ललित मौर्या

स्वस्थ और लंबा जीवन कौन नहीं चाहता। लेकिन जीन, जीवनशैली, और पर्यावरण कई ऐसे कारक हैं जो लम्बे स्वस्थ जीवन को प्रभावित करते हैं। कई बीमारियां और विकार ऐसे होते हैं जो हमारे जीन में मौजूद होते हैं। मतलब कि न चाहते हुए भी लोग इन बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में लोगों को लगता है कि जीन से जुड़ी यह समस्याएं कहीं ज्यादा खतरनाक होती हैं। लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है।

ऑक्सफोर्ड पॉपुलेशन हेल्थ से जुड़े शोधकर्ताओं ने इस बारे में किए अपने अध्ययन में खुलासा किया है कि जीन की तुलना में जीवनशैली और पर्यावरण संबंधी तमाम कारक जैसे प्रदूषण आदि स्वास्थ्य पर कहीं ज्यादा असर डालते हैं। इनकी वजह से समय से पहले मृत्यु का खतरा कहीं ज्यादा बढ़ जाता है।

देखा जाए तो जिस तरह से लोगों की जीवनशैली बिगड़ रही है और हवा, पानी आदि में प्रदूषण का जहर घुल रहा है, वो लोगों को कहीं ज्यादा बीमार बना रहा है। नतीजन बेहतर इलाज और स्वस्थ रहने के इतने साधन होने के बावजूद आज लोग अच्छी सेहत और लम्बे जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बता दें कि खराब जीवनशैली में शराब-सिगरेट और जंक फ़ूड के सेवन से लेकर स्वस्थ आहार और शारीरिक गतिविधियों में आती गिरावट शामिल है। वहीं पर्यावरण सम्बन्धी कारकों में प्रदूषण, आसपास का वातावरण आदि शामिल हैं।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक से जुड़े करीब 500,000 प्रतिभागियों के आंकड़ों का उपयोग किया है। इस दौरान 22 प्रमुख बीमारियों के लिए, पर्यावरण से जुड़े 164 कारकों और आनुवंशिक जोखिमों का विश्लेषण किया है, जो उम्र बढ़ने, बीमारियों और समय से पहले मृत्यु को प्रभावित करते हैं। अध्ययन के नतीजे जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन के निष्कर्ष यह समझने में मददगार साबित हो सकते हैं कि क्यों कुछ लोग दूसरों की तुलना में जल्दी मृत्यु का शिकार बन जाते हैं और कैसे इन जोखिमों को नियंत्रित करके, सेहत को बेहतर बनाया जा सकता है।

‘एक्सपोजोम’ की अहमियत को उजागर करता है अध्ययन

विशेषज्ञों के मुताबिक अध्ययन ‘एक्सपोजोम’ की अहमियत को उजागर करता है। एक्सपोजोम वह सब कुछ है जो एक व्यक्ति अपने जीवन में अनुभव करता है और जो उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसमें पर्यावरण सम्बन्धी कारक जैसे प्रदूषण, खानपान, जीवनशैली, तनाव, कौन कहां रहता है जैसी सभी चीजें शामिल हैं। इन कारकों का गहरा असर उम्र बढ़ने की प्रक्रिया और उम्र से जुड़ी बीमारियों के विकास पर पड़ता है।

स्टडी के मुताबिक हमारी जीवनशैली और परिवेश हमारे स्वास्थ्य को हमारे जीन से कहीं ज्यादा प्रभावित करता है। रिसर्च में सामने आया है कि जहां जीवनशैली और परिवेश समय से पहले मृत्यु के जोखिम को 17 फीसदी तक प्रभावित करते हैं। वहीं जीन का प्रभाव दो फीसदी से भी कम होता है।

इसी तरह पहचाने गए 25 प्रमुख पर्यावरणीय कारकों में से धूम्रपान, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शारीरिक गतिविधि और रहन-सहन की स्थिति बढ़ती उम्र और जीवनकाल पर सबसे अधिक प्रभाव डालते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जहां धूम्रपान से लोगों में 21 बीमारियों का खतरा देखा गया। वहीं सामाजिक-आर्थिक कारक 19 बीमारियों से जुड़े थे। इसी तरह शारीरिक गतिविधियां न करने से 17 तरह की बीमारियों हो सकती हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया कि इनमें से 23 कारक ऐसे हैं, जिनमें बदलाव की गुंजाईश है। वैज्ञानिकों ने इस बात का भी खुलासा किया है कि जीवन के शुरूआती दस वर्षो में वजन, जन्म के समय मां द्वारा धूम्रपान, जैसे कारक आगे चलकर समय से पहले मृत्यु के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

शोध में यह भी सामने आया है कि जीवनशैली और पर्यावरण से जुड़े कारकों ने फेफड़े, हृदय और लिवर से जुड़ी बीमारियों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। वहीं जीन ने मनोभ्रंश और स्तन कैंसर में बड़ी भूमिका निभाई।

ऑक्सफोर्ड पॉपुलेशन हेल्थ में एपिडेमियोलॉजी की प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़ी कॉर्नेलिया वैन ड्यूजिन ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “हमारा अध्ययन सेहत पर पड़ने वाले जोखिम को दर्शाता है, जिसे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार, शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने और धूम्रपान को सीमित करने से बदला जा सकता है।”

मतलब की सही खान पान और बेहतर जीवनशैली के साथ नीतियों में बदलाव इस जोखिम को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। उनके मुताबिक “जीन मस्तिष्क संबंधी बीमारियों और कुछ कैंसरों के जोखिम को प्रभावित करते हैं, लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि हम फेफड़े, हृदय और लिवर संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं, जो दुनिया भर में बड़ी संख्या में मौतों की वजह बन रही हैं।”

उनका कहना है कि “जीवन के शुरूआती वर्षों में पर्यावरण संबंधी जोखिम विशेष रूप से मायने रखते हैं, क्योंकि यह बुढ़ापे को जल्द आने की दावत दे सकते हैं। लेकिन हमारे पास अभी भी बीमारियों और समय से पहले मृत्यु के जोखिम को सीमित करने की संभावनाएं मौजूद हैं।”

शोधकर्ताओं ने रक्त प्रोटीन का अध्ययन करके लोगों की उम्र कितनी तेजी से बढ़ती है, यह जानने के लिए एक विशेष “एजिंग क्लॉक” का इस्तेमाल किया। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि पर्यावरण और जीवनशैली सम्बन्धी कारक बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं।

       (‘डाउन-टू-अर्थ’ से साभार )

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