास, डीएनए और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकता है। कुछ क्षेत्रों में गुर्दे की बीमारी और कैंसर से जुड़ा जोखिम अधिक पाया गया है। यूरेनियम एक एंडोक्राइन विकारकारी रसायन भी है, जो प्रजनन समस्याओं का कारण बन सकता है।

पानी और भोजन श्रृंखला ही नहीं बल्कि जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च एंड रिपोर्ट्स में प्रकाशित “कंसट्रेशन ऑफ यूरेनियम इन ग्राउंडवाटर एंड इट्स हेल्थ इफेक्ट्स अराउंड द इंदिरा गांधी सुपर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट इन झराली, हरियाणा, इंडिया” के मुताबिक हरियाणा के झारली स्थित इंदिरा गांधी सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के आसपास के भूजल में यूरेनियम की सांद्रता का मापन और उसके स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन किया गया। क्योंकि कोयले के जलने जैसी औद्योगिक गतिविधियों से वातावरण में यूरेनियम सहित प्राकृतिक रेडियोधर्मिता (टीईएनआर) का स्तर बढ़ सकता है, जिससे भूजल में यूरेनियम का संदूषण हो रहा है। पावर प्लांट के आसपास 0-4 किमी की सीमा के भीतर कई स्थानों से भूजल के नमूने लिए गए और एलईडी फ्लोरोमीटर तकनीक से जांच हुई। यूरेनियम की सांद्रता 2.64 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से 201.9 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई गई, जिसका औसत 47.59 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रहा। विकिरण गतिविधि का औसत 1.18 बीक्यूप्रति लीटर रहा, जो 0.06 से 5.07 बीक्यू प्रति लीटर के बीच मापा गया। यूरेनियम विकिरणीय और रासायनिक दोनों ही जोखिम पैदा कर सकता है और यह गुर्दे की क्षति (नेफ्रोटॉक्सिसिटी) और कैंसर के उच्च जोखिम से भी जुड़ा है। इसके अलावा प्रतिबंधित रसायनों की मौजूदगी भी ब्रेस्टमिल्क में मिली है। कर्नाटक के प्रमुख कृषि क्षेत्र कलबुर्गी जिले में, शोधकर्ताओं ने 2021 में ब्रेस्टमिल्क में क्लोरीन आधारित कीटनाशकों की मौजूदगी को लेकर परीक्षण किए। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता प्रशांत वी सी ने डाउन टू अर्थ को बताया, “हमारे अध्ययन का उद्देश्य कलबुर्गी के ग्रामीण क्षेत्रों में स्तन के दूध में ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशकों की उपस्थिति का मूल्यांकन करना था।”

ऑर्गेनोक्लोरीन प्रदूषक (ओसीपी) ऐसे रसायन हैं जो आसानी से टूटते या खत्म नहीं होते। इसलिए ये लंबे समय तक मिट्टी, पानी और वातावरण में बने रहते हैं और धीरे-धीरे पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। शोधकर्ताओं ने 66 माताओं के दूध के नमूनों का विश्लेषण किया, जो बच्चे को जन्म देने के बाद स्वस्थ थीं, और उनमें ऑर्गेनोक्लोरीन प्रदूषकों के निशान पाए। इनमें डाइक्लोरोडिफेनिलट्राइक्लोरोएथेन (डीडीटी) और उसके उप-उत्पाद (ओ, पी डीडीई और पीपी -डीडीई) शामिल थे। जबकि उप-उत्पाद सबसे प्रमुख प्रदूषक थे और 32 नमूनों में पाए गए, डीडीटी केवल आठ नमूनों में पाया गया। यह अध्ययन 2023 में जर्नल ऑफ पॉपुलेशन थरेप्यूटिक्स एंड क्लीनिकल फॉरमोकोलॉजी में प्रकाशित हुआ। प्रशांत कहते हैं, “सभी माताएं कम से कम 8-10 वर्षों से इस क्षेत्र की निवासी थीं और उन वर्षों में खेतों में काम करती रही हैं।” शोध के मुख्य लेखक प्रशांत बताते हैं कि यह रसायन लंबे समय तक मिट्टी और पशुओं में बने रहते हैं। हालांकि डीडीटी को दशकों पहले कृषि में प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन यह मिट्टी और वसा ऊतक में पीढ़ियों तक मौजूद रह सकता है। जीवों द्वारा प्रदूषित चारे का सेवन, मांस या डेयरी उत्पाद खाने वाले मानवों में भी रसायन जमा कर सकता है। छिड़काव के दौरान हवा में रसायन का फैलना, सुरक्षा उपकरण का अभाव और अनुपयुक्त मिश्रण से किसान अधिक प्रभावित होते हैं।” शोधकर्ताओं के अनुसार, “हमारे अध्ययन से पता चलता है कि माताओं का आहार मां के दूध में कीटनाशक अवशेष के स्तर पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। अनावश्यक रूप से अज्ञात स्रोतों के मांसाहारी भोजन की मात्रा कम करने जैसी आहार संबंधी सावधानियां, ब्रेस्टमिल्क में ओसीपी के निशान कम करने में मदद कर सकती हैं।” फिर भी, प्रशांत कहते हैं, “हमारे अध्ययन में पाए गए ओसीपी के अवशेष डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित ‘सुरक्षित’ स्तर से कम थे। प्रतिभागियों में कोई हानिकारक प्रभाव नहीं देखा गया। यह आश्वस्त करने वाली बात है। फिर भी सुरक्षा स्तर का मतलब जोखिम का अभाव नहीं है। जीवन की शुरुआत में शरीर में प्रवेश करने वाले प्रदूषक ऐसे प्रभाव पैदा कर सकते हैं, जो बाद में भी सामने आ सकते हैं।” हालांकि वह नीतिगत उपायों के जरिए इसके रोकथाम की बात भी मजबूती से करते हैं। प्रशांत कहते हैं कि इसके प्रमाण मौजूद हैं कि जहां नीतिगत उपायों के जरिए पर्यावरणीय प्रदूषकों के बोझ को कम करने की दिशा में काम हुआ है, वहां इसका असर मां के दूध के नमूनों में भी दिखाई देता है। यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि मां के दूध में पाए जाने वाले ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशकों (ओसीपी) का स्तर लगातार घट रहा है। वर्ष 2021 में कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में किए गए अध्ययन में दर्ज स्तर देश में पहले किए गए अध्ययनों की तुलना में कम पाए गए। सिंह के अनुसार, आगे का रास्ता पर्यावरणीय नियमों को मजबूत करने, भूजल की निगरानी बढ़ाने, उर्वरक उत्पादन की पुनः समीक्षा करने, कीटनाशकों के उपयोग की बेहतर पद्धतियां अपनाने और जैव निगरानी से जुड़े शोध का विस्तार करने में है। जल स्रोतों की नियमित जांच, कृषि रसायनों पर कड़ी निगरानी, अच्छी कृषि पद्धतियों का पालन और देशव्यापी स्तर पर मां के दूध में प्रदूषण की जांच से इस मुद्दे पर अधिक स्पष्ट उत्तर मिल सकते हैं।
(कर्नाटक से वर्षा तोरगालकर के इनपुट के साथ।)
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
