ललित मौर्या
भारत और अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खून में ऐसे खास मेटाबॉलिक संकेत खोजे हैं, जिनसे पित्ताशय कैंसर की समय रहते पहचान संभव हो सकती है। असम के कई परिवारों में गॉलब्लैडर यानी पित्ताशय से जुड़ा कैंसर एक खामोश डर की तरह मौजूद है। यह एक ऐसी घातक बीमारी है जिसके शुरुआती लक्षण न के बराबर होते हैं और अधिकतर मामले में बीमारी का पता तब चलता है जब तक काफी देर हो चुकी होती है।

लेकिन अब भारत और अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा की गई साझा खोज ने उम्मीद की नई किरण जगा दी है। अपने अध्ययन में असम के तेजपुर विश्वविद्यालय और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस अर्बाना-शैंपेन से जुड़े वैज्ञानिकों ने रक्त में छिपे कुछ ऐसे खास रासायनिक संकेत खोजे हैं, जो इस जानलेवा बीमारी को समय रहते पकड़ने में मदद कर सकते हैं। यह खोज खास तौर पर उन मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो पित्त से जुड़ी पथरी का शिकार हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ प्रोटिओम रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन के मुताबिक खून में पाए जाने वाले कुछ विशेष मेटाबॉलिक पैटर्न (चयापचयी संकेत) कैंसर और सामान्य स्थितियों के बीच साफ फर्क दिखाते हैं। इससे भविष्य में बिना सर्जरी या जटिल जांच के, केवल खून की साधारण जांच से इस घातक कैंसर की पहचान संभव हो सकती है।

क्यों खतरनाक है यह कैंसर?
पित्ताशय से जुड़ा कैंसर अमेरिका में अपेक्षाकृत दुर्लभ है, वहां इसके हर साल करीब 12,000 मामले सामने आते हैं, जबकि यह 2,000 लोगों जिंदगियां निगल रहा है। लेकिन भारत के उत्तरी हिस्सों, खासकर असम में, यह कैंसर कहीं अधिक पाया जाता है। समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं, जिससे अधिकतर मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है।

क्या कुछ दर्शाते हैं नतीजे?
इस अध्ययन का नेतृत्व तेजपुर विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर पंकज बराह और शोधार्थी चिन्मयी बरुआह ने किया। इसमें अंतरराष्ट्रीय और बहु-विषयक टीम शामिल थी। अमेरिका की ओर से अमित राय ने कंप्यूटेशनल मेटाबोलोमिक्स विश्लेषण का नेतृत्व किया, जो रक्त के जटिल आंकड़ों को समझने में बेहद अहम रहा। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने उन्नत तकनीकों की मदद से तीन अलग-अलग समूहों के रक्त के नमूनों का विश्लेषण किया। इनमें पहला वह समूह था, जिसमें मरीज केवल पथरी की समस्या से जूझ रहे थे, जबकि दूसरे वर्ग में वे मरीज शामिल रहे जो पथरी के साथ कैंसर से भी पीड़ित थे। वहीं एक वर्ग ऐसा भी था जिसमें मरीजों को पित्ताशय का कैंसर था, लेकिन पथरी नहीं थी।

जांच के दौरान वैज्ञानिकों को रक्त में सैकड़ों बदले हुए रासायनिक तत्व (मेटाबोलाइट्स) मिले। पथरी के बिना कैंसर वाले मरीजों में 180 और पथरी से जुड़े कैंसर के मामलों में 225 बदलाव पाए गए। इन रासायनिक संकेतों की पहचान से यह स्पष्ट हुआ कि कैंसर के दोनों तरह के मामलों में खून की रासायनिक बनावट अलग होती है। कई पहचाने गए मेटाबोलाइट्स पित्त अम्ल (बाइल एसिड) और अमीनो एसिड से जुड़े थे, जो ट्यूमर के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। राय के विश्लेषण ने उन रासायनिक संकेतों को अलग-अलग समझने में मदद की, जो आपस में मिलते-जुलते थे। इससे यह साफ हुआ कि पित्ताशय में पथरी होने या न होने की स्थिति में कैंसर से जुड़े बदलाव किस तरह अलग होते हैं।

क्या बदल सकता है भविष्य?
शोधकर्ताओं का कहना है कि खून में मौजूद कुछ खास रासायनिक बदलावों के आधार पर यह साफ पहचाना जा सकता है कि पित्ताशय का कैंसर पथरी के साथ है या पथरी के बिना। उनका आगे कहना है कि यदि आगे बड़े स्तर पर और बहु-केंद्रित अध्ययन होते हैं, तो इन संकेतों के आधार पर एक सरल रक्त परीक्षण विकसित किया जा सकता है। इससे समय रहते कैंसर की पहचान संभव होगी और इलाज की सफलता की संभावना बढ़ेगी।

स्वागत सुपर स्पेशियलिटी एंड सर्जिकल हॉस्पिटल के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जन सुभाष खन्ना का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि खून में मौजूद इन मेटाबॉलिक संकेतों की पहचान डॉक्टरों को बेहतर और समय पर निर्णय लेने में मदद कर सकती है। हालांकि साथ ही वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि क्लीनिकल उपयोग से पहले बड़े पैमाने पर और शोध की जरूरत है, लेकिन यह अध्ययन खासकर उच्च जोखिम वाले इलाकों में गैर-आक्रामक (नॉन-इनवेसिव) स्क्रीनिंग के लिए मजबूत आधार तैयार करता है। देखा जाए तो यह शोध इस बात का भी उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग किस तरह कैंसर जैसी जटिल बीमारी से लड़ने में नई दिशा दे सकता है।
(‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )
